यह वक्त का खेल है। जिस अमित शाह को कांग्रेस ने गुजरात से बाहर करवाया। उस अमित शाह ने कांग्रेस को दिल्ली सल्तनत से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अमित शाह के भाजपा का अध्यक्ष बनने से कांग्रेस और उसके सिपहसालार अहमद पटेल को अपनी ऐतिहासिक गलती का अहसास हो रहा होगा। पटेल भले अमित को अपना दोस्त न मानें, लेकिन ये राजनीतिक दुश्मनी कांग्रेस को बहुत भारी पड़ गई। अब सिर्फ कांग्रेस ही नहीं भाजपा के कई नेता भी मानते हैं कि गुजरात से ‘निकाला’ अमित शाह के लिए वरदान साबित हुआ।
मोदी का अमित शाह को संगठन की कमान देने का फैसला यूं ही नहीं है। भाजपा के अध्यक्ष बनने की हर कसौटी पर अमित शाह खरे उतरते हैं, क्योंकि उनकी बदौलत उत्तर प्रदेश में पार्टी की रिकार्ड तोड़ जीत हुई है। जिसकी किसी को न कल्पना थी न अनुमान। यही वजह है कि अमित शाह की अध्यक्षी पर पार्टी में भी कोई चूं चपड़ नहीं हुई। उत्तर प्रदेश में मिले बहुमत के आगे कौन उन्हें रोकने की हिम्मत कर सकता था।
अमित शाह राजनीति के रसायनशास्त्र से वाकिफ हैं। वह खांटी स्वयंसेवक हैं। पर विचारधारा में पगे कठमुल्ला नहीं। सफलता के लिए साम, दाम, दण्ड भेद उनके औजार हैं। चुनावी रणनीति में मर्यादा उनके आड़े नहीं आती। इसे इत्तेफाक ही कहेंगे कि गुजरात विश्वविद्यालय के केमिस्ट्री के इस छात्र को राजनीति और समाज की केमिस्ट्री बूझना आता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की कामयाबी से तो यही लगता है।
शतरंज के माहिर खिलाड़ी अमित शाह गुजरात शतरंज एसोसिएशन के वर्षों तक अध्यक्ष रहे हैं। शतरंज धैर्य और संयम के साथ रणनीति बनाना भी सिखाता है। गहराई से सोचना सिखाता है। जीतना सिखाता है। अमित कहते हैं कि हार का अवसाद न हो इसके गुर भी हम शतरंज से सीखते हैं। इसलिए हमने गुजरात के स्कूलों में शतरंज खेलना अनिवार्य किया है। आज गुजरात के 40 लाख स्कूली छात्र शतरंज सीखते हैं। ताकि वे लंबी रणनीति सोचना सीखें।
राजनीतिक नजरिये से देखें, तो अमित शाह का अध्यक्ष बनना भाजपा का कायाकल्प है। यह अटल, आडवाणी, जोशी युग का अंत भी है। एक नई युवा पार्टी का रूपान्तरण है। भाजपा के अध्यक्ष की उम्र 50 बरस न हो यह कोई सोच भी नहीं सकता था। इतनी कम उम्र में ऐसी जिम्मेदारी।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के फौरन बाद दीनदयाल उपाध्याय को भाजपा का अध्यक्ष सिर्फ इसलिए नहीं बनाया गया था कि उनकी उम्र 50 बरस से कम थी। इस वजह से मौलिचन्द्र शर्मा, प्रेमनाथ डोगरा, आचार्य देव प्रसाद घोष, पीताम्बर दास, अवसरला रामाराव, रघुवीर जी, बच्छ राज व्यास, बलराज मधोक को पार्टी की कमान दी गई। दीन दयाल जी के परिपक्व उम्र में पहुंचने का इंतजार हुआ। अमित शाह ने अपनी मेहनत और रणनीतिक कौशल से पार्टी की अध्यक्षी दो बरस में अर्जित की। उन्हें वही मिला, जिसके वे हकदार थे।
अमित शाह स्वदेशी और संघ की उस टोली के सदस्य नहीं हैं, जो विदेशी पूंजी को गड़बड़ मानती है। वे खुद अनुशासित हैं दूसरों को अनुशासित करना जानते हैं। इस प्रयोग को उन्होंने उत्तर प्रदेश में प्रमाणित किया है। बड़े-बड़े बूढ़े क्षत्रपों को किनारे लगा कर। बेधड़क, बेबाक और दो टूक फैसला सुना कर-'आप चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसी में आपका सम्मान है।' तभी उत्तर प्रदेश में पार्टी गुटों से बाहर आ पाई।
अमित शाह के अध्यक्ष बनने से नरेंद्र मोदी समझते हैं कि संगठन पूरी तरह प्रधानमंत्री की सोच में ढलेगा। वहीं संघ को लगता है कि अमित संघ की सोच और विचारधारा पर टिकने वाले होंगे। सरकार के दबावों के आगे नहीं झुकेंगे। यानी प्रधानमंत्री दफ्तर निवास के साथ-साथ भाजपा मुख्यालय भी सत्ता का एक केंद्र होगा। यह संयोग नहीं है कि अमित जब संघ की शाखा में आए तो 14 साल के थे। नरेंद्र मोदी से मिले तो 17 साल के थे। भाजपा में आए तो 22 साल के थे। मंत्री बने तो 35 साल के थे। और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष 50 से पहले बन गए। नरेंद्र मोदी की गुजरात और दिल्ली की सफलता के निर्णायक तत्व वही रहे। अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी दोनों के चुनाव इंचार्ज रहे।
हालांकि दिल्ली में उनकी छवि सोहराबुद्दीन इशरत जहां मुठभेड़ के आरोपी और जासूसी करने वाले शख्स की बनी। लोकसभा चुनाव न होते तो वे अपना लोहा न मनवा पाते। यह बात दूसरी है, जनता की नब्ज समझने, लोगों का गुस्सा बूझने और जातियों का व्यवहार आंकने में उन्हें महारत है। जब दिल्ली में अन्ना हजारे का अनशन हुआ। गुजरात भवन में टीवी देखते-देखते अमित शाह ने सोचा कि क्यों न जंतर-मंतर जा लोगों भीड़ का गुस्सा देखा जाए।
वह अपने एक परिचित की फिएट गाड़ी में बैठ जंतर-मंतर पहुंचे। नौजवानों और जनता का तेवर देख तुरंत कहा मनमोहन सरकार ने जनता का सौ फीसद विश्वास खो दिया है। दिल्ली जीतना आसान है। गुजरात भवन लौटे। फोन पर मोदी से बात की। लंबा विमर्श हुआ। ब्लू प्रिंट बना। रणनीति बनी। संघ से बात हुई। अच्छे दिन के ऑपरेशन का खाका बना। उसके बाद एक के बाद एक सिलसिलेवार काम-अभियान। नतीजा सामने है।
ऐसे आदमी को भाजपा की कमान मिली है। महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली के चुनाव सामने हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार की भी चुनौती है। यानी मुकाबला रोचक होगा। बतौर संगठन के मुखिया ये उनकी पहली परीक्षा होगी। अब देखना यह है कि मोदी सरकार की कड़वी दवा को वह कैसे मीठी गोलियों में तब्दील कर जनता का विश्वास जीतते हैं।