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क्रांति की जेब में जुलूस और हड़तालें ही नहीं, उपलब्धियां भी हैं

Sat, 04 May 2013 09:04 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
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एक्सीडेंटल इंडिया का सही अनुवाद होना चाहिए-संयोगों का भारत। यानी आजादी के बाद से इस देश ने उंगलियों पर गिनी जाने वाली जितनी भी उपलब्धियां हासिल की हैं, वे प्रयत्नों की स्वाभाविक परिणति नहीं, संयोग से हासिल हुई हैं। ज्यादा स्पष्ट शब्दों में कहें, तो जितने भी बड़े कदम उठे हैं, वे संकटों का नतीजा हैं।
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लेखक अपने निष्कर्ष में अतिवादी होने की हद तक चले गए हैं-यानी अपने देश में बड़े संकट के नतीजे में ही बड़ा बदलाव आएगा। क्या सचमुच ऐसा है? किताब में लेखक ने जिन सात विराट उपलब्धियों के बारे में बताया है, उनमें से कइयों के बारे में, मसलन-आर्थिक उदारीकरण, हरित क्रांति, बैंकों का राष्ट्रीयकरण और सूचना का अधिकार कानून, यह सौ फीसदी सही है।

अगर अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने खाद्यान्न की मदद देने से साफ इनकार नहीं किया होता, तो विराट क्षेत्रफल और कृषिनिर्भर अर्थव्यवस्था वाला यह देश अनाज के मोर्चे पर आत्मनिर्भर होने के बारे में शायद ही सोचता! अगर कर्ज चुकाने के लिए देश का सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी नहीं रखा गया होता, तो पीवी नरसिंह राव उस उदार अर्थनीति को लागू करने की विवशता क्यों दिखाते, जिस पर उनसे पहले कई सरकारों में विफल चर्चाएं हो चुकी थीं?
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बैंकों के राष्ट्रीयकरण का इंदिरा गांधी का फैसला तो अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए था भी नहीं; यह उन निजी बैंकों को रास्ते पर लाने के लिए उठाया गया कदम था, जो देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने के बजाय निजी कंपनियों और उद्योगों को तरजीह दे रहे थे। वह कदम सिंडिकेट, और उसमें भी उनके शाश्वत प्रतिद्वंद्वी तथा नई अर्थनीति के समर्थक वित्त मंत्री मोरारजी देसाई को सबक सिखाने के लिए उठाया गया था, जो बैंकों के राष्ट्रीयकरण के घोर विरोधी थे! इसी तरह सूचना के अधिकार कानून को यूपीए सरकार ने सिविल सोसाइटी के दबाव में लागू किया।

शंकर अय्यर की यह किताब भारतीय अर्थव्यवस्था के एक दूसरे पक्ष को भी उद्घाटित करती है। बड़ी राष्ट्रीय उपलब्धियां ज्यादातर उन शख्सियतों के बूते हासिल हुई हैं, जिनकी चर्चा कम ही हुई है। मसलन, हरित क्रांति का श्रेय लालबहादुर शास्त्री को जाता है, जिन्होंने न सिर्फ खेती को बदलने का मन बनाया, बल्कि रातोंरात सी सुब्रह्मण्यम को कृषि मंत्रालय में ले आए और बाकी काम एस स्वामीनाथन ने किया। दुग्ध क्रांति को सफल बनाने के लिए पी जे कुरियन की कदम-कदम पर मदद भी शास्त्री जी ने ही की थी। लेकिन कुरियन का आणंद में रुकना जरूर बहुत बड़ा संयोग था।

शास्त्री जी के साथ सी सुब्रह्मण्यम को भी भारतीय अर्थव्यवस्था में परिवर्तनकामी भूमिका के लिए याद किया जाना चाहिए। इसी तरह मिड डे मील के बारे में सोचने वाले पहले भारतीय नेता के. कामराज थे, जिन्हें कांग्रेस की नई पीढ़ी भी कम ही जानती होगी। उदार अर्थनीति को लागू करने के कारण पूरा देश पी वी नरसिंह राव का शुक्रगुजार है, लेकिन नेहरू-गांधी खानदान ने उन्हें कभी महत्व नहीं दिया। यह तथ्य है कि उद्योगों को नए भारत का मंदिर बताने वाले जवाहरलाल नेहरू का भारतीय अर्थव्यवस्था को बदलने में योगदान ज्यादा नहीं है। वह खेती को आधुनिक बना सकते थे, लेकिन उन्हें लगता था कि कृषि में निवेश होगा, तो उसका अनुचित फायदा बड़े किसान उठाएंगे।

इंदिरा और राजीव गांधी ने जो भी कदम उठाए, वे उनकी दूरदृष्टि के बजाय बदलते समय का नतीजा ज्यादा थे। सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति का शिलान्यास बेशक इंदिरा गांधी ने किया था, लेकिन एक तो उसे रोकना असंभव था और खुद अमेरिका भी भारत में एक बड़ी संभावना देख रहा था, दूसरे अमेरिका से इंदिरा गांधी की नजदीकी के पीछे खुद को रूस पर निर्भर न दिखाने की मानसिकता भी काम कर रही थी।

हालांकि मिड डे मील और सूचना तकनीकी क्रांति के अध्यायों में अनपेक्षित विस्तार है, लेकिन आजाद भारत की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए यह एक जरूरी और दस्तावेजी किताब है।
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