सिर्फ फिल्मी सुंदरियां ही साइज जीरो नहीं होतीं जी, मुद्रास्फीति की दर भी साइज जीरो हो जाती है। अब यह मत पूछना कि महंगाई और मुद्रास्फीति में क्या फर्क है। यह तो कोई अर्थशास्त्री ही बता पाएगा, बेचारे किसी व्यंग्य लेखक के बस की बात यह नहीं है। मगर टीवी में प्रसारित खबरों की मानें, तो मुद्रास्फीति की दर साइज जीरो हो गई है।
एक जमाने में पेट्रोल-डीजन के दाम हर महीने बढ़ते थे और अब यह हर महीने घट रहे हैं। हालांकि लोग कह रहे हैं कि पेट्रोल-डीजल के दाम घटने में सरकार की खास भूमिका नहीं है। वह तो वैसे भी इन्हें अपने नियंत्रण से मुक्त कर चुकी है। इन्हें यह छूट दे चुकी कि बढ़ना है बढ़ो, घटना है घटो। इतनी छूट तो माता-पिता अपने बच्चों को भी आजकल के जमाने में नहीं देते। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि तेल के घटते दाम के पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार का कमाल है। लेकिन इस तरह के संयोग भी राजनीति में बड़े काम आते हैं जी। जब कांग्रेस का राज था, तब अंतरराष्ट्रीय बाजार ने भी उसका साथ नहीं दिया था। वहां दाम बढ़ते रहे और बेचारी कांग्रेस बदनाम होती रही। जनता के अच्छे दिन तो पता नहीं, कितने आए, पर भाजपा के जरूर आ गए कि उसका राज आते ही विश्व बाजार में तेल की कीमतें घटकर आधी रह गईं।
लेकिन महंगाई का साइज तो वही चल रहा है। कहते हैं, सर्दियों में सब्जियां सस्ती हो जाती हैं, पर न मटर सस्ते हुए, न गोभी। इस सर्दी में भी लोग गाजर का हलवा खाने को तरस रहे हैं। लेकिन सरकार को इससे क्या मतलब? वह तो मुद्रास्फीति के साइज जीरो हो जाने से अपनी कमनीयता पर इतरा रही है। बताते हैं कि औद्योगिक उत्पादन की दर भी घट रही है। कहीं वह भी साइज जीरो न हो जाए। वैसे मंदी भी कहने को मंदी होती है और चीजें महंगी हो जाती हैं। यह रिश्ता कुछ समझ में नहीं आता। जब यह रिश्ता ही समझ में नहीं आता, तो मुद्रास्फीति और महंगाई का रिश्ता कैसे समझ में आएगा। पर सरकार के लिए यही खुशी क्या कम है कि मुद्रास्फीति साइज जीरो हो गई है!