शब्दों के हाथ नहीं होते
पैर नहीं होते
नहीं होते पंख/डैने
फिर भी शब्द-तमाचा मार देते हैं
दौड़ते हैं/उड़ते हैं...
शब्दों के मुंह नहीं होते
नाक/कान नहीं होते
नहीं होती आंखें
फिर भी शब्द-मुखर होते हैं
देख लेते हैं/सुन लेते हैं/सूंघ लेते हैं...
शब्द जाड़े में कंबल, गर्मी में छाते
बरसात में रेनकोट होते हैं
शब्द, दूध की बोतल
छड़ी होते हैं
शब्द आडम्बर नहीं होते
लोग ओढ़ते हैं...शब्दाडम्बर...
शब्द, जिसके होते हैं,
उसी के हो जाते हैं
आदमी के नाम दर्ज हो जाते हैं शब्द
हथियार नहीं होते
पर लड़ते हैं बड़े-बड़े युद्ध
करते हैं धरती की रक्षा
शब्द के साथ थोड़ी सी छेड़छाड़
शब्द को अपशब्द बना सकती है
और अपशब्द
धरती को बना सकते हैं-
मलबे का ढेर...!
शब्दों की ओट में रहने वाले कवि श्रीरंग अपने यहां कविता को दर्शन की सीढ़ी पर नहीं चढ़ाते। एक
तरफ तो यह कवि दर्द के रीतिवाद को तोड़ता है, दूसरी तरफ काव्य स्थितियों
में नई सूरत पैदा करने की कोशिश करता है। कवि को सूत्र और सिद्धांतों की
खूटिंयों से ज्यादा अपने अनुभव पर भरोसा है।