संभवतः दो महान आधुनिक बंगाली स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर ही थे। अपने राज्य, देश और दुनिया में दोनों की चमत्कारिक और विराट छवि थी और अब भी कायम है। टैगोर और विवेकानंद तकरीबन समकालीन थे और दोनों ही कोलकाता के आसपास ही रहते थे।
निस्संदेह वे एक दूसरे के काम से वाकिफ थे, फिर भी लगता है कि उनकी सिर्फ एक बार मुलाकात हुई और वह भी अमेरिकी महावाणिज्यदूत की पत्नी द्वारा जनवरी, 1899 में आयोजित की गई चाय पार्टी में। यह लेख स्कॉटलैंड के एक शानदार शख्स के बारे में है, विवेकानंद और टैगोर से जिनका दोस्ताना रिश्ता था।
उनका नाम था पैट्रिक गेडेस। दुनिया भर के पारिस्थितिकी और टाउन प्लानिंग हलकों में जहां उन्हें सराहा गया, वहीं लगता नहीं कि किसी बहुत शिक्षित बंगाली ने उनका नाम भी सुना हो। फिर भी वह एक ऐसे शख्स थे, जिनके बारे में टैगोर ने कहा था, 'उनमें एक वैज्ञानिक जैसी शुद्धता है और पैगंबर जैसी दृष्टि; और इसके साथ ही उनमें एक कलाकार जैसी क्षमता है, जिससे वह अपने विचारों को हकीकत में उतार सकते हैं।'
इतिहासकार मर्डो मैकडोनाल्ड की नई किताब पैट्रिक गेडेज इंटलैक्चुअल ओरिजिन (एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी प्रेस) में इन शब्दों का हवाला दिया गया है। मैकडोनाल्ड ने गेडेस के विविध विषयों से संबंधित ज्ञान पर जोर दिया है। वह एक समय में ही वनस्पति विज्ञानी, पारिस्थितिकीविज्ञ, भूगोलवेत्ता, समाजशास्त्री होने के साथ ही शहर नियोजक भी थे, जो कि ऐसा पेशा था, जिसमें ये सारे विषय संश्लेषित थे। अधिकांश वैज्ञानिकों और समाज विज्ञानियों के विपरीत गेडेस के पास एक मजबूत दृश्य कल्पनाशीलता भी थी।
पैट्रिक गेडेस की स्वामी विवेकानंद से पहली मुलाकात 1900 की शुरुआत में अमेरिका में हुई थी, जहां वे दोनों व्याख्यान दे रहे थे। इसके बाद उसी वर्ष उनकी मुलाकात पेरिस में हुई, जब फ्रांस की राजधानी ने एक वर्ल्ड फेयर आयोजित किया था और जिसमें गेडेस ने भी एक स्टाल लगाया था।
यात्रा में स्वामी की शिष्या सिस्टर निवेदिता भी साथ थीं। थोड़े समय बाद विवेकानंद की मृत्यु हो गई, लेकिन उसके बाद गेडेस ने निवेदिता से संपर्क बनाए रखा। स्कॉटलैंड के इस शख्स और आयरलैंड की इस महिला को साथ-साथ प्रसिद्धि मिली। निवेदिता ने रामकृष्ण की शिक्षाओं के जरिये उनका परिचय भारतीय अध्यात्म से कराया; तो गेडेस ने फ्रेंच स्कॉलर फ्रेदरिक ले प्ले के काम के जरिये उनका परिचय मानव भूगोल से कराया। निवेदिता की किताब द वेब ऑफ इंडियन लाइफ गेडेस को समर्पित है।
1903 में सिस्टर निवेदिता ने पैट्रिक गेडेस को भारत के एक नियोजित विश्वविद्यालय के बारे में लिखा। इस उपक्रम के लिए धन उद्योगपति जमशेदजी टाटा से मिलने वाला था, जिन्हें स्वामी विवेकानंद ने भारत के वैज्ञानिक भविष्य पर निवेश करने की सलाह दी थी। चूंकि स्वामी का निधन हो गया था, सो निवेदिता ने खुद लंबे समय तक प्रोफेसर रहे गेडेस से कहा कि वह इस नए भारतीय विश्वविद्यालय के बारे में सुझाव भेजें कि इसे किस तरह से तैयार किया जाए।
उन्होंने उन्हें अनेक चिट्ठियां लिखीं, जिनमें यूरोप और अमेरिका के मध्ययुगीन तथा आधुनिक विश्वविद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा और सीखने के तरीके के बारे में वृहत जानकारियां थीं और साथ ही भारत में विश्वविद्यालय शुरू करने वालों के लिए सबक और चेतावनियां भी।
निवेदिता को भेजी अपनी चिट्ठियों में गेडेस ने शिक्षा के प्रति गहन पारिस्थितिकी दृष्टिकोण को रेखांकित किया। उन्होंने लिखा, 'प्रकृति संबंधी शिक्षा में हम अपने आसपास के परिदृश्य से शुरुआत करते हुए, कहीं और अधिक भौतिक अर्थों में भूगोल के साथ, प्रकृति से जुड़े व्यवसायों के जरिये, इसे सामाजिक जीवन से जोड़ सकते हैं: इनसे हमारी संस्थाएं, और उनके संबद्ध या परिणामी विचार विकसित होते हैं। हम भूगोल के विशाल क्षेत्र में, इतिहास की विस्तृत शृंखला में इसे तलाशते हैं। और ये अपने साधारण तथा विकसित दोनों ही रूपों में वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिनिष्ठ दोनों है।
इसीलिए हम हर स्तर पर पहले देखते हैं कि कैसे प्रकृति ने व्यवसाय और संस्थानों को अनुकूलित किया है; लेकिन इसके बाद हम देखते हैं कि कैसे आदर्शों ने आध्यात्मिक और लौकिक जीवन को पुनर्निर्मित किया है, शिक्षा का निर्धारण किया है, और खुद को साहित्य और कला में व्यक्त किया है।'
1909 में जब टाटा के धन से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की शुरुआत की गई थी, तब इसमें न तो भूगोल का विभाग था और न ही, जैसा कि गेडेस कहते थे नेचर स्टडी का विभाग। 1980 के दशक में जाकर ही वहां सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइसेंज की स्थापना हो सकी, जिसके बाद से इसने मानव-प्रकृति रिश्ते पर शानदार शोध किए हैं। सिस्टर निवेदिता का 1911 में निधन हो गया।
टैगोर और गेडेस की पहली मुलाकात 1915 में कलकत्ता में हुई थी। इसके बाद 1917 दार्जिलिंग में वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस (आगे चलकर इस स्कॉटिश को जिनकी जीवनी लिखनी थी) के घर पर उनकी मुलाकात हुई। इसके बाद अगले कई वर्षों तक उनके बीच छिटपुट लेकिन दिलचस्प पत्र व्यवहार हुआ, जो द टैगोर-गेडेस कॉरस्पॉडेंस (कोलकाताः विश्व भारती, 2004) संपादक बाशबी फ्रेशर, में दर्ज है।
अप्रैल, 1919 में टैगोर ने गेडेस को लिखा, 'शिक्षा और वन पर आपके व्याख्यानों के लिए बधाई, दोनों ही अपने आप में शानदार थे।' इसके तीन साल बाद गेडेस ने टैगोर को विभिन्न विषयों के एकीकृत शिक्षण की एक योजना भेजी, यह ऐसी योजना थी जिसका कुछ हद तक उपयोग टैगोर शांतिनिकेतन में स्थापित किए जा रहे विश्वविद्यालय में कर सकते थे।
जवाब में टैगोर ने गेडेस को लिखा, 'मैं अक्सर कामना करता हू्ं कि मेरे मिशन में आपके जैसे लोगों की मदद मिले, जिनके पास न केवल व्यापक संवेदना है और कल्पनाशीलता है, बल्कि ज्ञान और कौशल की शृंखला है। मैंने अक्सर वास्तुकला की आपकी गहरी दृष्टि का अनुसरण किया है। लेकिन इसके साथ ही मुझे स्वीकार करना पड़ा कि आपकी दृष्टि से हमें जो परिप्रेक्ष्य मिलता है, उसका व्यावहारिक उपयोग मेरी शक्ति से परे था।
मेरे स्वभावगत गुणों के लिए जरूरी है कि मेरे काम का बड़ा हिस्सा मेरे मन की अनगढ़ता में रहे। मेरी सारी गतिविधियां, कमोबेश कविताएं लिखने जैसी ही हैं, बस उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम अलग है। आपकी योजनाओं में भी काफी हद तक समान तत्व हैं, जो मुझे दृढ़ता से आकर्षित करते हैं, लेकिन उनका मुहावरा अलग है, जिनका उपयोग करने की मुझमें शक्ति नहीं है।'
गेडेस 1924 में यूरोप चले गए, जहां उन्होंने एक फ्रांसीसी शहर मोंटपेलिएर में एक संस्थान की स्थापना की। 1930 में गेडेस ने टैगोर को मोंटपेलिएर आमंत्रित किया था। उन गर्मियों में टैगोर को ऑक्सफोर्ड में एक व्याख्यान देना था। उन्होंने अपने दोस्त से मिलने की तैयारी कर ली थी, लेकिन अचानक उनके सीने में दर्द हुआ। डॉक्टरों ने उन्हें यात्रा रद्द करने की सलाह दी। फिर दोनों की कभी मुलाकात नहीं हो सकी।
स्कॉटिश पारिस्थितिकीविज्ञ और बंगाली कवि के करीब आने की कई वजहें थीं : सीखने के प्रति एकीकृत और प्रायोगिक दृष्टिकोण में उनकी साझा दिलचस्पी, अंतरराष्ट्रीयवाद, प्रकृति के प्रति प्रेम और मानव ज्ञान की सीमाओं के प्रति गहरा सम्मान। जैसा कि मुर्डो मैकडोनाल्ड ने लिखा है, टैगोर और गेडेस में काफी समानताएं थीं। दोनों ने अंतःविषय को स्वीकार किया, दोनों ही सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रति उल्लेखनीय रूप से सक्रिय थे, दोनों पारिस्थितिकी के महत्व को स्वीकार करते थे।'