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Big Scam: कॉरपोरेट जवाबदेही तय करने की दरकार

नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Tue, 10 Jan 2023 04:52 AM IST

सार

आम तौर पर धन या वित्तीय एहसान प्राप्त करने के लिए ऐसे अपराध होते हैं और कोचर ऐसे अपराध की पक्षकार थीं, जिसमें उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने पति की कंपनी में निवेश करने के बदले वेणुगोपाल धूत को ऋण प्रदान किया। 
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Chanda Kochar - फोटो : Social Media


जिस मामले में चंदा कोचर संलिप्त हैं, उसमें जांच एजेंसियों के लिए धोखाधड़ी का पता लगाना व्यावहारिक रूप से बहुत मुश्किल है। इसके अलावा, बैंक में उनके शीर्ष पद पर होने के कारण उनके सहयोगियों के लिए उनसे सवाल करना या उन पर संदेह करना लगभग असंभव था। अक्सर ऐसी उच्च स्तर की धोखाधड़ी बड़ी गोपनीयता से की जाती है और किसी का ध्यान नहीं जाता। आम तौर पर धन या वित्तीय एहसान प्राप्त करने के लिए ऐसे अपराध होते हैं और कोचर ऐसे अपराध की पक्षकार थीं, जिसमें उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने पति की कंपनी में निवेश करने के बदले वेणुगोपाल धूत को ऋण प्रदान किया। 


यह पहली बार नहीं है, जब भारत के कॉरपोरेट जगत या बैंकिंग प्रणाली में सफेदपोश अपराध हुआ है। अतीत में अलग-अलग आकार और पैमाने पर ऐसे कई अपराध हुए हैं, जैसे सत्यम कंप्यूटर घोटाला, यस बैंक ऋण घोटाला, केतन पारेख शेयर बाजार घोटाला, विजय माल्या, नीरव मोदी और कई अन्य द्वारा बैंक का उधार न चुकाने जैसे अपराध। ऐसे अपराध सिर्फ बड़े लोग नहीं करते, कई छोटे खिलाड़ी भी ऐसे अपराधों के लिए जाने जाते हैं। पर बड़े खिलाड़ियों के नाम ही आम आदमी का ध्यान खींचते हैं। बहुत लोगों को हैरानी है कि चंदा कोचर को ऐसा अपराध करने की क्या जरूरत थी, जबकि वह अपने पेशे में शीर्ष पर थीं और शुरुआत से ही वह जिस बैंक का हिस्सा रही थीं, उसमें अभी कई वर्षों तक उन्हें नेतृत्व करना था। लेकिन अक्सर सफेदपोश अपराध यह मानकर किए जाते हैं कि इस पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा या जब व्यक्ति नैतिक निर्णय लेने की क्षमता खो देता है, तो कार्य में मर्यादा नहीं रह जाती है। 


सही और गलत के बीच जब धुंधली रेखा मिट जाती है, तो यह संस्था के साथ-साथ व्यक्ति के  लिए भी हानिकारक हो सकती है। बड़े संस्थानों में ऐसी धोखाधड़ी का कारण बनने वाली स्थितियों को रोकने के लिए नियम बनाए जाते हैं, फिर भी धोखाधड़ी करने की नई विधि खोज ली जाती है। नियामकों, निवेशक कार्यकर्ताओं और कॉरपोरेट प्रशासन के नियमों को नियमित रूप से अद्यतन करने की आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हम अपराध करने के नए तरीकों के शिकार न हों। संगठनों में अत्यधिक शक्तिशाली और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता हासिल कर लेने से उचित कामकाज सुनिश्चित करने के लिए नियंत्रण और संतुलन समाप्त हो जाता है। स्वतंत्र निदेशकों की भूमिका, व्हिसल ब्लोअर नीति की स्थापना और कॉरपोरेट प्रशासनिक नियम धोखाधड़ी के बेशर्म कृत्यों की जांच सुनिश्चित करने के प्रयास हैं। कोचर के मामले में वह जिस अपराध का हिस्सा हैं, वह कुछ ऐसा है, जिसे क्षमा नहीं किया जा सकता। वह दूसरों के लिए भी उदाहरण पेश कर रही हैं कि ऐसे अपराधों को न तो माफ किया जा सकता है और न ही नजर अंदाज किया जा सकता है। 


भारतीय कंपनियों में कॉरपोरेट गवर्नेंस अनिवार्य है, खासकर कंपनी अधिनियम, 2013 में संशोधन के बाद। नया अधिनियम विस्तृत होने के साथ नए अनुपालन मानदंडों के माध्यम से प्रकटीकरण, रिपोर्टिंग और पारदर्शिता को बढ़ाकर कॉरपोरेट प्रशासन के लिए एक औपचारिक ढांचा प्रदान करता है। इसके अलावा, कई अन्य अधिनियम और दिशा-निर्देश कई नियामकों और गैर-नियामक निकायों द्वारा प्रदान किए गए हैं, जिनमें समय-समय पर कॉरपोरेट प्रशासन को बढ़ाने के लिए कोड और दिशा-निर्देश शामिल हैं। इतने सारे चेक और बैलेंस के बावजूद, कुछ बुरे लोग हैं, जो कई अन्य संस्थानों के अच्छे काम को बिगाड़ देते हैं। इसका एकमात्र तरीका यह है कि कमियों को दूर करने की दिशा में लगातार काम किया जाए, ताकि कॉरपोरेट अनाचार पूरी तरह से दूर न हो सके, तो भी उसकी आशंका कम हो जाए। अपराधियों को दंडित करना दूसरों के बीच अनुशासन और भय पैदा करने का एक तरीका है, ताकि कानून तोड़ने की सोचने वाले वालों को हतोत्साहित किया जा सके। 


कॉरपोरेट जगत के लिए सबक यह है कि सभी मोर्चों पर एकमात्र निर्णय लेने की क्षमता एक इकाई या व्यक्ति के हाथ में न दी जाए। निर्णय लेने में टीमों और व्यक्तियों के समूह को शामिल करने की आवश्यकता है, विशेष रूप से वैसे निर्णय, जिनमें वित्तपोषण शामिल है या वे कार्य शामिल हैं, जो कंपनी की छवि को प्रभावित कर सकते हैं। चंदा कोचर ने आईसीआईसीआई बैंक से बाहर निकलने की कोशिश की थी, जब बैंक की आंतरिक जांच में उन्हें पक्षकार बनाया गया था, जिसमें उन्हें क्लीन चिट देना अस्वीकार्य है। बाद में एक स्वतंत्र जांच में उन्हें दोषी पाए जाने पर उनकी बेगुनाही पर सवाल खड़ा हो गया। उनका इस्तीफा स्वीकार करने के बजाय उन्हें पिछली तारीख से बर्खास्त कर दिया गया था। 


उच्च नैतिक मूल्यों वाले एक बैंकर की उनकी छवि खत्म हो चुकी है और यहां तक कि उनके कुछ अच्छे काम भी संदेह के घेरे में हैं। कॉरपोरेट संस्थाएं अब एकल व्यक्ति नेतृत्व के तहत नहीं रह सकती हैं; शक्तिशाली व्यक्तियों को उस संस्था से अलग करने की आवश्यकता है, जिसके वे प्रमुख हैं। कोचर का मामला सिर्फ एक शुरुआत है, उम्मीद है कि ऐसे बहुत से नाम न केवल बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में, बल्कि अन्य व्यवसायों में भी सामने आएंगे, जहां अनुचित कार्य हुए हैं। 

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