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यादें: अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू मेरे दिल में ज्यादा बसने लगा है - पद्मा सचदेव

पद्मा सचदेव Published by: पद्मा सचदेव Updated Wed, 04 Aug 2021 11:05 AM IST
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कश्मीर - फोटो : अमर उजाला

वैसे तो जम्मू हमेशा मेरे दिल में बसता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू मेरे दिल में ज्यादा बसने लगा है। जम्मू-कश्मीर में जो राजनीतिक बदलाव किए गए हैं, उसके पीछे वहां की स्थिति बेहतर करने का लक्ष्य बताया गया है। देखिए, कुछ चीजें तो कचोटने वाली थीं ही। कुछ लोगों को प्रथम श्रेणी का नागरिक बना दिया गया था, जबकि विशिष्ट भाषा और संस्कृति के बावजूद हम द्वितीय श्रेणी के नागरिक बने रहे। इससे स्वाभाविक ही दुख पहुंचता था। जो वहां पैदा हुआ हो और जिसके मन-मस्तिष्क में अपने पहाड़, अपनी घाटियां, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति रची-बसी हो, उसके प्रति उपेक्षा और अलगाव का भाव पैदा हो, तो उसे दुख पहुंचेगा ही। अब कहा जा रहा है कि सबको बराबरी का दर्जा प्रदान करने के लिए यह कदम उठाया गया है। क्या यह वास्तव में संभव है? बराबरी की बातें की जरूर जाती हैं, लेकिन सब बराबर नहीं होते।

मैं जम्मू के ऐतिहासिक पुरमंडल गांव में पैदा हुई, जो जम्मू शहर से 40 किलोमीटर दूर शिवालिक की पहाड़ियों और गुप्त गंगा देविका के किनारे बसा एक छोटा-सा गांव  है। मैं पुरमंडल के प्रतिष्ठित राजपुरोहित परिवार से हूं। लोग हमें पहाड़ वाले पंडित कहा करते थे। मेरे पिता पंडित जयदेव शर्मा हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। मैं जो कुछ भी लिख पाई हूं, वह मेरे पिता की ही देन हैं। हालांकि जब मैं सात साल की थी, तभी वह चल बसे थे। वर्ष 1947 के दंगे में वह मारे गए थे। मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। पिता की मृत्यु के एक साल बाद जब उनकी बरसी के लिए मेरे ताऊजी हमें गांव ले गए, तो वहां डोगरी लोकगीतों से मेरा साबका पड़ा। वे लोकगीत इतने मधुर और आकर्षित करने वाले थे कि बारह-तेरह साल की छोटी उम्र में मैं डोगरी में कविताएं लिखने लगी थी।



गांव के अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों के अलावा डोगरी लोकगीतों ने मुझे कविता लिखने के लिए प्रेरित किया। सच कहूं, तो लोकगीतों के कारण ही मेरा लिखना शुरू हुआ। उस समय डोगरी का जो लोकगीत चल रहा होता, मैं उसमें छंद जोड़ देती। हालांकि कुछ और विषय मेरे मन-मस्तिष्क को मथते रहते और कविता तैयार हो जाती। जैसे समाज में व्याप्त असमानता मुझे बहुत कचोटती थी। मैं अपनी कविताओं में इसके खिलाफ लिखती थी। मैंने कविताओं में अपने को निरंतर मांजने का काम किया। चूंकि मैंने उर्दू साहित्य काफी पढ़ा, तो मेरी कविताओं में आपको इसका प्रभाव दिखेगा। कुल मिलाकर मैंने यह कोशिश की कि मेरी कविताओं पर मेरी मौलिकता की छाप रहे।

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कश्मीर - फोटो : अमर उजाला
वैसे तो जम्मू हमेशा मेरे दिल में बसता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू मेरे दिल में ज्यादा बसने लगा है। जम्मू-कश्मीर में जो राजनीतिक बदलाव किए गए हैं, उसके पीछे वहां की स्थिति बेहतर करने का लक्ष्य बताया गया है। देखिए, कुछ चीजें तो कचोटने वाली थीं ही। कुछ लोगों को प्रथम श्रेणी का नागरिक बना दिया गया था, जबकि विशिष्ट भाषा और संस्कृति के बावजूद हम द्वितीय श्रेणी के नागरिक बने रहे। इससे स्वाभाविक ही दुख पहुंचता था। जो वहां पैदा हुआ हो और जिसके मन-मस्तिष्क में अपने पहाड़, अपनी घाटियां, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति रची-बसी हो, उसके प्रति उपेक्षा और अलगाव का भाव पैदा हो, तो उसे दुख पहुंचेगा ही। अब कहा जा रहा है कि सबको बराबरी का दर्जा प्रदान करने के लिए यह कदम उठाया गया है। क्या यह वास्तव में संभव है? बराबरी की बातें की जरूर जाती हैं, लेकिन सब बराबर नहीं होते।

मैं जम्मू के ऐतिहासिक पुरमंडल गांव में पैदा हुई, जो जम्मू शहर से 40 किलोमीटर दूर शिवालिक की पहाड़ियों और गुप्त गंगा देविका के किनारे बसा एक छोटा-सा गांव  है। मैं पुरमंडल के प्रतिष्ठित राजपुरोहित परिवार से हूं। लोग हमें पहाड़ वाले पंडित कहा करते थे। मेरे पिता पंडित जयदेव शर्मा हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। मैं जो कुछ भी लिख पाई हूं, वह मेरे पिता की ही देन हैं। हालांकि जब मैं सात साल की थी, तभी वह चल बसे थे। वर्ष 1947 के दंगे में वह मारे गए थे। मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। पिता की मृत्यु के एक साल बाद जब उनकी बरसी के लिए मेरे ताऊजी हमें गांव ले गए, तो वहां डोगरी लोकगीतों से मेरा साबका पड़ा। वे लोकगीत इतने मधुर और आकर्षित करने वाले थे कि बारह-तेरह साल की छोटी उम्र में मैं डोगरी में कविताएं लिखने लगी थी।

गांव के अद्भुत प्राकृतिक दृश्यों के अलावा डोगरी लोकगीतों ने मुझे कविता लिखने के लिए प्रेरित किया। सच कहूं, तो लोकगीतों के कारण ही मेरा लिखना शुरू हुआ। उस समय डोगरी का जो लोकगीत चल रहा होता, मैं उसमें छंद जोड़ देती। हालांकि कुछ और विषय मेरे मन-मस्तिष्क को मथते रहते और कविता तैयार हो जाती। जैसे समाज में व्याप्त असमानता मुझे बहुत कचोटती थी। मैं अपनी कविताओं में इसके खिलाफ लिखती थी। मैंने कविताओं में अपने को निरंतर मांजने का काम किया। चूंकि मैंने उर्दू साहित्य काफी पढ़ा, तो मेरी कविताओं में आपको इसका प्रभाव दिखेगा। कुल मिलाकर मैंने यह कोशिश की कि मेरी कविताओं पर मेरी मौलिकता की छाप रहे।

उस दौर की एक घटना मुझे आज भी खास तौर पर याद है, जिसका जिक्र मैंने आत्मकथा में किया है। पिता की मृत्यु के बाद मां की बाजार कसाबा स्कल, जम्मू में नौकरी लग गई थी। वह वहां पढ़ाती थीं। एक दिन वह रोती हुई घर आई, तो मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ? वह कहने लगीं, इंस्पेक्टर मिसेज ठूसू ने सभी शिक्षकों के साथ-साथ मुझे भी डांटा है। मेरे तन-बदन में आग लग गई। मैं संतानों में सबसे बड़ी थी। मैं उसी समय इंस्पेक्टर के घर पर चली गई। मैंने उन्हें याद दिलाया कि जो आपने भोगा है,  मेरी मां ने उससे कहीं ज्यादा भोगा है। हम तीन बच्चे हैं और मेरी मां महज बाईस साल की औरत है। आपने मेरी मां को डांटा है, लिहाजा वह अब इस स्कूल में कभी नहीं आएगी। इंस्पेक्टर मुझे जानती थीं। वह मुझे बुलाती रह गईं, लेकिन मैं अपना फैसला सुनाकर निकल गई। मां उसके बाद स्कूल नहीं गईं। गनीमत यह थी कि थोड़े दिनों बाद उन्हें पिता की पेंशन मिलने लगी।     

गांव की पहाड़ियां आज भी मुझे याद आती हैं। आज भी जब मैं कविता लिखती हूं, तो मन ही मन पहाड़ियों तक पहुंच जाती हूं। जब छोटी थी, तब मैं ऊपर से नीचे तक पूरा जम्मू शहर घूम लेती थी। जम्मू से इस अनुराग के कारण ही शादी के बाद मैंने अपने पति से जम्मू में एक घर लेने के लिए कहा था। वे दिन कितने खुशनुमा थे। मैं रघुनाथ मंदिर में जाती, तो शहर के सभी साहित्यकारों से मिल लेती। आखिर मेरे परिचितों में ज्यादातर साहित्यिक बिरादरी के लोग ही तो थे। आज का जम्मू वह जम्मू नहीं रह गया है। हालांकि जम्मू मेरा जाना-आना तो लगा ही रहता है। लेकिन अब तो गाड़ी से जाना होता है और लोगों से मेल-मुलाकात का सिलसिला बहुत कम रह गया है।

जम्मू,  कश्मीर और लद्दाख के साथ डोगरी भाषा और संस्कृति की भी चर्चा हो रही है। पूछा यह जा रहा है कि डोगरी भाषा का क्या भविष्य है? लेकिन मेरा यह सवाल है कि दक्षिण भारत क़ी भाषाओं को छोड़ दें, तो शेष दूसरी भाषाओं का क्या भविष्य है। डोगरी भाषा में मेरे अलावा भी लिखने वाले बहुत हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि डोगरी में लिखने वाले ज्यादातर साहित्यकार पुरस्कार की ही ज्यादा कामना करते हैं। हालांकि ऐसा सिर्फ डोगरी में नहीं है, दूसरी भाषाओं में भी यही हाल है। लेकिन मेरे लिए यह परिदृश्य बहुत दुखद है।

मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि कोई सिर्फ पुरस्कार पाने के लिए लिखता है। मुझे तो बहुत जल्दी ही पुरस्कार मिल गया था। मुझे तीस साल की उम्र में ही साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल गया था। तब मुझे समझ में ही नहीं आया था कि यह है क्या। सच कहूं, तो मैंने कभी पुरस्कार पाने की कामना नहीं की। बहुत-से कवि-लेखक ऐसे हैं, जो मेरी तरह सोचते हैं।

जहां तक डोगरी की बात है, तो वह बहुत ही खूबसूरत भाषा है। वर्ष 2015 में डोगरी में लिखी गई आत्मकथा चित्त चेते के लिए जब मुझे सरस्वती सम्मान मिला था, तब मैंने कहा था, यह दुनिया खूबसूरत शब्दों से भरी हुई है, जिनसे कहानी बनती है। इनमें से कुछ मेरी अपनी भाषा डोगरी में है। और मुझे जो सम्मान मिला है, उस पर पूरे डोगरी समुदाय को गर्व है। वैसे मैं बता दूं कि चित्त का अर्थ होता है मन और चेते का मतलब होता है स्मृतियां। डोगरी लोकगीतों से मिली प्रेरणा ने ही मुझे यहां    तक पहुंचाया। मैं डोगरी की बिल्कुल शुरुआती कवयित्री हूं। डोगरी में मैंने कहानियां भी लिखी हैं। शुरुआत में मैं जम्मू और कश्मीर रेडियो में स्टाफ कलाकार के रूप में कार्यरत थी। उसके बाद मैंने दिल्ली रेडियो में डोगरी समाचार वाचिका के रूप में काम किया।      

इधर कुछ लिखने का मन है। लेकिन शरीर के अपने बंधन हैं। हालांकि जब से मैं पैदा हुई हूं, तब से शायद ही मैं कभी ठीक रही हूं। लेकिन जब मैं कागज पर कलम से नहीं लिख पाती, तब भी मन ही मन में लिखती हूं। यह भी एक अच्छा अनुभव है।
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