ग्लोबल पीस इंडेक्स की वर्ष 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में 56 युद्ध और गृहयुद्ध चल रहे हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस समय युद्ध व गृहयुद्ध की संख्या सबसे अधिक है। इस रिपोर्ट ने यह भी बताया है कि अब युद्ध अधिक लंबे खिंच रहे हैं। 1970 के दशक में 23 प्रतिशत युद्धों का अंत शांति समझौतों से हुआ, जबकि 2010 के दशक को देखें, तो इसमें केवल चार प्रतिशत युद्धों का अंत शांति समझौतों के जरिये हुआ। इतना ही नहीं, इस रिपोर्ट ने बताया है कि किसी बड़े युद्ध की संभावना अब पहले की अपेक्षा ज्यादा बढ़ गई है।
यह स्थिति बहुत चिंताजनक है, क्योंकि हाल के समय में हथियार निरंतर अधिक विध्वंसक होते गए हैं। अनेक तरह के महाविनाशक हथियार मौजूद हैं, जिनमें परमाणु बमों का खतरा सबसे अधिक है। इस समय विश्व में लगभग 13,000 परमाणु हथियार हैं, जिनमें से लगभग 85 प्रतिशत अमेरिका और रूस के पास हैं। कुल नौ देशों के पास परमाणु हथियार हैं और लगभग पांच अन्य देशों में महाशक्तियों ने अपने परमाणु हथियार तैनात किए हुए हैं। यदि कभी कुल उपलब्ध परमाणु हथियारों में से लगभग 5 से 10 प्रतिशत हथियारों (यानी 650 से 1300 हथियारों) का उपयोग हो गया, तो विश्व में मानव जीवन व अधिकांश अन्य तरह का जीवन लगभग समाप्त ही हो जाएगा। इन हथियारों के भयानक विस्फोट, आग व इनकी रेडियोधर्मिता से अधिकांश लोग मारे जाएंगे। फिर इससे इतना धूल-गुबार उठेगा कि धरती पर सूर्य की किरणों का प्रकाश नहीं पहुंच पाएगा, पौधे नहीं उग पाएंगे व जो लोग बचेंगे वे भूख से मर जाएंगे। इसे ‘न्यूक्लियर विंटर’ की स्थिति कहा जाता है।
विश्व के ज्यादातर लोग इन बड़े खतरों से बेखबर होकर अपने जीवन की व्यस्तताओं में लगे हैं, लेकिन यह संकट निरंतर बना हुआ है। अब हथियारों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का अधिक उपयोग होने लगा है, रोबोट या रोबोटिक्स के हथियार बन रहे हैं, जो और खतरनाक हैं। इनमें सबसे खतरनाक वे हथियार हैं, जो एक सीमा के बाद मनुष्य के नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं। अंतरिक्ष के सैन्यीकरण की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी है। इन प्रक्रियाओं के विरुद्ध विश्व के अनेक जाने-माने विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ऐसे हथियारों को मत लाओ, यह असहनीय तबाही करेंगे। पर बड़ी शक्तियां हथियारों की ऐसी दौड़ या होड़ में लगी हैं कि इन महत्वपूर्ण चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। एक महाशक्ति महाविनाशक हथियारों की दौड़ में एक कदम आगे बढ़ती है, तो दूसरी महाशक्ति दो कदम आगे बढ़ती है। महाशक्तियों में यह प्रवृत्ति भी बढ़ रही है कि अपने से छोटे देशों को एक-दूसरे के विरुद्ध लड़ाकर अपने प्रतिद्वंद्वी को कमजोर किया जाए। इसे परोक्ष युद्ध (प्रॉक्सी वार) कहा जाता है। यह परोक्ष युद्ध भी बहुत तबाही कर रहे हैं। उधर, अनेक अन्य देशों में गृहयुद्ध ने भी बहुत तबाही मचाई है, जैसा कि सूडान, यमन, म्यांमार आदि कई देशों में देखा जा सकता है।
युद्ध की संभावना को न्यूनतम करने के लिए विश्व नेतृत्व और संयुक्त राष्ट्र संघ को अधिक सक्रियता व प्रतिबद्धता दिखानी होगी। केवल विश्व शांति के नाम पर हो रही बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। कितनी बड़ी विडंबना है कि विश्व का एक वर्ष का सैन्य खर्च 2,500 अरब डॉलर के आसपास है (हालांकि कुछ अनुमानों के अनुसार, यह इससे भी कहीं अधिक है) पर विश्व शांति प्रक्रियाओं व प्रयासों के लिए इसकी तुलना में एक प्रतिशत का भी बजट उपलब्ध नहीं है।
विश्व में शांति आंदोलन बहुत कमजोर है, जबकि इस समय इसका सशक्तीकरण अत्यावश्यक है। यदि विश्व के सभी अथवा अधिकांश देशों में, विशेषकर अधिक शक्तिशाली देशों में, यदि लाखों लोग अमन-शांति व निशस्त्रीकरण के लिए प्रतिबद्ध हो जाएं, तो विश्व शांति की मांग को आगे बढ़ाने वाला एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता है, जो निरंतरता से युद्ध के संकट को कम करने व महाविनाशक हथियारों के संकट को कम करने के लिए प्रयास करेगा। प्रायः यह कहा जाता है कि इतनी बड़ी समस्याओं के समाधान में जनसाधारण की कोई भूमिका नहीं है। इस सोच के कारण ही विश्व शांति व निशस्त्रीकरण के लिए कोई बड़ा आंदोलन तैयार नहीं हो सका है। वास्तव में शांति आंदोलन से अधिक संख्या में लोग जुड़ेंगे, तो आसपास के जीवन में अमन-शांति व अहिंसा का प्रवेश होने से दैनिक जीवन में भी बहुत सुधार आएगा। इस तरह शांति आंदोलन को सशक्त करना, तो हर स्तर पर ही जरूरी है।