अपनी हालिया प्रकाशित पुस्तक-द ट्रुथ अबाउट अस : द पॉलिटिक्स ऑफ इन्फॉर्मेशन फ्रॉम मनु टू मोदी- में मैंने यह दर्शाया है कि पिछली दो शताब्दी से ज्यादा समय से भारत के सामाजिक सत्य कैसे बनते आए हैं, कि कैसे यह आकार लेता है और इसके राजनीतिक एवं सामाजिक परिणाम क्या हैं। किसी भी समाज के 'सत्य' का निर्माण सूचनाओं के बुनियादी तत्वों के संगठन से होता है। सूचना का संचयन और संगठन 'सत्य' बन जाता है। अब यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि सूचना क्या है। यह कैसे पैदा होती है?
सही जानकारी के रूप में क्या स्वीकार किया जाता है, किनके द्वारा और क्यों? ये महत्वपूर्ण सवाल सूचना की राजनीति के मूल आधार हैं, जिनमें सत्ता के लोगों की पसंद, कि क्या सूचना है और क्या नहीं, सूचनाओं को समूहों में वर्गीकृत करना, श्रेणियों को भरने के लिए गणना और जिन्हें श्रेणीबद्ध किया गया है, उनसे संचार शामिल होते हैं। इन विकल्पों में से प्रत्येक महत्वपूर्ण है, वर्गीकरण सबसे ज्यादा परिणामदायी है। प्रत्येक चरण पर प्रत्येक विकल्प एक अलग सामाजिक स्थिति के लिए एक अलग रास्ता बनाता है।