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इस सभ्य खेल को असभ्य बनाने वाले

Mon, 31 Mar 2014 06:52 PM IST
आदित्य वर्मा
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सही बताऊं, तो आठ साल पहले जब मैंने पटना अदालत का रुख किया था, तो मन में सिर्फ बिहार के क्रिकेट का गौरव दोबारा वापस दिलाने की जीजिविषा दौड़ रही थी। यही धुन थी कि किसी तरह बिहार की टीम की रणजी ट्रॉफी में वापसी हो जाए। मन में यह ख्याल कभी नहीं आया था कि इस लड़ाई के दौरान एन श्रीनिवासन जैसे दिग्गज से भी लोहा ले लूंगा।
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सच्चाई यही है कि बीसीसीआई का मूल संघ होने के बावजूद बिहार को घरेलू क्रिकेट से बाहर रखा गया है, और यह सिर्फ किसी और की बदौलत नहीं, बल्कि एन श्रीनिवासन के चलते हुआ। इस अदालती लड़ाई के दौरान श्रीनिवासन को यह ख्याल कभी नहीं आया बिहार को उसकी मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। 2006-07 में श्रीनिवासन बोर्ड के कोषाध्यक्ष थे। उस दौरान बोर्ड ने एक तीन सदस्यीय समिति गठित की। उसे यह फैसला लेना था कि बिहार से अलग होकर नए बने राज्य झारखंड को रणजी ट्रॉफी में मान्यता देनी है या फिर बिहार को। इस समिति में उनके अलावा अरुण जेटली और चिरायु अमीन थे। लेकिन समिति ने झारखंड के एक प्रभावशाली व्यक्ति के चलते बिहार की कीमत पर नए बने राज्य को मान्यता प्रदान कर दी। यहीं से बिहार में क्रिकेट को धक्का लगा। इसके बाद यहां के क्रिकेट को जिंदा करने के लिए क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार का गठन किया गया। इसे आज तक बोर्ड ने मान्यता नहीं दी है।

मैंने जब अदालती लड़ाई शुरू की, तब पास में पैसे ज्यादा नहीं थे। लोगों से चंदा लिया, अपने घर से भी लगाया। जब अदालती लड़ाई आगे बढ़ी, तो कुछ लोगों को लगा कि मेरा साथ दिया जाना चाहिए। कुछ नौकरशाह भी आगे आए। श्रीनिवासन किस तरह के व्यक्ति हैं, इस अदालती लड़ाई के दौरान मैं समझ चुका था। यही कारण था कि जब आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आया और श्रीनिवासन की ओर से सेवानिवृत जजों की दो सदस्यीय जांच कमेटी गठित की गई, तब मुझे लगा कि मामले पर लीपापोती की कोशिश की जा रही है। इसके बाद ही बॉम्बे हाई कोर्ट में इस समिति के खिलाफ पीआईएल दाखिल की गई। यह पीआईएल ही श्रीनिवासन के खिलाफ मेरी मुख्य लड़ाई की राह बनी। अदालत की ओर से इस समिति को अयोग्य ठहरा दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए जस्टिस मुकुल मुदगल की अगुवाई में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया। जस्टिस मुदगल की रिपोर्ट ने ही दूध का दूध और पानी का पानी किया। गुरुनाथ मयप्पन चेन्नई सुपरकिंग्स के हर मैच में डग आउट (सीमा रेखा पर खिलाड़ियों के बैठने के लिए बनाई गई जगह) में शामिल होने के साथ टीम मैनेजमेंट का हिस्सा रहे। यही मयप्पन श्रीनिवासन के दामाद हैं। जब पुलिस-जांच में मयप्पन पर उंगली उठी, तो श्रीनिवासन ने उनसे पल्ला झाड़ लिया। वह यह कहकर बोर्ड से नहीं हट रहे थे कि उनका दामन दागदार नहीं है। यह हितों का टकराव नहीं, तो और क्या है!
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यह स्पष्ट कर दूं कि इस लड़ाई में काफी दूर तक पहुंच जाने के बाद मैं खुद को कोई तीस मार खां नहीं समझ रहा। मैं तो सिर्फ अदालती लड़ाई लड़ रहा हूं। क्रिकेट का भला चाहता हूं। क्रिकेट में व्याप्त गंदगी को समाप्त करना चाहता हूं। अपने बिहार की क्रिकेट को वापस लौटाना चाहता हूं। अब सुनील गावस्कर और शिवलाल यादव को कमान दी गई है। दोनों बड़े क्रिकेटर रहे हैं। मैं सिर्फ यही कहूंगा मेरे बिहार की क्रिकेट को वापस लौटा दो। इस अदालती लड़ाई में मेरा यही प्रयास है। हालांकि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित पड़ा है, लेकिन विश्वास है कि यह संघर्ष रंग लाएगा।
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लेखक क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार के सचिव और बीसीसीआई के खिलाफ कोर्ट में चल रही लड़ाई के याचिकाकर्ता हैं।
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