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सियासत: पांडियन का पराभव, जिसमें दृष्टिगत हैं परोक्ष वापसी की पूरी संभावनाएं

संदीप साहू Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Thu, 13 Jun 2024 07:10 AM IST

सार

चुनाव खत्म होने तक हर जगह दिखाई देने वाले पांडियन ने परिणाम आने के बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी है। हालांकि पार्टी में उनके खिलाफ फैले आक्रोश के मद्देनजर यह 'टैक्टिकल रिट्रीट' ज्यादा लगती है। और मामला शांत होने पर परोक्ष रूप से ही सही, लेकिन उनकी वापसी की पूरी संभावना है।  
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वीके पांडियन - फोटो : पीटीआई


सन 2000 में आईएएस बनने के बाद वह सफलता की सीढि़यां चढ़ते गए। अपनी मेहनत और लीक से हटकर काम करने की असाधारण क्षमता के कारण उन्होंने खूब प्रशंसा बटोरी। पहले मयूरभंज, फिर गंजाम जिले के कलेक्टर के रूप में उनके द्वारा किए गए अच्छे कामों को लोग आज भी याद करते हैं। दोनों ही जिलों में कामों के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत भी किया गया । ये सब थीं एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में पांडियन की उपलब्धियां। लेकिन सत्ता की राजनीति में उनका प्रवेश तब हुआ, जब गंजाम के जिलाधीश के रूप में उनके काम से प्रभावित होकर मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने उन्हें सन 2011 में अपना निजी सचिव बनाया। अपनी काबिलियत के जरिये पांडियन ने नवीन का विश्वास जीता और धीरे-धीरे अपनी काया विस्तार करने लगे ।


2019 में लगातार पांचवीं बार चुनाव जीतने के बाद नवीन पटनायक ने सरकार को अधिक लोकाभिमुखी करने के लिए  5टी (टीमवर्क, टेक्नोलॉजी, ट्रांसपेरेंसी, ट्रांसफॉर्मेशन और टाइमलाइन) नामक एक नया विभाग खोला और पांडियन को इसका सचिव बना दिया। सरकार के सभी विभागों को इस नए विभाग के अंदर लाया गया। इसके बाद सरकार में पांडियन का दबदबा और भी बढ़ गया। पांडियन के नौकरी से इस्तीफा देने के बाद उन्हें इस विभाग का अध्यक्ष बना दिया गया, ताकि सरकार में उनकी पकड़ बनी रहे। और 2019 के चुनाव के बाद नवीन ने अपने निवास से बाहर निकलना लगभग बंद कर दिया और दल व सरकार दोनों का पूरा जिम्मा पांडियन को सौंप दिया। कोविड के बाद मुख्यमंत्री न सचिवालय गए, न विधानसभा। कैबिनेट की बैठक में भी वे वीडियो लिंक के जरिये अध्यक्षता करने लगे। अपने दल के नेता, मंत्री, विधायकों से मिलना उन्होंने लगभग बंद कर दिया। यहां तक कि राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक के लिए भी सलाह-मशवरे के लिए मुख्यमंत्री से मिलना दूभर हो गया और वे पांडियन के आदेश पर काम करने लगे।


अब पांडियन की महत्वाकांक्षा बढ़ने लगी और वह राज्य सरकार के चॉपर का इस्तेमाल कर पूरे राज्य का दौरा करने लगे। बहाना था कि लोगों से उनकी शिकायतें लेकर तत्काल कार्रवाई करना। बाद में पता चला कि पांडियन राजनीति में प्रवेश करने के लिए अपनी जमीन तैयार कर रहे थे। वह जहां भी गए पूरा स्थानीय प्रशासन, स्थानीय नेता, विधायक और मंत्री उनकी सेवा करते हुए नजर आए। मंच पर पांडियन के अलावा कोई भी देखने को नहीं मिला। साफ था कि उनकी ताजपोशी की तैयारी चल रही थी। इस बात की जमकर चर्चा हुई कि वह नवीन के उत्तराधिकारी हैं। नवीन ने ऐसी चर्चाओं का खंडन करने की कोशिश भी नहीं की, जिससे ओडिशा के लोगों में यह धारणा और भी पुख्ता होती गई कि नवीन ने पांडियन को अपना उत्तराधिकारी बनाने का मन बना लिया है। इस धारणा को तब और बल मिला, जब पांडियन ने औपचारिक रूप से बीजद में योगदान किया।  इस वर्ष मार्च में जब बीजद और भाजपा के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत चल रही थी, तब बीजद की ओर से पांडियन ही इसके सूत्रधर थे।


प्रेक्षकों का मानना था कि भाजपा से गठबंधन कर वह अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित करना चाहते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि नवीन के डर से पार्टी के जो नेता चुप बैठे हैं, वे नवीन के बाद उनके खिलाफ बगावत पर उतर आएंगे, तब उन्हें भाजपा के समर्थन की जरूरत होगी। हालांकि बात बनी नहीं और भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। इस बार चुनाव का पूरा मोर्चा पांडियन ने संभाला। उम्मीदवारों के चयन से लेकर रणनीति तैयार करने और आर्थिक संसाधन के उपयोग से लेकर मीडिया कैंपेन तक लगभग सब कुछ उन्हीं की देखरेख में हुआ। करीब डेढ़ महीने के चुनाव प्रचार के दौरान मंच पर अकेले पांडियन ही प्रचार करते नजर आए। मुख्यमंत्री और बीजद अध्यक्ष नवीन पटनायक बीच-बीच में उनके साथ प्रचार के लिए जाते रहे, लेकिन पार्टी के 40 ‘स्टार प्रचारकों’ में से 38 पूरे चुनाव के दौरान नदारद रहे। और पार्टी को इसी बात का खामियाजा भुगतना पड़ा। भाजपा ने भी एक सोची-समझी रणनीति के तहत ‘ओड़िया अस्मिता’ को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी भाजपा नेता हर आमसभा में इसी बात को दोहराते रहे कि नवीन साढ़े चार करोड़ ओड़िया लोगों की अस्मिता को पैरों तले रौंदते हुए तमिलनाडु में जन्मे एक आदमी को ओडिशा के लोगों पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं। और भाजपा की यह रणनीति काम कर गई।


राज्य में चौथे और अंतिम चरण के मतदान से ठीक पहले नवीन ने एक साक्षात्कार में स्पष्ट किया कि पांडियन उनके उत्तराधिकारी नहीं हैं, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। चुनाव में हार के बाद अब तक सहमे हुए पार्टी के नेता और कार्यकर्ता अब पांडियन को हार का जिम्मेदार ठहराते हुए उनके खिलाफ खुलकर नारेबाजी करने लगे हैं। चुनाव खत्म होने तक हर जगह दिखाई देने वाले पांडियन परिणाम आने के बाद से कहीं नजर नहीं आ रहे। इसके बावजूद नवीन ने पांडियन को चुनाव में हार के लिए जिम्मेदार ठहराने या उनकी निंदा करने से साफ इन्कार कर दिया है। इसके उलट उन्होंने पांडियन की जमकर प्रशंसा की है और उनके खिलाफ हो रही बयानबाजी को अनुचित बताया है। नवीन के इसी आचरण और उच्चारण के कारण राजनीति से संन्यास लेने की पांडियन की घोषणा के बाद भी बहुत कम लोग यह मानने के लिए तैयार हैं कि अब राजनीति में कभी उनकी वापसी नहीं होगी। ज्यादातर प्रेक्षक मानते हैं कि पार्टी में उनके खिलाफ फैले आक्रोश के मद्देनजर यह एक ‘टैक्टिकल रिट्रीट’ भर है और मामला ठंडा होने पर प्रत्यक्ष नहीं, तो परोक्ष रूप से उनकी वापसी की पूरी संभावना है।

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