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महाराष्ट्र की उलझन

Wed, 24 Sep 2014 08:46 PM IST
नीरजा चौधरी
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महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामांकन खत्म होने को अब 48 घंटे से भी कम समय रह गया है, इसके बावजूद यहां की राजनीतिक तस्वीर साफ नहीं है। शिवसेना के साथ तनातनी के बावजूद भाजपा ने महायुति के छोटे दलों को आश्वस्त किया है कि वह सभी सहयोगियों को साथ लेकर चलना चाहती है। मगर जिस तरह से शिवसेना अड़ी हुई है, उससे अब तक स्थिति स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर सत्तारूढ़ कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है।
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आमतौर पर संयत रहने वाले उद्धव ठाकरे अचानक अपने दिवंगत पिता बाला साहेब ठाकरे की तरह सख्त नजर आ रहे हैं। इससे 25 वर्ष पुराना गठबंधन ही टूटने की कगार तक पहुंचा गया। उनका यह रवैया अजीब लगता है, खासकर इसलिए कि महाराष्ट्र में इस बार भाजपा-शिवसेना गठबंधन के लिए परिस्थितियां अनुकूल मानी जा रही हैं। हाल में हुए एक सर्वेक्षण में इस गठबंधन को राज्य की 288 में से 200 सीटें मिलने का अनुमान व्यक्त किया गया है। लेकिन यदि भाजपा और शिवसेना अकेले ही चुनाव मैदान में उतरने का फैसला करें, तब तो सबके लिए मैदान खुला हो जाएगा। ऐसे समय जब भाजपा और शिवसेना में कुछ सहमति बनती दिख रही थी, महायुति के स्वाभिमानी शेतकारी संगठन और रिपब्लिकन पार्टी जैसे छोटे घटक नाराज हो गए हैं।

दूसरी ओर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के 15 वर्ष पुराने गठबंधन का हाल भी ठीक नहीं है। एनसीपी के नेता तो कोई डेढ़ महीने पहले से यह संकेत देते आए हैं कि यदि भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूटता है, तो वह भी गठबंधन के बजाय अकेले चुनाव में जाना पसंद करेंगे। कहने की जरूरत नहीं कि अलग-अलग कारणों से महाराष्ट्र के चुनाव में इन चारों दलों के दांव भारी हैं।
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कुछ सीटों के इधर-उधर होने से खास फर्क नहीं पड़ता है और माहिर राजनेता ऐसे छोटे-मोटे मतभेदों के कारण गठबंधन को दांव पर नहीं लगाते। दरअसल असली लड़ाई तो इस बात पर है कि यदि भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार बन गई, तो मुख्यमंत्री कौन होगा। उद्धव ठाकरे ने खुद को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करते हुए दावा किया है कि महाराष्ट्र का अगला मुख्यमंत्री शिवसेना से होगा। शिवसेना के अब तक के रुख से यह बिल्कुल अलग है। बाल ठाकरे के लिए सत्ता का मतलब था, मुंबई को अपने इशारे पर नियंत्रित करना। और ऐसा उन्होंने बिना मुख्यमंत्री बने किया, जबकि 1990 के दशक में उनके पास तब यह मौका था, जब उन्होंने मनोहर जोशी को गद्दी पर बिठाया था। उन्होंने सरकार से बाहर रहकर उस पर नियंत्रण करना मंजूर किया।

लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा जिस तरह उभरी है, उससे शिवसेना नेतृत्व को भय सता रहा है कि यदि उसने कड़ा रुख नहीं अपनाया, तो पार्टी के समर्थकों का आधार खिसक कर भाजपा की ओर जा सकता है। आखिर लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 24 सीटें जीती थीं और शिवसेना को 18 सीटें ही मिलीं। बाला साहब ठाकरे ने जब प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के बजाए सुषमा स्वराज को अपनी पसंद बताया था, तब वह इस राजनीतिक संभावना से अनभिज्ञ नहीं थे। दरअसल उन्होंने मुंबई के शिवाजी पार्क में हुई मोदी की पहली सभा में उनके प्रति लोगों की बढ़ती उत्सुकता को देखा था। तब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

मुख्यमंत्री पद पर दांव लगाते हुए उद्धव अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना चाहते हैं। यह 'मराठी मानुष' के नाम पर सहानुभूति बटोरने का एक सोचा समझा कदम लगता है। संदेश साफ है, प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, दोनों गुजराती हैं और उनके नेतृत्व में भाजपा मराठियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली शिवसेना को दबाने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक हलकों में ऐसी भी खबर है कि महाराष्ट्र के गुजराती कारोबारी समुदाय ने मोदी तक यह संदेश भिजवाया है कि भाजपा को मुख्यमंत्री पद से समझौता नहीं करना चाहिए, वरना मुंबई में शिवसेना के शासन में उनके लिए कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा।

उद्धव के रुख को देखते हुए प्रदेश भाजपा इस बार अकेले मैदान में उतरने को तैयार थी, मगर पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व खासतौर से हाल के उपचुनाव में भाजपा को मिले झटकों की वजह से जरा सतर्क है। हालांकि महाराष्ट्र के भाजपा नेताओं को लगता है कि मोदी का जादू अभी खत्म नहीं हुआ है। एक बात साफ है कि यदि भाजपा अपने दम पर सबसे बड़े दल के रूप में उभरती है, तो सरकार बनने की स्थिति में नेतृत्व अपने हाथ में रखना चाहेगी। और यदि उसे शिवसेना से कम सीटें मिलीं, तो उसे गठबंधन के जूनियर सहयोगी की तरह रहना मंजूर होगा। मगर भाजपा नेता इसका फैसला शिवसेना के दबाव में आकर करने के बजाय नतीजों को देखकर करना चाहते हैं।

हालांकि भाजपा एक जोखिम के साथ इस चुनाव में जा रही है। यदि चुनाव में उसका प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा, तो राष्ट्रीय स्तर पर उसके पक्ष में बना माहौल कमजोर होने लगेगा, जिससे मोदी के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है। दूसरी ओर एनसीपी आदर्श रूप में तो अपने लिए चुनाव बाद का विकल्प खुला रखना चाहेगी। अभी उसका एक ही मकसद होगा कि वह कांग्रेस से अधिक सीटें जीतकर आए और महाराष्ट्र में कांग्रेस की जगह ले ले। 1999 में सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस से अलग होने के बाद से शरद पवार का यह सपना रहा है। इसके अलावा अजित पवार और मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण एक दूसरे को फूटी आंख पसंद नहीं कर रहे हैं। सीटों को लेकर सहयोगी दलों के बीच तनातनी होती रही है, लेकिन ऐसा पहली बार है, जब आखिरी समय तक उनके बीच सहमति नहीं बन पा रही है।
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