इस बहस को और कुछ दिन पहले शुरू होना चाहिए था। मैं नियम 267 के तहत होने वाली बहस और किसी दूसरे नियम के तहत होने वाली बहस के फर्क को समझ पाने में विफल हूं। यह सरकार जिद्दी है, जिसके लिए लोग इसकी अहंकारी प्रवृत्ति को जिम्मेदार ठहराते हैं। सबसे पहले मूल्यवृद्धि पर बात करते हैं। यह बहस देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति पर नहीं है। अगर होती, तो कुख्यात मुद्रास्फीति के बाद से इस सरकार के आर्थिक प्रबंधन, बल्कि कुप्रबंधन पर हम सैकड़ों तरह की बात कर सकते थे। कीमत बढ़ रही है। बढ़ती कीमत से खासकर गरीब और मध्यवर्गीय लोगों का जीवन बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। उपभोग और बचत में गिरावट आ रही है। परिवारों का कर्ज बढ़ रहा है और खासकर महिलाओं और बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा है। दुर्भाग्य से, हमारी सरकार इन तथ्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। उस दिन मैं यह सुनकर हैरान रह गया कि माननीय वित्तमंत्री ने दूसरे सदन में यह कहा कि जीएसटी की दरों में वृद्धि का लोगों पर कोई असर नहीं पड़ा है! उनकी इस टिप्पणी पर मैं सबसे अंत में सरकार के सामने एक चुनौती पेश करना चाहूंगा।
कारण और दिशा
मैं उम्मीद करता हूं कि यह बहस अपने उद्देश्यों से नहीं भटकेगी। 'तू-तू-मैं मैं' से यह बहस कहीं नहीं पहुंचेगी। मैं सरकार और उसके सभी सम्माननीय सदस्यों से प्रार्थना करता हूं कि वे अवहनीय मूल्यवृद्धि की वास्तविकता को स्वीकार करें और इससे संबंधित प्रासंगिक प्रश्न का जवाब तलाशने की कोशिश करें : 'मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए सरकार क्या कदम उठाएगी?' मौजूदा मुद्रास्फीति के कारणों की तलाश करना सबसे महत्वपूर्ण है। वित्तीय घाटे से मैं इसकी शुरुआत करता हूं। हम जानते हैं कि बढ़ता हुआ और चिंताजनक वित्तीय घाटा कीमतों को प्रभावित करता है। इसकी व्याख्या करने का समय मेरे पास नहीं है। इस साल के बजट में सरकार का अनुमानित वित्तीय घाटा 6.4 फीसदी या 16,61,196 करोड़ रुपये था। अप्रैल से जून के बीच वित्तीय घाटा 3,51,871 करोड़ रुपये पर पहुंच गया था। हम जानते हैं कि सरकार ने खर्च को घटाकर दिखाया है। क्या सरकार ने राजस्व की प्राप्ति को भी घटाकर दिखाया है? क्या सरकार वित्तीय घाटे को 6.4 फीसदी पर बरकरार रख पाएगी? हम इस बारे में सरकार से ठोस जवाब चाहते हैं।
मनुष्य निर्मित कारण
अब हम चालू खाते के घाटे पर बात करते हैं। अप्रैल-जून में चालू खाते का घाटा 30 अरब डॉलर के आसपास था। जुलाई में व्यापार घाटा 31 अरब डॉलर था। पूरे साल का चालू खाते का घाटा अगर 100 अरब डॉलर से अधिक हो जाए, तो इसके भयावह नतीजे होंगे। सरकार इस सदन को बताए कि चालू खाते का घाटा कम करने के लिए वह क्या कर रही है? माननीय सभापति महोदय, इस मुद्दे पर भी मैं स्पष्ट जवाब चाहूंगा। तीसरी खतरे की घंटी ब्याज दर है। हम जानते हैं कि नीतिगत दरें रिजर्व बैंक द्वारा तय की जाती हैं। सरकार ने मौद्रिक नीति समिति में तीन सदस्यों को नामित किया है। सरकार का सचिव रिजर्व बैंक के बोर्ड में है।
लिहाजा सरकार यह नहीं कह सकती कि इस मामले में उसकी कोई जवाबदेही नहीं है। जब विकसित देश उदार मौद्रिक नीति पर अमल करते हुए बाजार में पैसे झोंक रहे थे, तब भारत ने उनका अनुसरण करना शुरू किया। अब वे ब्याज दर बढ़ा रहे हैं। मुझे लगता है कि अपना देश भी अब उदार मौद्रिक नीति से पीछा छुड़ाएगा। अगर रिजर्व बैंक ब्याज दर में वृद्धि जारी रखता है, तो मांग में कमी आएगी, जिससे कीमत भी घटेगी। पर उससे बिक्री, मुनाफा और सर्वोपरि-रोजगार भी प्रभावित होगा। क्या सरकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर एक साथ खड़े हैं? क्या सरकार ब्याज दर के बारे में अपनी भविष्यवाणी को हमारे साथ साझा करेगी?
चिंता का चौथा कारण आपूर्ति का मोर्चा है। चूंकि फिलहाल उदार आयात की संभावनाएं नहीं हैं, ऐसे में, घरेलू उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार क्या कर रही है? एमएसएमई क्षेत्र गहरे संकट में है, और तब तक वह कोई मदद नहीं कर सकता, जब तक उसकी मदद न की जाए। बड़ी कंपनियों की रुचि अपना मुनाफा बढ़ाने में है, इस कारण वे आपूर्ति को कृत्रिम तरीके से बाधित करती हैं। जीएसटी कानून और ब्याज दर से व्यापार ध्वस्त हो चुका है। मेरा प्रश्न यह है कि वस्तुओं और सेवाओं की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार क्या कर रही है।
असली पाप
अंत में मैं उस मुद्दे पर विचार कर रहा हूं, जिससे लोग सबसे ज्यादा परेशान हैं : यानी सरकार की कर नीति। यह सरकार का असली पाप है, जिसने कठोर टैक्स थोपकर और पेट्रोल-डीजल पर अधिभार लगाकर मुद्रास्फीति को हवा दी। सरकार ने तेल कंपनियों के जरिये कर, अधिभार और लाभांश के रूप में 26,00,000 रुपये का भारी-भरकम टैक्स इकट्ठा किया। यह सरकार बेदर्द, हृदयहीन और गरीब-विरोधी है। इसने बीच-बीच में उन वस्तुओं और सेवाओं की जीएसटी दर में भी वृद्धि की, जिनका इस्तेमाल गरीब और मध्यवर्ग के लोग करते हैं। इस सरकार को छह साल की कृति दुबे के दर्द की परवाह नहीं, जो यह नहीं समझ पाती कि दूसरी पेंसिल मांगने पर उसकी मां उसे डांटती क्यों है, या उसे उस मां के दर्द की चिंता नहीं है, जो अपनी बेटी को दूसरी पेंसिल नहीं दिलवा सकती।
इस सरकार के पास दिमाग और हृदय हो, तो सबसे पहले यह पेट्रोल और डीजल पर टैक्स कम करेगी, एलपीजी की कीमत घटाएगी और उन आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स में की गई वृ्द्धि तत्काल वापस लेगी, जिनका इस्तेमाल मध्यवर्ग और गरीब करते हैं। माननीय सभापति महोदय, अब मैं उस चुनौती पर आता हूं, जिसके बारे में मैंने पहले बताया था। आदरणीय सभापति महोदय, सम्माननीया वित्तमंत्री और मैं-यानी हम तीनों बगैर किसी सुरक्षा गार्ड के एक कार में मध्यवर्गीय पड़ोस या दिल्ली की किसी बस्ती में चलते हैं। वहां के लोगों से यह पूछा जाए कि एलपीजी की बढ़ी कीमत और जीएसटी की बढ़ी हुई दरों से उनका जीवन प्रभावित हुआ है या नहीं। वे जो कहेंगे, मैं उसे स्वीकार कर लूंगा। माननीय सभापति महोदय और सम्माननीया वित्तमंत्री को भी आम आदमी की राय से इत्तफाक रखना होगा।