खुशवंत सिंह एक मिथक थे। उनकी तरह उनकी लेखनी को परिभाषित करना टेढ़ी खीर ही है। उनके ही कहे हुए शब्दों को एक जिल्द में बांधने का काम एक स्थापित लेखिका ऊषा महाजन ने किया। उनका खुशवंत सिंह से एक लंबा रिश्ता था। किसी एक अन्य लेखक के तमाम सृजन पर तपस्या की भांति काम करना, एक जोखिम भरा काम है। इसमें अपनी पहचान के लुप्त होने का जोखिम रहता है, पर ऊषा जी ने इस संकल्प को बखूबी निभाया है।
'रिपार्ती' नामक यह खूबसूरत किताब खुशवंत सिंह से अलग-अलग लेखकों, पत्रकारों, प्राध्यापकों और चिंतकों की उनसे बातचीत का संकलन है। ग्लोबल विजन प्रेस द्वारा यह पुस्तक छापी गई है। इस पुस्तक को 17 फरवरी को दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में पाठकों को समर्पित किया जाएगा।
खुशवंत का ऊषा के बारे में कहना है कि 'उन्होंने एक पुल का काम करते हुए लेखक और पाठकों के बीच एक संवाद स्थापित किया।' उसी लहजे में ऊषा का बयान है कि 'उन्होंने खुशवंत का परिचय हिंदी पाठकों से कराया।' मानो ऋण चुकता करते हुए खुशवंत ने अपने संपादन काल में ऊषा की दो कहानियों का खुद अंग्रेजी में अनुवाद करके छापा।
खुशवंत को मूलतः पत्रकार माना जाता है, लेकिन यह पूर्ण पहचान नहीं थी। उन्होंने भारत के बंटवारे की त्रासदी पर 'ट्रेन टू पाकिस्तान' जैसी सशक्त रचना रचकर अपने को एक सशक्त लेखक के रूप में स्थापित कर लिया और अपनी लेखनी से एक अमिट छाप छोड़ी। वह दिल्ली के एक धनाढ्य परिवार में पैदा हुए। उनके पिता सर सोभा सिंह को नई दिल्ली के अनेक भवनों के निर्माण कराने का श्रेय दिया जाता है। इसमें कनाॅट प्लेस भी शामिल है।
उनके जीवन में एक अभूतपूर्व अवसर तब आया, जब उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया की साप्ताहिक अंग्रेजी पत्रिका इलस्ट्रेटिड वीकली का संपादक बनाया गया। तब उसकी संख्या हजारों में थी। उन्होंने उसे आनन-फानन में लाखों तक पहुंचा दिया। उनके आलोचक कहते हैं कि 'उन्होंने यह उपलब्धि धर्म, सेक्स और राजनीति की कॉकटेल पिलाकर की।' खुशवंत काे विवादों को दावत पर बुलाने का शौक था। उनके बहुचर्चित साप्ताहिक कॉलम 'विद मोलिस टुवार्ड्स वन एंड ऑल' ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया। इसे भारत की अनेक भाषाओं के अखबारों ने अनुवाद करके छापा। इसे हिंदी में नाम दिया गया-'न काहू से दोस्ती न काहू से बैर'। इस स्तंभ में वह हर हफ्ते जाने-माने लोगों पर चुटकियों से प्रहार करते थे। एक बार उन्होंने एक बड़े आदमी को उनके जीवनकाल में श्रद्धाजंलि दे दी। अगले हफ्ते कांग्रेसी नेता रजनी पटेल ने उनको उन पर लिखी श्रद्धाजंलि भेज दी। खुशवंत ने उसे भी सुर्खियों में छाप दिया। अब कुछ नमूने खुशवंत की सोच और शैली के-
प्रश्न- कुछ दिनों के लिए आपको पुलिस की सुरक्षा दी गई थी। आपने उसे हटवा क्यों दिया?
उत्तर- मुझे और उन्हें दोनों को लगा कि कोई उन्हें मारना नहीं चाहता। तब बेकार यह तामझाम क्यों लगाया जाए।
प्रश्न- जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों पर हमले हुए, तब सरकार और प्रशासन ने आपको बचाने के लिए कुछ किया था?
उत्तर- मेरे लिए क्या किसी के लिए कुछ नहीं किया। पहले बोले कर्फ्यू लगाएंगे। वो भी नहीं लगाया। मैंने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को फोन किया। कोई जवाब नहीं मिला। तब सलमान हैदर इंतजाम देख रहे थे। वह बोले 'घर से बाहर मत निकलना। भीड़ बढ़ रही है। 'तभी स्वीडन दूतावास की गाड़ी आई और हमें ले गई।
प्रश्न- अगर आपको बताया जाए कि आपका अंतिम समय आ गया है, तो आप क्या करेंगे?
उत्तर- पता नहीं। कभी-कभी लगता है कि अगला साल मेरा आखिरी साल होगा। बार-बार यही ख्याल आता है। शायद न भी हो। पर रह-रहकर यही बात मन में आती है। इसलिए अपना काम पूरा करना चाहता हूं। मैं कुछ कर जाऊंगा। उसी में खुशी मिलेगी। हो सकता है कल लगे कि यह सब बेमानी था, जागता हूं तो यही अहसास होता है।
रिपार्ती-खुशवंत सिंह, ऊषा महाजन,
ग्लोबल विजन बुक
नई दिल्ली