लेजिस्लेटिव रिसर्च एजेंसी ‘पीआरएस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 में, राज्यों द्वारा केंद्र सरकार की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र में लगभग 72 फीसद अधिक खर्च करने की उम्मीद की गई थी। स्पष्ट है कि सार्वजनिक क्षेत्र में होने वाले खर्च के अधिकांश फैसले केंद्र के दायरे से बाहर हैं। ऐसे में ज्यादातर केंद्रीय योजनाएं, जैसे स्वच्छ भारत और स्मार्ट सिटीज मिशन, राज्य के अधिकारियों द्वारा वास्तविक कार्यान्वयन पर ही निर्भर करती हैं।
नौकरशाही को लेकर मोदी सरकार पहले से ही कुछ सकारात्मक उपायों की ओर प्रतिबद्ध है, जैसे नौकरशाही में पेशेवरों का प्रवेश एक स्वागत योग्य पहल है, हालांकि, इससे नौकरशाही की मानसिकता बदलने में ज्यादा मदद नहीं मिली है, इसके कुछ व्यावहारिक कारण हैं। पहला और प्रमुख कारण यह है कि पेशेवरों को निजी क्षेत्र में प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कृत किया जाता है और यही उन्हें लीक से हटकर, सकारात्मक परिणाम पाने के लिए प्रोत्साहित करता है।