किसी विशेष मेहमान की अगवानी से पहले अपनी कमजोरियों और खराब चीजों पर झाड़ू फेरने का चलन आम है। सो, यही काम दिल्ली में हो रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के आगमन से पहले दिल्ली को साफ-सुथरा करने के आदेश जारी किए गए हैं। दिल्ली नगर निगम के आवारा पशुओं को पकड़ने वाले दस्ते को काम में लगा दिया गया है। उन्हें आदेश दिए गए हैं कि वे अक्सर ट्रैफिक जाम कर देने वाली गायों और अन्य पशुओं को पकड़कर कहीं दूर ले जाएं। तो कुछ लोग बलुआ पत्थरों से बने राष्ट्रपति भवन के आसपास से गुलेल मारकर सैकड़ों बंदरों को भगाने की कोशिश में जुटे हैं। निगम कर्मी सड़कों पर गश्त कर रहे हैं और भिखारियों से मनुहार कर रहे हैं कि वे कम से कम तीन दिन तक रैन बसेरों में रहें। मगर, नई दिल्ली नगर निगम के चेयरमैन जलज श्रीवास्तव कहते हैं, 'आप देख सकती हैं, हम एक हद तक ही काम कर सकते हैं। मैं इसके लिए कोई 'मिलिट्री ऑपरेशन' तो चला नहीं सकता।' इसका असर दिख रहा है। सड़कों पर खाद्य सामग्री बेचने वाले, खोमचे वाले, जूते-चप्पलों की मरम्मत करने वाले, और लालबत्तियों पर नकली मोतियों की मालाएं, डस्टर और पाइरेटेड किताबें बेचने वाले धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं।
दिल्ली के प्रमुख व्यावसायिक केंद्र में अपने बुक स्टॉल से बाहर का नजारा देख रहे विनोद पाहुजा कहते हैं, ऐसा लग रहा है मानो घर में शादी की तैयारी चल रही है। जैसे हम घर की पुताई करते हैं, वैसे ही सरकार शहर के रंग-रोगन में जुटी है। फिर वह कहते हैं, 'और जब मंगलवार को ओबामा वापस लौट जाएंगे, तब सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।'
दरअसल ऐसे किसी बड़े समारोह से पहले दुनिया भर के बड़े शहरों में अपनी खराब चीजों को इसी तरह छिपाने की कोशिशें होती हैं। 1988 में दक्षिण एशिया में ओलंपिक से पहले सियोल नगर निगम के सफाई कर्मियों ने फुटपाथ के किनारे लगी रेलिंग की सफाई टुथब्रशों से की थी। मगर दिल्ली के अधिकारियों को सड़कों और बाजारों को बसेरा बनाने वाले आवारा पशुओं से जूझना पड़ रहा है। एनएमडीसी के एक चिकित्सा अधिकारी कहते हैं, 'आबादी बढ़ने के बावजूद भारतीयों की पशुओं को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाने की मानसिकता कायम है, सो हम किसी तरह की कड़ाई नहीं कर सकते।'
राजधानी दिल्ली के लोग बंदरों से खासे परेशान हैं। भारत में बंदरों को भगवान हनुमान का प्रतिनिधि माना जाता है, इस वजह से भी उनसे निपटने में मुश्किल आती है। शहर के आसपास जंगलों का दायरा खत्म हो रहा है, और वहां आवासीय कॉलोनियां बन गई हैं। इनमें से कुछ में तो भारत के शीर्ष अधिकारी तक रहते हैं। मगर बंदर हैं कि खाने के सामान की तलाश करते हुए किचन में घुसकर रेफ्रीजरेटर तक का मुआयना कर डालते हैं। श्रीवास्तव कहते हैं, 'कई वरिष्ठ अधिकारी तक हमें ऐसी शिकायत कर चुके हैं। वे कई बार मेरे मोबाइल पर फोन कर कहते हैं कि मैं अपने घर में कैद हो गया हूं, क्योंकि बाहर बंदरों का झुंड डेरा जमाए हुए है। मैं बाहर नहीं निकल सक रहा हूं, कृपया कुछ कीजिए।'
लेकिन उनके पास विकल्प बहुत सीमित हैं। उन्हें पकड़ना खतरनाक है, उन्हें मारने की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती। कुछ वर्ष पहले लोहे के पिंजरे भी लाए गए थे, लेकिन बंदरों ने उनसे निकल भागने के भी रास्ते निकाल लिए। दो वर्ष पहले प्रशिक्षित लंगूरों की भी सेवाएं ली गईं, लेकिन सरकार ने लंगूरों को बांधकर रखने पर पाबंदी लगा दी है। दक्षिण दिल्ली में, जहां से ओबामा का काफिला निकलेगा, आवारा गायों की समस्या है।
कनॉट प्लेस में अक्सर नंगे पैरों और बदहाल कपड़ों में पर्यटकों को बाल पेन और नेकलेस बेचते नजर आने वाले बच्चे अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं। जब भी कोई बड़ा व्यक्ति आता है, तो पुलिस वाले इन्हें वहां से खदेड़ देते हैं। नेकलेस बेचने वाला रविशंकर बताता है कि जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आए थे, तब भी पुलिस ने उन्हें भगा दिया था।
नगर निगम के चेयरमैन श्रीवास्तव कहते हैं कि वह तो चाहते थे कि ओबामा के प्रवास के दौरान सारे भिखारियों को रैन बसेरों में भेज दिया जाए, लेकिन हमें कई गैर सरकारी संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कनॉट प्लेस में तीस वर्ष से बुक स्टॉल चला रहे पाहुजा कहते हैं कि अगले हफ्ते ये भिखारी फिर वापस आ जाएंगे।