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डिजिटल युग में निजता का अधिकार

Wed, 02 Aug 2017 03:20 PM IST
राजीव चंद्रशेखर
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राजीव चंद्रशेखर
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उपभोक्ताओं और नागरिकों के अधिकारों के वैधानिक ढांचे के लिए मैंने काफी कानूनी लड़ाइयां लड़ी है, क्योंकि प्रौद्योगिकी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जो न केवल नागरिकों और सरकार के संबंधों को बदल देती है, बल्कि हमारे जीवन और व्यवसाय को भी बाधित करती है। डिजिटल उपभोक्ताओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए मैं लंबे समय से पैरवी करता रहा हूं और संसद में और संसद से बाहर भी इन अधिकारों को हकीकत में बदलने के लिए विभिन्न हस्तक्षेपों के जरिये बार-बार प्रयास किए हैं। 
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जब भी अनुत्तरदायी सरकार का सामना करना पड़ा (जैसा की यूपीए के शासन में हुआ), मैंने जनहित याचिका के साथ अदालत का दरवाजा खटखटाया और डिजिटल स्वतंत्रता के सुनिश्चित करवाने के लिए आईटी ऐक्ट की कठोर धारा 66 ए को निरस्त करवाने में सफल हुआ। 

डिजिटल भारतीयों के उपभोक्ता अधिकारों में गोपनीयता एक महत्वपूर्ण तत्व है। आईटी ऐक्ट की धारा 66 ए के मामले की तरह मैंने आधार पर संसद में बार-बार हस्तक्षेप किया और मैं 2010 से इसकी कमजोर संरचना और निजता के अधिकार का मुद्दा उठाता रहा हूं।और जब यूपीए सरकार ने मेरी बात पर ध्यान नहीं दिया, तो वर्ष 2014 में मैंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अदालत को बताया कि आधार का क्रियान्वयन नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। संसद और अदालत में साढ़े तीन वर्षों तक बहस होने के बाद अंततः यह मामला सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय सांविधानिक पीठ के पास पहुंच गया है। 
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मैंने 2010 से आधार के बहुत ही खराब डिजाइन और कमजोर सत्यापन प्रक्रिया का मुद्दा उठाना शुरू किया था। यूपीए के कार्यकाल में हजारों करोड़ रुपये एक ऐसी परियोजना पर खर्च किए गए, जिस पर न तो कोई बहस हुई थी और न ही उसे वैधानिक मंजूरी मिली थी। जान-बूझकर बहस और जांच नहीं कराए जाने के कारण हम एक ऐसी स्थिति में पहुंचे हैं, जहां एक विशाल डाटाबेस तैयार किया गया, लेकिन आधार के डाटाबेस में अपनी जानकारियां देकर आधार बनवाने वाले लोगों को कोई कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं की गई। 

पिछले कुछ वर्षों से आधार और इसे डिजाइन करने वालों ने धाराप्रवाह यह कहकर तथ्यों को छिपाया कि आधार को गोपनीयता के लिए बनाया गया है, जिस पर दुर्भाग्य से मीडिया और सरकार के कई लोगों ने आंख मूंदकर विश्वास कर लिया। हालांकि गोपनीयता एक ऐसा मुद्दा है, जो हमसे ज्यादा प्रत्येक डिजिटल भारतीयों को प्रभावित करता है, क्योंकि नवाचार और प्रौद्योगिकी की ताकत से हमारा जीवन, हमारा व्यवसाय बदल जाता है। उपभोक्ताओं, मीडिया और सिविल सोसाइटी में इस तरह की भावना तेजी से बढ़ रही है कि आधार और अन्य पहलुओं ने लोगों को बहुत कम या कोई सुरक्षा नहीं दी है। 

बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय सांविधानिक पीठ अब देर से ही सही, मगर एक जरूरी मुद्दे पर विचार कर रही है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं। यह सब कुछ ज्यादातर भारतीयों को भ्रमित कर सकता है। गोपनीयता या निजता की व्याख्याएं भी अलग-अलग हैं। इसका नागरिकों के लिए क्या मतलब है? निजता को लेकर कई तरह के विचार हैं, जिनमें एक तरफ जहां कुछ लोगों का मानना है कि राज्य को किसी भी व्यक्ति से कोई भी जानकारी मांगने का कोई अधिकार नहीं है, वहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि राज्य को अलग-अलग आंकड़ों और सूचनाओं की मांग और उपयोग करने पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।

लेकिन इन दोनों नजरियों से अलग मेरा मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है, जो उचित प्रतिबंधों के अधीन है और इसलिए यह पूर्ण अधिकार नहीं है। इसलिए राज्य द्वारा प्राधिकृत संस्थाओं को निर्दिष्ट कारणों से लोगों से आंकड़े एवं जानकारियां मांगने का हक है। इसी तरह ऐसी सूचनाएं उपलब्ध कराना नागरिकों का कर्तव्य है। 

उपरोक्त सूचनाओं को एकत्रित, संग्रहित एवं प्रबंधित करने वाली उन संस्थाओं का यह कानूनी एवं सांविधानिक दायित्व होना चाहिए कि वे निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए ही उन आंकड़ों एवं सूचनाओं का उपयोग करें। पारस्परिक रूप से इसका अर्थ यह है कि सूचना एवं आंकड़ा दाताओं को किसी भी उद्देश्य के लिए डाटा के उपयोग पर सहमति का हक है, सिर्फ उन उद्देश्यों को छोड़कर जिसके लिए मूल रूप से डेटा प्रदान किया गया था।

उदाहरण के लिए अगर भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने आधार नामांकन के लिए आपका बायोमीट्रिक लिया है और उसे अन्य उद्देश्यों के लिए उपयोग करना चाहता है, तो उसे उस प्रयोजन के लिए आपकी स्पष्ट सहमति लेनी चाहिए। गोपनीयता के मौलिक अधिकार का अर्थ यह भी है कि उपभोक्ताओं को आंकड़े (निजी/राज्य) का संरक्षक अगर डाटा की सुरक्षा में विफल रहता है या उसका दुरुपयोग या लीक करता है, तो ऐसी संस्थाएं कानूनी रूप से उत्तरदायी होंगी और इसे गोपनीयता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा। मेरे वकील ने सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय सांविधानिक पीठ के सामने ये तमाम तर्क दिए हैं। 

संविधान पीठ के फैसले का नागरिकों के अधिकारों संरक्षण और डिजिटल इंडिया के संतुलित विकास पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा, जहां उपभोक्ता, कॉरपोरेट और सरकार के पास विशाल और तेजी से बढ़ते डिजिटल परिदृश्य में अधिकार एवं कर्तव्य होंगे। गोपनीयता सबके जीवन और भविष्य को प्रभावित करेगी, क्योंकि हमारे डिजिटल पदचिह्न बड़े और विस्तृत हो रहे हैं। उम्मीद है कि सर्वोच्च न्यायालय गोपनीयता को भी नागरिकों का मौलिक अधिकार मानेगा। प्रौद्योगिकी के इस युग में सांविधानिक अधिकारों का संरक्षण और विस्तार ऐसे राष्ट्र में वास्तव में उपयुक्त होगा, जो न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, बल्कि जो जल्द ही दुनिया का सबसे बड़ा डिजिटल लोकतंत्र बन जाएगा। 
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