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पेटेंट कानून पर होगी नजर

Sat, 24 Jan 2015 08:13 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
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जब आप यह कॉलम पढ़ रहे होंगे, तब तक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा दिल्ली पहुंच चुके होंगे। सबकी निगाहें उनकी इस तीन दिवसीय यात्रा पर है, जिसमें दुनिया के दो सबसे बड़ा लोकतंत्र हाल के वर्षों में आपसी रिश्तों में आए तनाव को भुलाकर आगे बढ़ना चाहेंगे। ओबामा गणतंत्र दिवस की परेड में शरीक होने वाले न पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ही नहीं, दो बार भारत की यात्रा पर आने वाले अमेरिका के पहले राष्ट्राध्यक्ष भी हैं। इससे पहले वह 2010 में भारत आए थे। प्रधानमंत्री मोदी का गणतंत्र दिवस परेड पर ओबामा की मेजबानी करना हाई-प्रोफाइल कूटनीति से भरे उनके पिछले एक वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि है। तमाम विश्लेषकों के मुताबिक ओबामा की यह यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारत और अमेरिका के बेहतर होते रिश्ते का सुबूत देती है। उल्लेखनीय है कि न्यूयॉर्क में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागडे के प्रकरण के बाद 2013 के अंत तक दोनों देशों के रिश्ते बेहद खराब हो गए थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ओबामा तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात करेंगे। इनमें द्विपक्षीय व्यापार, जलवायु परिवर्तन, रक्षा सहयोग में बढ़ोतरी और भारत के असैन्य परमाणु क्षेत्र में काफी समय से लंबित निवेश जैसे मुद्दे शामिल होंगे।
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मगर सवाल यह है कि मोदी-ओबामा वार्ता महज प्रतीकात्मक बनकर रह जाएगी, या इसके कुछ ठोस नतीजे भी सामने आएंगे। इस बातचीत के दौरान महत्वपूर्ण घोषणाएं हों, या नहीं, मगर इतनी उम्मीद जरूर है कि दोनों देश रणनीतिक सहयोगी के तौर पर आगे बढ़ते हुए पारस्परिक रिश्तों को ऐसा आयाम देंगे, जो भारत और अमेरिका, दोनों के लिए फायदेमंद हो। वार्ता के एजेंडे में बौद्धिक संपदा अधिकार के मुद्दे के शामिल होने की भी उम्मीद है, जो कि लंबे समय से दोनों देशों के बीच बहस का विषय बना हुआ है। दरअसल, इसमें एक ओर बड़ी फार्मास्युटिकल कंपनियों का मुनाफा दांव पर लगा है, तो दूसरी तरफ भारत व दूसरे विकासशील देशों के लाखों रोगियों की जिंदगी दांव पर है, जो भारत में बनने वाली सस्ती जीवनरक्षक जेनेरिक दवाओं पर निर्भर हैं।

किसी देश के बौद्धिक संपदा अधिकार का क्षेत्र वहां दवाओं के पेटेंट की प्रक्रिया पर असर डालता है। सस्ती दवाओं पर होने वाली हर वैश्विक बहस में भारत पर फोकस जरूर होता है, क्योंकि यहां की फार्मास्युटिकल कंपनियों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तैयार ब्रांडेड दवाओं के सस्ते प्रारूप तैयार करने की क्षमता है। भारतीय कंपनियों के लिए ऐसा करना इसलिए मुमकिन है, क्योंकि यहां के कानून के मुताबिक पेटेंट देने की प्रक्रिया का आधार मजबूत है। इसके उलट, पेटेंट के उदार मापदंड का मतलब है कि किसी दवा के संघटन में किए गए छोटे-से बदलाव से कंपनी को नया पेटेंट मिल सकता है, और इस आधार पर किसी दूसरी कंपनी को 20 वर्ष तक यह दवा बनाने का अधिकार नहीं होगा। इस क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि इसी प्रावधान का फायदा उठाते हुए पश्चिम की बहुत-सी फार्मा कंपनियों ने अपना एकाधिकार कर लिया है, और इसी वजह से जीवनरक्षक दवाओं के दाम में इजाफा हुआ है, और खासकर एशिया व अफ्रीका के लाखों लोगों की पहुंच से ये दवाएं दूर हो गई हैं।
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स्वास्थ्य और रोगियों के अधिकारों के लिए लड़ रहे समूहों का मानना है कि फार्मेसी क्षेत्र में भारत का स्थान खतरे में है। इन समूहों ने मोदी सरकार से आह्वान किया है कि वह भारत के पेटेंट कानून को कमजोर करने के लिए अमेरिका द्वारा डाले जा रहे दबाव का विरोध करे। गौरतलब है कि भारतीय पेटेंट कानून का सेक्शन तीन (डी) ज्ञात औषधियों में कुछ बदलाव कर तैयार दवाओं के पेटेंट का निषेध करता है। इस क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न समूह इस प्रावधान को जरूरी मानते हैं, ताकि भारत और दूसरे देशों में सस्ती जेनेरिक दवाएं बेची जा सकें। इस सेक्शन को आधार बनाकर भारत में उन पेटेंटों को नकार दिया गया है, जो मामूली फेरबदल कर दवाओं का पेटेंट मांगते है। विदेशी फार्मास्युटिकल उद्योग इसी को दवा क्षेत्र में नई खोज का बाधक मानकर इसका विरोध कर रहे हैं।

तमाम कार्यकर्ता हाल के कई घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि अमेरिका किस तरह गरीबों के हितों का ख्याल रखने वाले भारतीय पेटेंट कानून को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। मसलन, अप्रैल 2014 में अमेरिका ने भारत को पेटेंट का सर्वाधिक उल्लंघन करने वाले देशों की सूची में शामिल किया। अमेरिका इसके अलावा भारतीय पेटेंट कानूनों पर एक जांच भी बैठा चुका है। पेटेंट कानूनों पर पॉजिटिव पीपुल और नेशनल वर्किंग ग्रुप के दिल्ली नेटवर्क के लॉयर्स कलेक्टिव, जन स्वास्थ्य अभियान ने इस हफ्ते कहा, 'अमेरिका-भारत व्यापार नीति फोरम और पूरे वर्ष होने वाली तमाम बैठकों के जरिये द्विपक्षीय तंत्र बनाया गया है, जो बौद्धिक संपदा से जुड़े मुद्दों पर अमेरिकी दबाव पर रोक लगाने का काम करेगा।' गौरतलब है कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार नीति तैयार करने के लिए एक थिंक टैंक का भी गठन किया है। भारत और अमेरिका के बीच फार्मास्युटिकल क्षेत्र में समस्याओं को देखते हुए दोनों देशों की फार्मा कंपनियों की निगाहें ओबामा और नरेंद्र मोदी पर टिकी होंगी।
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