पेशावर के आर्मी स्कूल में मासूमों पर बरपे आतंकियों के कहर के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक और सैन्य संस्थान की ओर से जैसी प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे सोचने को मजबूर करती हैं, कि आखिर हमारे पड़ोसी देश में चल क्या रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ हैं, जिन्होंने बच्चों की मौत को राष्ट्रीय आपदा बताते हुए, पाकिस्तान की जमीन से आतंकवाद का पूरी तरह खात्मा करने की बात कही है। दूसरी ओर पाकिस्तानी फौज है, जो इस घटना के बाद बेहद आक्रामक नजर आ रही है। पाकिस्तानी तालिबान के इस हमले की जिम्मेदारी लेने के बाद अब नवाज शरीफ 'अच्छे' और 'बुरे' तालिबान जैसे फर्क को भी नकार रहे हैं।
मगर पाकिस्तान का यह दोहरा खेल कोई नया नहीं है। एक ओर तो वह हमेशा अमेरिका से हर संभव मदद लेने की जुगाड़ में रहा, दूसरी ओर वह अमेरिका की परेशानी बढ़ाने के लिए आतंकियों को पनाह भी देता रहा। पिछले कुछ वर्षों से अमेरिका को भी पाकिस्तान की नीयत का एहसास होने लगा था। जब अमेरिका ने सवाल उठाया, तो खुद पाकिस्तान ने 'अच्छे' और 'बुरे' तालिबान का वर्गीकरण गढ़ दिया। पर जब यह सवाल उठा कि अगर कभी 'अच्छे' तालिबान, 'बुरे' बन गए तो क्या होगा, तो पाकिस्तान के पास इस सवाल का तब भी कोई जवाब नहीं था, और आज भी नहीं है।
पाकिस्तान को करीब से जानने वालों को पता है कि यह देश कभी दूर की नहीं सोचता। वह सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना जानता है। उसने कभी यह नहीं सोचा कि जिन आतंकियों को वह पाल रहा है, उनमें से कुछ अगर उसके काबू से बाहर हो गए, तो वह क्या करेगा। गौरतलब है कि तालिबान के कई ग्रुप हैं। जब हिकमतयार ग्रुप कमजोर हुआ, तो हक्कानी ग्रुप आगे आया, फिर महसूद ग्रुप और फिर पेशावर में बच्चों का कत्लेआम करने वाला मुल्ला फजलुल्लाह का तहरीक ए तालिबान।
फजलुल्लाह अफगानिस्तान में है, यह सबको पता है, मगर उसे छूने तक का पाकिस्तान का कोई इरादा नहीं है। इसकी वजह, पाकिस्तानी फौज है। हालांकि पाकिस्तानी आर्मी चीफ राहिल शरीफ ने नवाज शरीफ से 48 घंटों में तीन हजार आतंकियों को खत्म करने की मांग की है। मगर इसके पीछे की कहानी को समझना काफी दिलचस्प है। दरअसल, पाकिस्तान में सत्ता का केंद्र वहां की फौज है। ओसामा बिन लादेन के साथ पाकिस्तानी फौज के रिश्ते से हर कोई वाकिफ था। ऐसे में किसी भी आतंकी को ठिकाने लगाना उसके लिए बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। दरअसल फौज का असल मकसद कुछ और है। इस समय बच्चों की मौत को लेकर पाकिस्तानी लोगों में जबरदस्त रोष है। पाकिस्तानी फौज अपने देश की जनता को यह दिखाना चाहती है कि उसे मासूम बच्चों की मौत की कितनी फिक्र है।
मगर यह हमदर्दी ज्यादा समय तक दिखने वाली नहीं है। महीने-डेढ़ महीने के भीतर ही पाकिस्तान की आबोहवा में यह बात फैलाई जाएगी कि पाकिस्तान के लिए दुश्मन नंबर एक भारत ही है, और इस हमले के पीछे भी उसी का हाथ था। जल्द ही यह नजारा भी दिख सकता है कि जिन आतंकियों का वर्षों से कुछ पता नहीं है, वे पर्दे से बाहर आकर भारत के खिलाफ जहर उगलते दिखें। गौर करने वाली बात है कि यह हमला आर्मी स्कूल के बच्चों पर हुआ है। साफ है कि पाकिस्तान की फौज और अमेरिका की बढ़ती नजदीकी ने कहीं न कहीं तालिबान पर दबाव बढ़ाया है। और यही हमले की वजह बना। मगर पाकिस्तान की फौज भारत के विरोध को ही अपना एकसूत्री एजेंडा बनाए हुए है। अगर पाकिस्तान से निपटना है, तो वहां की फौज की इस सोच को समझना होगा।
इसके अलावा बड़ा सवाल यह भी है कि हाफिज सईद और लश्करे तैय्यबा के कमांडर जकीउर रहमान लखवी जैसों का क्या किया जाए, इस पर कोई बात पाकिस्तान में क्यों नहीं उठती। इसकी तीन वजहें हैं। पहली, पाकिस्तान की फौज को उम्मीद है कि इन आतंकियों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ किया जा सकता है। दूसरा, ये वे आतंकी हैं, जो पाकिस्तान की फौज को नहीं छेड़ते, और तीसरा, पाकिस्तान के आम आदमी को भी अब यह महसूस होने लगा है कि भारत को दबाव में रखने के लिए और अपने ख्वाबों के पाकिस्तान को कायम करने के लिए फौज की तुलना में ऐसे आतंकी ग्रुप ज्यादा असरदार साबित हो सकते हैं।
पेशावर में 132 बच्चों की मौत पर भारत के प्रधानमंत्री ने भले ही शोक जता दिया हो, मगर सच तो यह है कि वैश्विक आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के संदर्भ में भारत का क्या पक्ष होना चाहिए, इसे लेकर भारत के राजनेताओं ने अब तक अपनी अज्ञानता ही जाहिर की है। पाकिस्तान के साथ रिश्ते कायम करते वक्त भारत वहां के राजनीतिक प्रतिष्ठानों को ज्यादा तवज्जो देता है, जिनकी वहां बिल्कुल भी नहीं चलती। यह हमारे नीति-नियंताओं की गंभीर भूल है, जो वे हमेशा से करते आए हैं। भारत को यह समझना होगा कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान में अंतर है। केवल चुनाव हो जाने भर से किसी देश में लोकतंत्र स्थापित हो जाए, यह जरूरी नहीं। अगर पाकिस्तान को दुनिया के सबसे धूर्त देशों में शुमार किया जाता है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। वहां लोकतंत्र के ढोंग के सिवाय कुछ नहीं हो रहा।
जिस पाकिस्तान को कभी अमेरिका ने बढ़ावा दिया, आज वही उससे कन्नी काट रहा है। मगर चीन और सऊदी अरब के रूप में पाकिस्तान के चचेरे भाई आज भी मौजूद हैं, जो उसे हर मुमकिन मदद मुहैया करा रहे हैं। ऐसे में, भारत के सामने क्या चारा बचता है? पाकिस्तान की सरकार कुछ कर नहीं सकती, और वहां की फौज कुछ करेगी नहीं। भारत को पाकिस्तान के खिलाफ एक वैश्विक जनमत के निर्माण की कोशिश करनी चाहिए। भारत का नजरिया साफ होना चाहिए कि जो भी पाकिस्तान के साथ धंधा करेगा, उसके लिए भारत में कोई जगह नहीं होगी। पाकिस्तान को दबाव में रखना भारत के हित में है, और इसका यही एकमात्र तरीका बचा है।
लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं