अमेरिका ईरान को अलग-थलग करने में लगा था कि जिस चीन को वह अपनी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है, उसने अभी तक अमेरिकी छत्रछाया में रहे सऊदी अरब और ईरान को एक मेज पर बैठाकर समझौता करा दिया। अमेरिका के लिए एक बुरी खबर यह भी है कि मास्को-तेहरान सामरिक सहयोग के बीच रूस ईरान को सुखोई युद्धक विमान देने पर सहमत हो गया है। उधर यूक्रेन में फंसे रूस को ईरान से खास तरह के ड्रोन की सप्लाई की खबरें काफी पहले से ही आ रही हैं। चीन अगर वाशिंगटन की धमकियों को दरकिनार कर रूस को हथियारों की सप्लाई शुरू कर देता है, तो यह भी अमेरिका के लिए खराब संकेत होगा। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक, सऊदी सरकार ने ईरान से सहमति हो जाने के बाद अमेरिका को सूचित किया। यह वही सऊदी अरब है, जिसने मक्का शरीफ की हिफाजत के लिए अमेरिकी सैनिक बुलाए थे।
अमेरिका के इस घटते कूटनीतिक-सामरिक प्रभाव के मुकाबले चीन के लगभग पांच दशक पुराने सपने साकार हो रहे हैं। चीन की उग्र हान राष्ट्रवादी महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर कम्युनिस्ट बिरादराने सिद्धांतों की सहर्ष बलि की भी यह अवधि साक्षी है। अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से गद्दीनशीन हुए रजा शाह पहलवी जब ईरान की प्रभावशाली कम्युनिस्ट पार्टी, तूदेह का दमन कर रहे थे, चीन इस अमेरिकी कठपुतली से प्रेम की पींगें बढ़ाने में लगा था। चीनी मीडिया शाह विरोधी आंदोलन की निंदा किया करता था। इस वजह से क्रांति के बाद शुरुआती वर्षों में अयातुल्लाओं से रिश्ते बनाने में चीन को कठिनाई जरूर हुई, लेकिन कामयाबी का सिलसिला शुरू होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। चीन की कोशिशें अब परवान चढ़ रही हैं।
उधर अमेरिका समर्थक सऊदी अरब को खुश करने में चीन इस हद तक चला गया कि कुवैत पर इराकी कब्जे के बाद अमेरिकी सैनिक हस्तक्षेप के सऊदी अनुरोध का भी अनुमोदन कर डाला, हालांकि चीन सहित पूरी दुनिया मानती थी, अमेरिका पश्चिम एशिया के तेल स्रोतों पर एकाधिकार कायम करना चाहता है। चीन की चिंता थी कि फारस की खाड़ी से लेकर कैस्पियन सागर के तटवर्ती देशों तक समुद्री मार्ग को नियंत्रित कर अमेरिका तेल की आपूर्ति को संचालित करना चाहता है। चीन 1990 के बाद पेट्रोलियम पदार्थों की बेतहाशा बढ़ती घरेलू मांग के मद्देनजर अमेरिका को इस खेल में शिकस्त देना चाहता था। अमेरिकी उद्योग-व्यापार का एक असरदार वर्ग अधिकाधिक लाभ कमाने के लालच में चीन का रास्ता आसान करता रहा।
अब जबकि सऊदी अरब और ईरान चीन के दो बड़े तेल निर्यातक होने के साथ ही बीजिंग के प्रयासों से नजदीक आ रहे हैं, समुद्री तेल मार्गों को अवरुद्ध करने के अमेरिकी विकल्प का सीमित होना स्वाभाविक है। ईरान की अनदेखी करना आसान था, सऊदी अरब की नहीं, क्योंकि अमेरिका वहां बहुत गहराई तक घुसा हुआ है। सऊदी अरब की हुकूमत में निर्णायक भूमिका में आ चुके शाहजादा मोहम्मद बिन सलमान की अपनी राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं हैं। वह पूर्ववर्ती सऊदी शासकों से बुनियादी तौर पर इस मायने में भिन्न हैं कि अमेरिकी प्रभाव से धीरे-धीरे बाहर निकल रहे हैं। इसकी बड़ी मिसाल यह है कि अब अमेरिका सऊदी अरब का एकमात्र हथियार सप्लायर नहीं है। वह चीन से लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें और अन्य हथियार खरीद रहा है।
अगर ईरान यमन के शिया हूती विद्रोहियों को शांतिपूर्ण समझौते के लिए अंतिम रूप से राजी करने में सफल हो जाता है, तो उससे सबसे ज्यादा फायदा सऊदी अरब का होगा। उसी तरह शिया बहुल बहरीन से हटकर सऊदी अरब अयातुल्लाओं की इच्छा पूरी कर सकता है। सीरिया में रूस की सहायता से असद सरकार का पलड़ा भारी है। ईरान भी उसकी मदद कर रहा है। निरंतर अमेरिकी दबाव में चल रहा ईरान लेबनान में शिया हिजबुल्ला से हाथ खींच कर इस्राइल को संकेत दे सकता है। सऊदी अरब और इस्राइल में मैत्रीपूर्ण संबंध हैं ही। बहुत सारी संभावनाएं भविष्य के गर्भ में हैं। लेकिन चीन और रूस की अघोषित कूटनीतिक-सैनिक रणनीति का चरम यही हो सकता है।
चीन और रूस की हर सफलता अमेरिकी प्रभाव क्षेत्र को कम करेगी और उसके प्रतिकूल परिणाम से भारत अछूता नहीं रह सकता। बीजिंग घोषणा से पहले की कुछ घटनाएं गौरतलब हैं। चीन के विदेश मंत्री किन गांग दिल्ली में बोल गए, 'भारत और चीन सीमा विवाद को समुचित स्थान पर रखते हुए, शताब्दी में एक बार हो रहे वैश्विक परिवर्तन के संदर्भ में आपसी रिश्तों को देखें और सीमा पर स्थिति को जल्द से जल्द सामान्यीकृत प्रबंधन के तहत लाएं।’ इसका सीधा भाष्य यह हुआ : चीन सीमा विवाद पर यथास्थिति बनाए रखना चाहता है, अप्रैल, 2020 में लद्दाख में जिन इलाकों पर कब्जा किया था, वहां से नहीं हटेगा और भारत इसे भूलकर चाहे तो अन्य विषयों पर बात कर सकता है। इस तरह भारत का रास्ता बंद और सीमा पर तैनात पचास हजार से अधिक सैनिकों को हटाने की जिम्मेदारी भी भारत की ही।
मास्को से भारत और चीन में मध्यस्थता के संकेतों का भी कोई मतलब नहीं है, क्योंकि रूस चीन की तुलना में कमजोर हो चुका है और सार्थक मध्यस्थता ताकतवर किया करते हैं। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के संगठन 'क्वाड' को चीन अपनी घेरेबंदी के तौर पर देखता है; भारत के लिए यह चीन की दादागीरी से निपटने का एक कूटनीतिक-सामरिक प्रयास है। रूस भी 'क्वाड' का विरोध कर चुका है। भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव दरअसल अमेरिका से विमुख करने की साजिश है। चीन-रूस संयुक्त ताकत का मुकाबला सिर्फ अमेरिका कर सकता है। अमेरिका से भयमुक्त चीन बेलगाम साम्राज्यवादी शक्ति होगा। अंतरराष्ट्रीय हालात ने भारत को एक खतरनाक दोराहे पर पहुंचा दिया है।