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अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने का कौशल : ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां आमूल चूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है

राजीव मिश्रा
Updated Fri, 09 Aug 2019 01:09 AM IST
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अर्थव्यवस्था

लेजिस्लेटिव रिसर्च एजेंसी ‘पीआरएस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 में, राज्यों द्वारा केंद्र सरकार की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र में लगभग 72 फीसद अधिक खर्च करने की उम्मीद की गई थी। स्पष्ट है कि सार्वजनिक क्षेत्र में होने वाले खर्च के अधिकांश फैसले केंद्र के दायरे से बाहर हैं। ऐसे में ज्यादातर केंद्रीय योजनाएं, जैसे स्वच्छ भारत और स्मार्ट सिटीज मिशन, राज्य के अधिकारियों द्वारा वास्तविक कार्यान्वयन पर ही निर्भर करती हैं।

नौकरशाही को लेकर मोदी सरकार पहले से ही कुछ सकारात्मक उपायों की ओर प्रतिबद्ध है, जैसे नौकरशाही में पेशेवरों का प्रवेश एक स्वागत योग्य पहल है, हालांकि, इससे नौकरशाही की मानसिकता बदलने में ज्यादा मदद नहीं मिली है, इसके कुछ व्यावहारिक कारण हैं। पहला और प्रमुख कारण यह है कि पेशेवरों को निजी क्षेत्र में प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कृत किया जाता है और यही उन्हें लीक से हटकर, सकारात्मक परिणाम पाने के लिए प्रोत्साहित करता है।



प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन की अनुपस्थिति में, पेशेवर भी नौकरशाही के कामकाज करने के तरीके के अनुरूप ही काम करने लगते हैं और यहीं पर इस नए प्रयोग के विफल होने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां आमूल चूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।

हाल में आई विश्व बैंक की 2018 की कारोबार करने को सरल बनाने वाले रिपोर्ट में यह कहा गया है की जीएसटी फाइलिंग में लगने वाले समय में बढ़ोत्तरी हुई है। 2017 में कारोबारियों को कर अदायगी में लगने वाला समय लगभग 214 घंटे का था, जो 2018 में 275.4 घंटे का हो गया। इसी रिपोर्ट में विभिन्न पैमानों पर 'इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड’ के प्रभाव का अध्ययन किया गया है।

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लेजिस्लेटिव रिसर्च एजेंसी ‘पीआरएस’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 में, राज्यों द्वारा केंद्र सरकार की तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र में लगभग 72 फीसद अधिक खर्च करने की उम्मीद की गई थी। स्पष्ट है कि सार्वजनिक क्षेत्र में होने वाले खर्च के अधिकांश फैसले केंद्र के दायरे से बाहर हैं। ऐसे में ज्यादातर केंद्रीय योजनाएं, जैसे स्वच्छ भारत और स्मार्ट सिटीज मिशन, राज्य के अधिकारियों द्वारा वास्तविक कार्यान्वयन पर ही निर्भर करती हैं।

नौकरशाही को लेकर मोदी सरकार पहले से ही कुछ सकारात्मक उपायों की ओर प्रतिबद्ध है, जैसे नौकरशाही में पेशेवरों का प्रवेश एक स्वागत योग्य पहल है, हालांकि, इससे नौकरशाही की मानसिकता बदलने में ज्यादा मदद नहीं मिली है, इसके कुछ व्यावहारिक कारण हैं। पहला और प्रमुख कारण यह है कि पेशेवरों को निजी क्षेत्र में प्रदर्शन के आधार पर पुरस्कृत किया जाता है और यही उन्हें लीक से हटकर, सकारात्मक परिणाम पाने के लिए प्रोत्साहित करता है।

प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन की अनुपस्थिति में, पेशेवर भी नौकरशाही के कामकाज करने के तरीके के अनुरूप ही काम करने लगते हैं और यहीं पर इस नए प्रयोग के विफल होने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां आमूल चूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है।

हाल में आई विश्व बैंक की 2018 की कारोबार करने को सरल बनाने वाले रिपोर्ट में यह कहा गया है की जीएसटी फाइलिंग में लगने वाले समय में बढ़ोत्तरी हुई है। 2017 में कारोबारियों को कर अदायगी में लगने वाला समय लगभग 214 घंटे का था, जो 2018 में 275.4 घंटे का हो गया। इसी रिपोर्ट में विभिन्न पैमानों पर 'इन्सॉल्वेंसी ऐंड बैंकरप्सी कोड’ के प्रभाव का अध्ययन किया गया है।

दिवालियेपन की घोषणा के बाद कर्ज नहीं लौटाने की बढ़ती परंपरा में भारत 2017 में 103 वें पायदान पर था वहीं 2018 में भारत 108 वें पायदान पर आ गया। निस्संदेह सरकार के सकारात्मक इरादों के बावजूद, गलत और बेमन से क्रियान्वित सुधारों ने देश के कारोबारी माहौल को बिगाड़ा है। केंद्र सरकार को न सिर्फ सब्सिडी जैसे संरक्षणवादी उपायों पर फिर एक गहन विचार करने की आवश्यकता है, बल्कि कुछ और मामलों में भी उदाहरण स्वरूप, 2016 के रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम को भी दोबारा परखने की आवश्यकता है।

स्किल डेवलपमेंट मिशन के मामले में भी कई कमियां रही हैं, उद्योग जगत के साथ इस मामले में कंधे से कंधा मिलाकर बढ़ने की आवश्यकता थी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। नेशनल स्किल डेवलपमेंट काॅरपोरेशन की स्थापना का मूल उद्देश्य पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ाना और स्किल डेवलपमेंट में व्यापार जगत को जोड़ना था, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस पूरे मिशन में सरकार के तरफ से लगभग 99 फीसदी फंड की भागीदारी रही जबकि इसकी फ्लैगशिप स्कीम में भी सिर्फ 12 फीसदी प्रशिक्षुओं को ही रोजगार मिला।

हमें यह समझने की जरूरत है कि किस उद्योग का वृद्धि स्तर ज्यादा है और कौन से उद्योग में रोजगार की संभावना ज्यादा है। हम कौशल प्रशिक्षण के साथ-साथ फंड के मामले में भी उद्योग जगत को कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत अपने साथ जोड़ सकते हैं। इससे न सिर्फ प्रशिक्षण की गुणवत्ता में बढ़ोतरी होगी, बल्कि सरकार के वित्तीय दबाव में भी कमी आएगी। बहरहाल, नीति आयोग में लगातार विशेषज्ञों की हो रहीं बैठकें इस सरकार के, अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के समर्पण को दर्शाता है।
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