दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का यह अनुपम एवं पावन अवसर है, जहां एक गरीब परिवार की संथाल आदिवासी महिला का राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्रपति भवन में पदार्पण हुआ है। यह समूचा घटनाक्रम भाजपा और यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की अंत्योदय सोच और वंचितों के सशक्तीकरण के प्रति उनकी वचनबद्धता का प्रमाण है। देश के सर्वोच्च सांविधानिक पद पर द्रौपदी मुर्मू जी का बैठना विश्व के विराटतम लोकतंत्र पर अंत्योदय का सशक्त हस्ताक्षर है। उनका राष्ट्रपति पद का शपथ ग्रहण किसी पार्टी या प्रदेश के लिए ही नहीं, पूरे देश के लिए गर्व का क्षण था।
उन्होंने साबित कर दिया कि भारत का लोकतंत्र सशक्त भी है और समावेशी भी। यहां समाज के हर वर्ग का व्यक्ति देश के नेतृत्व का सपना देख भी सकता है और दृढ़ निश्चय के बल पर उसे पूरा भी कर सकता है। झोपड़ी से राष्ट्रपति भवन तक का सफर तय कर हमारी महामहिम जी ने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के माथे पर एक स्वर्णिम तिलक लगाया है। महामहिम का निर्वाचन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आजाद भारत की एक सुनहरी तस्वीर पेश करने की ऐसी अनुपम कोशिश है, जिसके माध्यम से हमारे प्राचीन समावेशी समाज की अद्भुत और अप्रतिम विशेषता जनमानस के समक्ष गौरवशाली ढंग से पेश हो रही है, कि देश के राष्ट्रपति का स्थान अब एक आदिवासी महिला ने ले लिया है।
यह सिर्फ और सिर्फ भारत में ही संभव है। आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के रूप में भारतीय लोकतंत्र की गाथा में एक सुनहरा अध्याय जुड़ गया है। राष्ट्रपति मुर्मू करोड़ों जनजातीय महिलाओं और युवाओं के लिए आइकॉन बन गई हैं, क्योंकि उनका जीवन है ही इतना प्रेरणादायी। विकास के हाशिये पर पड़े ओडिशा के मयूरभंज जिले के एक पिछड़े आदिवासी गांव में पली-बढ़ीं द्रौपदी मुर्मू अपने गांव में कॉलेज जाने वाली पहली लड़की थीं। फिर उन्होंने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ शिक्षिका के तौर पर उस पिछड़े इलाके के बच्चों का भविष्य संवारा।
लेकिन वह यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने सामाजिक जीवन में सक्रियता बढ़ाई और पहले पंचायत नेता, फिर विधायक और मंत्री भी बनीं। महामहिम द्रौपदी मुर्मू जी को आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए कार्य करने का 20 वर्षों का लंबा अनुभव है। वह झारखंड की राज्यपाल भी बनीं और अपना कार्यकाल पूरा करने वाली वहां की पहली गवर्नर भी। उनके प्रेरणादायी जीवन, कठोर पारिवारिक त्रासदियों के बावजूद देशसेवा के प्रति अद्भुत समर्पण को देखकर ही प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एनडीए ने उन्हें अपना राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। उनकी जीत के आंकड़े ने साबित कर दिया कि विपक्ष के उम्मीदवार प्रतीकात्मक लड़ाई भी नहीं लड़ पाए।
20 जून, 2022 को अपना 64वां जन्मदिन मनाने वाली हमारी महामहिम ने आजादी के बाद पैदा होने वाली पहली राष्ट्रपति होने का गौरव भी हासिल किया है। यह सब समीकरण आज़ादी के अमृत महोत्सव के पावन अवसर पर सोने में सुहागा जैसा है। जनजातीय समाज को अपने ही एक साथी का देश के सर्वाच्च पद तक पहुंचना गौरवान्वित भी कर रहा है और भावुक भी। क्योंकि पिछले सात दशकों में भारत के नौ फीसदी जनजातीय समाज से वादे तो बहुत किए गए, वोट भी बटोरे गए, लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचाने की बात कभी नहीं की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशकों के इंतजार को खत्म करके जनजातीय समाज के साथ न्याय किया, उन्हें सम्मान दिया।
प्रधानमंत्री ने यह संदेश दिया है कि जनजातीय समाज को केवल विकास की मुख्यधारा से जोड़ना ही काफी नहीं है, बल्कि उन्हें सर्वोच्च सम्मान देना भी जरूरी है। मेरा सौभाग्य है कि द्रौपदी मुर्मू जी के निर्वाचन के बाद ही मुझे उन्हें कुछ रोचक पुस्तकें भेंट करने का अवसर मिला। उनकी सादगी, राष्ट्रप्रेम और देश के पिछड़ों, वंचितों, महिलाओं और युवाओं के उत्थान की चिंता उनके व्यक्तित्व की विशालता को दर्शाती है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू महात्मा गांधी और पं दीनदयाल उपाध्याय के सपनों के भारत की प्रतीक हैं। आजादी के अमृत काल में यह भारत के लोकतंत्र के लिए सशक्तीकरण का अविस्मरणीय क्षण है। (-लेखक केंद्रीय सूचना प्रसारण और युवा एवं खेल मामलों के मंत्री हैं।)