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चला व्यंग्यकार मंत्री बनने

Mon, 31 Mar 2014 07:01 PM IST
अशोक गौतम
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और, कैसे हैं आप? आवाज में मिठास से अधिक हमदर्दी। लगा, घर के दिलों से सब कुछ मर गया हो, पर किसी न किसी दिल में प्यार अब भी शेष है।
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ठीक वैसा ही हूं, जैसे इस देश के नब्बे प्रतिशत मर्द विवाह करने के बाद होते हैं,  मैंने मन की व्यथा-कथा कही, तो दूसरी ओर से आवाज में वह मिसरी घुली कि वह मिसरी घुली... तो मतलब आप देश के नब्बे प्रतिशत मर्दों के प्रतिनिधि हो?

अरे मैं तो इस दौर से गुजर रहा हूं कि अब तो अपना प्रतिनिधित्व करने के लायक भी नहीं और आप कहती हो कि...

बड़े लोग ऐसा ही कहते हैं सर! हमारे हाई कमान से बात करें... कहकर उसने आवाज दूसरे के हवाले की, तो मन को बड़ा धक्का-सा लगा, कि तभी दूसरी ओर से आवाज आई, कौन? बकबड़, आई मीन व्यंग्यकार जी महाराज बोल रहे हैं? हम आपको आपके शहर से अकबर की जगह लड़वाना चाहते हैं!
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माफ कीजिएगा सर, मैं पत्नी से लड़ते-लड़ते टूट चुका हूं। संपादकों से लड़ते-लड़ते टूट चुका हूं। हर साल मकान मालिक द्वारा किराया बढ़ाए जाने के चलते पिछले दस वर्षों से उससे लड़ते-लड़ते टूट चुका हूं। ब्रीफ में, मैं अपने आप से लड़ते-लड़ते टूट चुका हूं... मैंने मोबाइल को गर्दन से कान के पास रख दोनों हाथ जोड़े, तो वह वहीं से मोबाइल पर मेरी पीठ थपथपाते बोले, लड़ना ही जिंदगी है बकबड़! बिना लड़े जिए, तो क्या जिए?
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कहां आपके अकबर साहब, और कहां मैं व्यंग्य का मारा बकबड़!

हमें बकबड़ की तलाश थी, जो मिल गया!

तो मतलब आप जनपथ से बोल रहे हैं?

हां! पर पथ तो पथ है। सब पथ कुर्सी के चरणों से शुरू होते हैं और कुर्सी की बैठक पर जाकर बंद हो जाते हैं। सरकार बनते ही तुम सीधे फुल फ्लेज्ड केंद्रीय व्यंग्यमंत्री! और तुम्हारे मंत्रालय का नाम होगा मिनिस्टरी ऑफ सटायर!  फिर हर साहित्य अकादेमी तुम्हारे अंडर! टिकट स्कैन कर एसएमएस कर दें क्या?

मेरी मौन को उन्होंने स्वीकृति समझ ली।
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