हुआ वह अकल्पनीय था, एक नया इतिहास लिखा गया। अनुच्छेद 370 का समापन व साथ ही 35 ए का भी इतिहास हो जाना। लद्दाख का केंद्रशासित होना तो प्रतीक्षित था, लेकिन जम्मू-कश्मीर को केंद्रशासित बनाना, बहुत हिम्मत भरा फैसला है। समाधान की बात से पहले कश्मीर की जनसांख्यिकी की समझ जरूरी है। जम्मू एवं कश्मीर में 85 लाख मुस्लिम, जिनमें 61 लाख सुन्नी, 12 लाख शिया, 12 लाख गूजर बकरवाल हैं तथा 36 लाख हिंदू और शेष बौद्ध व सिख मिलाकर कुल आबादी लगभग 1.25 करोड़ है। घाटी की 69 लाख आबादी में से 53 लाख सुन्नी, 10 लाख शिया, व छह लाख गूजर बकरवाल हैं।
जम्मू संभाग में 63 प्रतिशत आबादी हिंदू, 33 प्रतिशत मुस्लिम, शेष सिख है। पीर पंजाल पर्वतमाला कश्मीर घाटी से जम्मू को अलग करती है। जब वर्ष 1846 में जम्मू के डोगरा महाराजा गुलाब सिंह ने अंग्रेजों से कश्मीर को समझौते के तहत अपने नियंत्रण में लिया, कश्मीर घाटी में तब तक बड़े पैमाने पर धर्मपरिवर्तन हो चुका था। फिर भी वहां पंडितों की एक बड़ी तादाद थी। घाटी का संपर्क जम्मू या शेष भारत से बनिहाल दर्रे से ही रहा है। जबकि पश्चिम से मुजफ्फराबाद से होकर आने वाला मुख्य मार्ग घाटी की पंजाब सीमाप्रांत से सीधा जोड़ता है।
इस भौगोलिक अलगाव के कारण कश्मीर घाटी और जम्मू क्षेत्र में संस्कृतियों का विकास भिन्न रूप से हुआ। जम्मू मुख्यतः डोगरा राजपूतों का क्षेत्र रहा है। कश्मीर घाटी ब्राह्मणों की सांस्कृतिक धार्मिक परंपरा का केंद्र बनी। लद्दाख पूर्वी दिशा की ऊंची पहाड़ियों से घिरकर तिब्बती बौद्ध परंपरा का क्षेत्र बना। इस्लामी संपर्कों, दबावों फिर हमलों के प्रभाव से कश्मीर घाटी का क्रमशः इस्लामीकरण होता गया। लेकिन यह इस्लाम हिंदू परंपराओं से सह अस्तित्व का सूफी इस्लाम था, जो अब क्षीण होकर वहाबी इस्लाम को स्थान दे रहा है।