वैसे तो जम्मू हमेशा मेरे दिल में बसता है, लेकिन जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू मेरे दिल में ज्यादा बसने लगा है। जम्मू-कश्मीर में जो राजनीतिक बदलाव किए गए हैं, उसके पीछे वहां की स्थिति बेहतर करने का लक्ष्य बताया गया है। देखिए, कुछ चीजें तो कचोटने वाली थीं ही। कुछ लोगों को प्रथम श्रेणी का नागरिक बना दिया गया था, जबकि विशिष्ट भाषा और संस्कृति के बावजूद हम द्वितीय श्रेणी के नागरिक बने रहे। इससे स्वाभाविक ही दुख पहुंचता था। जो वहां पैदा हुआ हो और जिसके मन-मस्तिष्क में अपने पहाड़, अपनी घाटियां, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति रची-बसी हो, उसके प्रति उपेक्षा और अलगाव का भाव पैदा हो, तो उसे दुख पहुंचेगा ही। अब कहा जा रहा है कि सबको बराबरी का दर्जा प्रदान करने के लिए यह कदम उठाया गया है। क्या यह वास्तव में संभव है? बराबरी की बातें की जरूर जाती हैं, लेकिन सब बराबर नहीं होते।
मैं जम्मू के ऐतिहासिक पुरमंडल गांव में पैदा हुई, जो जम्मू शहर से 40 किलोमीटर दूर शिवालिक की पहाड़ियों और गुप्त गंगा देविका के किनारे बसा एक छोटा-सा गांव है। मैं पुरमंडल के प्रतिष्ठित राजपुरोहित परिवार से हूं। लोग हमें पहाड़ वाले पंडित कहा करते थे। मेरे पिता पंडित जयदेव शर्मा हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। मैं जो कुछ भी लिख पाई हूं, वह मेरे पिता की ही देन हैं। हालांकि जब मैं सात साल की थी, तभी वह चल बसे थे। वर्ष 1947 के दंगे में वह मारे गए थे। मैं भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। पिता की मृत्यु के एक साल बाद जब उनकी बरसी के लिए मेरे ताऊजी हमें गांव ले गए, तो वहां डोगरी लोकगीतों से मेरा साबका पड़ा। वे लोकगीत इतने मधुर और आकर्षित करने वाले थे कि बारह-तेरह साल की छोटी उम्र में मैं डोगरी में कविताएं लिखने लगी थी।