फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

समाज: जातिगत सर्वे के सामाजिक-आर्थिक पहलू, उम्मीद पूरी नहीं कर सका टॉप-डाउन का विकास मॉडल

प्रो. अरुण कुमार
Updated Wed, 04 Oct 2023 07:47 AM IST

सार

आज यदि जाति गणना की जरूरत पड़ी है, तो इसकी वजह यह है कि आजादी के बाद से हमने टॉप-डाउन के विकास मॉडल को अपनाया। सोच यह थी कि विकास के लाभ ऊपरी तबके से होते हुए नीचे तक जाएंगे। पर ऐसा हुआ नहीं, नतीजतन, कमजोर वर्ग विकास की दौड़ में पिछड़ते चले गए।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला


बिहार में हुए सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में सबसे बड़ी आबादी अत्यंत पिछड़ा वर्ग की है, जो कुल आबादी के करीब 36 फीसदी है। इससे बिहार की स्थिति का तो पता चल रहा है, लेकिन पूरे देश में क्या स्थिति है, वह भी पता चलना चाहिए।  लिहाजा, अब केंद्र सरकार पर यह दबाव बढ़ जाएगा कि राष्ट्रीय स्तर पर आंकड़े तैयार करके सार्वजनिक करे, ताकि कुल आबादी में जातिगत अनुपात का पता चल सके, जिससे उनके रोजगार एवं शिक्षा में बेहतर हिस्सेदारी के लिए आवश्यक नीतियां बनाई जा सकें।


बिहार की कुल आबादी में अत्यंत पिछड़ा वर्ग का अनुपात बढ़ गया है, जो स्वाभाविक लगता है। इसकी वजह यह है कि अत्यंत पिछड़ा वर्ग में गरीबी ज्यादा है। जो गरीब होते हैं, वे शिक्षा व जागरूकता की कमी तथा बुढ़ापे में अपनी सामाजिक सुरक्षा के लिए ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। गरीबों के पास बचत तो होती नहीं, ऐसे में बच्चे ही उनके लिए सामाजिक सुरक्षा का आधार होते हैं। वे यह सोचते हैं कि ज्यादा बच्चे होंगे, तो ज्यादा कमाकर लाएंगे और बुढ़ापे में उनका ख्याल रखेंगे। लेकिन जैसे-जैसे लोगों की समृद्धि बढ़ती है, परिवार में खुशहाली बढ़ती है, वैसे-वैसे लोग कम बच्चे पैदा करते हैं। मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर होती है, इसलिए वे लोग कम बच्चे पैदा करते हैं, जिससे उनकी जनसंख्या धीमी गति से बढ़ती है।


अब सवाल उठता है कि हमें करना क्या है। ऊपरी जाति के लोग इस बात से चिंतित हैं कि चूंकि अत्यंत पिछड़ी जातियों का आबादी में ज्यादा अनुपात है, इसलिए उनकी आरक्षण की मांग बढ़ जाएगी। मेरा मानना है कि अगर हम शुरू से ही अत्यंत पिछड़ी जातियों को रोजगार और शिक्षा में ज्यादा तवज्जो देते, तो आज जो यह स्थिति आई है, वह नहीं आई होती। अगर रोजगार पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हों, तो आरक्षण से कोई फर्क नहीं पड़ता है। आरक्षण से तब फर्क पड़ता है, जब रोजगार का संकट होता है।


रोजगार के संकट की स्थिति में ही आरक्षण को लेकर झगड़ा पैदा होता है कि किसको कितना रोजगार मिल रहा है। इस समय चूंकि रोजगार का भारी संकट है, बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है, सरकारी नौकरियां कम हैं, ऐसे में आरक्षण की मांग बढ़ रही है। समस्या इसलिए बढ़ी है कि आजादी के बाद हमने टॉप-डाउन एवं ट्रिकल-डाउन की नीति अपनाई। इसका नतीजा यह हुआ कि समाज के ऊपरी तबके को तो सभी फायदे मिले, लेकिन निचले तबके को लाभ नहीं मिला या मिला भी, तो बहुत कम। इसलिए झगड़ा बढ़ गया।


नई प्रौद्योगिकी ने भी बेरोजगारी बढ़ाने में योगदान दिया है। हमारे देश में रोजगार सृजन में कृषि क्षेत्र का सर्वाधिक योगदान रहा है, लेकिन ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर, थ्रेसर, आलू खोदने की मशीन इत्यादि का इस्तेमाल बढ़ने से रोजगार पैदा नहीं हो पा रहा है। इसके अलावा, हमारी सरकारें भी अभी ऐसी नीतियां अपना रही हैं, जिनमें संगठित क्षेत्र को तो बढ़ावा मिलता है, लेकिन असंगठित क्षेत्र (जहां ज्यादातर लोग काम करते हैं) पिछड़ता चला जा रहा है।


उदाहरण के लिए, सरकार ने कॉरपोरेट सेक्टर को कर छूट दी, पीएलए स्कीम चलाई, जबकि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के आवंटन में कटौती कर दी। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र के आवंटन में भी कटौती कर दी गई है, जबकि इन दोनों क्षेत्रों में ज्यादा रोजगार पैदा होता है। ज्यादातर निवेश बड़ी-बड़ी परियोजनाओं में किया जा रहा है, जहां आधुनिक प्रौद्योगिकी के जरिये मानव श्रम को विस्थापित किया जा रहा है। इन वजहों से समाज में असमानता की खाई और चौड़ी होती चली गई और यह झगड़ा ज्यादा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसलिए जो नीचे का तबका और उन तबकों के लिए सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियां मांग करने लगी हैं कि अत्यंत पिछड़ी जातियों को आबादी में उसके अनुपात के हिसाब से आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए।
विज्ञापन


बिहार के जातिगत सर्वे के सार्वजनिक होने से अन्य राज्यों में भी ऐसे सर्वे कराए जाने की मांग तो उठने ही लगी है, अब यह भी मांग उठेगी कि आरक्षण की अधिकतम सीमा, जो 50 फीसदी निर्धारित है, उसे बढ़ाया जाए। लेकिन असली मुद्दा रोजगार संकट का है, गरीबों के बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलने का है। जब सामाजिक रूप से सही नीतियों को समय पर लागू नहीं किया जाता है, तो सामाजिक संघर्ष होता है और अलगाव फैलता है। हम उन नीतियों को लागू करने के लिए मजबूर हैं, जो राष्ट्र के लिए अनुकूल नहीं हैं।


जातिगत सर्वे के विरोधी यह तर्क देते हैं कि इस तरह के सर्वे के आंकड़ों में जिन जातियों की संख्या कम होगी, वे परिवार नियोजन की नीतियों को दरकिनार कर अपनी आबादी बढ़ाने की होड़ में लग जाएंगे। लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। दुनिया भर में जैसे-जैसे परिवार में समृद्धि बढ़ती है, शिक्षा का स्तर बढ़ता है, लोग परिवार नियोजन को अपनाते हैं और कम बच्चे पैदा करते हैं। कम आबादी वाले समृद्ध परिवारों के लोग अपने बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने के लिए उन्हें शिक्षा एवं रोजगार के लिए विदेश में भेजने लगेंगे और यह अब भी हो रहा है।


बिहार के जातिगत सर्वे के आंकड़ों के राजनीतिक निहितार्थ तो स्पष्ट हैं ही और इसका राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर पड़ना लाजिमी है। सभी राजनीतिक पार्टियां इसका अपने-अपने ढंग से इस्तेमाल करना चाहेंगी और देश में एक बार फिर से मंडल-कमंडल की राजनीति और बढ़ जाएगी। लेकिन भाजपा के लिए स्थिति थोड़ी भिन्न है, क्योंकि पिछले कुछ चुनावों में भाजपा को पिछड़ी जातियों का काफी वोट मिला है। आने वाले चुनाव में राजनीतिक पार्टियां आरक्षण के मुद्दे को जोर-शोर से उठा सकती हैं। आरक्षण की अधिकतम निर्धारित सीमा को बढ़ाने की भी मांग उठ सकती है। सत्ता पक्ष बेशक इसे बढ़ाना नहीं चाहेगा, लेकिन संभावित चुनावी नुकसान को देखते हुए वह भी मुखर विरोध नहीं करेगा, बल्कि सनातन, आतंकवाद, चीन-पाकिस्तान जैसे अन्य मुद्दों की तरफ बहस को मोड़ना चाहेगा। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next