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रणनीतिक साझेदारी को बचाएं

Tue, 14 Jan 2014 11:30 PM IST
सुरेंद्र कुमार
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दो वर्ष पहले जब अन्ना हजारे ने पहला भ्रष्टाचार विरोधी अनशन किया था, तो दिल्ली के लोग सड़कों पर उतर पड़े थे। उस समय सरकार ने प्रतिक्रिया जताने के अलावा कुछ नहीं किया था, कभी-कभी तो वह भ्रमित एवं निरुपाय नजर आ रही थी। चूंकि लोकसभा के चुनाव करीब हैं, ऐसे में सरकार कमजोर दिखना नहीं चाहती और किसी धमकी के आगे झुकना बर्दाश्त नहीं कर सकती।
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विवादप्रिय भारतीय भी किसी मुद्दे पर एकजुट हो जाते हैं। और अगर मामला किसी साथी सहकर्मी से जुड़ा हो, तो अधिकारियों की पूरी बिरादरी एकसाथ उठ खड़ी होती है। इन सभी कारकों ने देवयानी खोबरागड़े के मामले पर असर डाला।

देवयानी के साथ जैसा अमानवीय व्यवहार किया गया, उसने पूरे देश को आक्रोश से भर दिया। आखिरकार छवि बचाने के लिए हम एक समझौता कर पाए। ज्यादातर भारतीय इसी बात से खुश हैं कि देवयानी लौट आई है। पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा ने अभियोग लगने के बाद अमेरिका के माफी मांगे बिना देवयानी की वापसी को भारत की हार बताया, जबकि कुछ लोग इसे आधी जीत बताते हैं।
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देवयानी के पिता भी इसे जीत बताते हैं। उनके वकील ने दावा किया कि वह सिर उठाकर वापस लौटी हैं। भारतीय विदेश सेवा बिरादरी राहत महसूस कर रही है और अब मीडिया ने अपना ध्यान आम आदमी पार्टी पर केंद्रित कर लिया है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल मानते हैं कि अमेरिकी कार्रवाई ने भारत को दुखी किया है और 'दोनों देशों के बीच संवाद बुरी तरह प्रभावित हुआ है।'

जाहिर है, इस पूरे प्रकरण में कोई विजेता नहीं है। अमेरिकी विदेश विभाग का कोई भी बुद्धिमान राजनयिक देवयानी की गिरफ्तारी को हरी झंडी नहीं दे सकता, क्योंकि इससे भारत-अमेरिका के नकारात्मक संबंधों का असर अन्य सभी चीजों पर पड़ता है। इसके बजाय वे गिरफ्तारी और हथकड़ी लगाए बिना शुरू में ही देवयानी को भारत वापस बुलाने के लिए कह सकते थे! अगर भारतीय दूतावास और विदेश मंत्रालय ने सितंबर, 2013 में प्राप्त अमेरिकी विदेश मंत्रालय की सूचना को गंभीरता से लिया होता और देवयानी का भारत में तबादला कर दिया होता, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं होती। कानूनी मसलों पर अगर ध्यान न दें, तो अमेरिका ने देवयानी के साथ जो किया, वह गलत था। ऐसे में भारत की तीखी प्रतिक्रिया समझ में आती है।

देवयानी के रैंक के एक अमेरिकी राजनयिक को वापस बुलाने की भारत की मांग अप्रत्याशित नहीं थी, लेकिन जैसे को तैसा का यह दौर अब खत्म होना चाहिए। देवयानी प्रकरण का पोस्टमार्टम कई तरह के स्पष्टीकरण दे रहा है- भारत के साथ रणनीतिक भागीदारी में अमेरिका की दिलचस्पी घट गई है, ओबामा की उम्मीदों के मुकाबले भारत के साथ वास्तविक व्यापार बहुत कम हुआ है; परमाणु दायित्व कानून पर असहमति के साथ, बौद्धिक संपदा अधिकार, आईटी कंपनियों, नए अप्रवासन कानून जैसे कई मसलें हैं, जिनकी वजह से भारत-अमेरिकी संबंधों में गिरावट आई है। लेकिन क्या ओबामा प्रशासन ने अपनी नाराजगी जताने के लिए इस तरह के असभ्य उपायों का सहारा लिया होगा? इसकी संभावना नहीं है!

बहुत संभव है कि वायने मेय, जिनके यहां संगीता के ससुराल के लोग दिल्ली में काम करते थे और खबरें हैं कि कथित तौर पर जिन्होंने संगीता को अमेरिका भगाने में मदद की, उन्होंने वाशिंगटन में राजनयिक सुरक्षा ब्यूरो में अपने संपर्कों के जरिये देवयानी की गिरफ्तारी और अपमान में अहम भूमिका निभाई हो। लेकिन क्या उन्होंने यह सब अपने बूते किया? शायद नहीं। यह बहुत ही दुखद और मूर्खतापूर्ण होगा, यदि दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्रों ने अपने बहुत परिश्रम से बने बहुस्तरीय, बहुआयामी और परस्पर लाभप्रद रिश्ते को एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना के कारण ताश के पत्तों की तरह ढह जाने दिया होगा। मेरा मानना है कि नई दिल्ली और वाशिंगटन में ऐसे काफी बुद्धिमान राजनेता हैं, जो ऐसा नहीं होने देना चाहेंगे। दोनों पक्षों को इससे व्यावहारिक सबक लेना होगा।

'भारत विश्व मंच पर उभरा है', अमेरिका का भारत के साथ रिश्ता '21वीं सदी का सबसे निर्णायक रिश्ता' है, भारत अमेरिका का रणनीतिक साझीदार है, जिसकी क्षेत्रीय एवं वैश्विक क्षेत्र में व्यापक भूमिका है और उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में होना चाहिए-जैसे अमेरिकी वक्तव्यों को भारत को ध्यान में रखना चाहिए। भारत को अपने राजनयिकों के साथ सरकारी घरेलू नौकर भी भेजना चाहिए, जैसे कि वाहन चालक भेजा जाता है, और अमेरिका के साथ द्विपक्षीय समझौते को निष्कर्ष तक पहुंचाना चाहिए, ताकि देवयानी जैसा प्रकरण न दोहराए।

ओबामा प्रशासन को भी आज की दुनिया पर गंभीरता से नजर डालना चाहिए। इराक और अफगानिस्तान में खरबों डॉलर खर्च करने के बाद उन्होंने क्या हासिल कर लिया, यह हर कोई देख रहा है। इराक बंट गया है और अल कायदा की बड़ी कार्यशाला बन गया है। अफगानिस्तान में तालिबान सत्ता में लौटने की ताक में है। पाकिस्तान, जहां अमेरिका अरबों डॉलर भेजता है, दुनिया का सबसे घृणित देश बन गया है। गद्दाफी चला गया, लेकिन लीबिया में कोई सरकार नहीं है। सीरिया में कोशिश करने के बावजूद सत्ता परिवर्तन में अमेरिका विफल रहा। चीन पहले से ज्यादा आक्रामक हो गया है। यूरो जोन संकट से बाहर नहीं है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने थोड़ी गति पकड़ी है, लेकिन अब भी संकट से उबरा नहीं है।

मौजूदा परिदृश्य में जहां सभी विफल हो रहे हैं, भारत जैसे फलते-फूलते लोकतंत्र से बेहतर कोई दोस्त नहीं हो सकता, जहां न केवल उत्पादों के लिए भूखे मध्यवर्ग का दायरा बढ़ रहा है, बल्कि जो 70 करोड़ आकांक्षी युवाओं का भी देश है। यह समझदारी से काम लेने और व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए रिश्तों में गर्माहट लाने का समय है।
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