जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई और नई मानव बस्तियां अनिवार्य होती गईं, इसका नुकसान जलस्रोतों को हुआ। आजमाया हुआ कौशल था 'धीरे-धीरे फैलता अतिक्रमण'। किसी जलस्रोत के किनारे पहले कुछ झोपड़ियां उग आएंगी और फिर आने वाले महीनों में उनकी संख्या बढ़ती जाएगी। अतिक्रमण बढ़ने के साथ ही जलस्रोत सिकुड़ने लगेगा और फिर एक दिन गायब हो जाएगा। ठीक उसी तरह से जैसे समुद्र के आगे बढ़ने से तटरेखा पीछे खिसक गई। इसे कटाव या क्षरण कहते हैं।
कटाव
दो शब्दों- अतिक्रमण और कटाव- को स्वतंत्रता से भी जोड़कर देखा जा सकता है। किसी आजाद देश में आधी रात को स्वतंत्रता नहीं छीनी जाएगी। यह धीरे-धीरे घटती जाएगी- चुपचाप, चोरी-छिपे, धूर्तता से- जब तक कि एक दिन आप यह नहीं जान जाते कि अब आप उतने मुक्त नहीं हैं, जितने कुछ महीने पहले तक थे। और जब तक आपको यह एहसास होगा कि आपने अपनी स्वतंत्रता खो दी है, तब आपने जो खोया है, उसे हासिल करने के लिए देर हो चुकी होगी।
इस भ्रम में न रहें कि आप अपनी स्वतंत्रता नहीं खो सकते। जरा उन देशों की गिनती कीजिए, जिन्होंने 1947 में जब भारत ने स्वतंत्रता हासिल की थी, उस समय और उसके बाद के दशक में आजादी हासिल की। और अब यह भी गिनती कीजिए कि उनमें से कितनों ने अपनी स्वतंत्रता, किसी औपनिवेशिक शासन के हाथों नहीं, बल्कि अपने ही देशों के तानाशाहों के हाथों खो दी। उनमें से अनेक देशों में अब भी चुनाव आयोग हैं और वहां चुनाव होते हैं; एक न्यायपालिका और जज हैं; एक संसद और सांसद हैं; एक मंत्रिमंडल और मंत्रीगण हैं; और अखबार और पत्रकार हैं। लेकिन जब आप ऐसे किसी देश में जाते हैं या वहां रहते हैं, तब आपको पता चलता है कि यह स्वतंत्र देश नहीं है। ऐसे देशों में एक स्वतंत्र देश का साज-सामान होता है, लेकिन वे अधिनायकवादी राज्य होते हैं।
स्वीडन के वी-डेम इंस्टीट्यूट ने देशों को उदार लोकतंत्र, चुनावी लोकतंत्र, चुनावी तानाशाही और बंद तानाशाही के रूप में वर्गीकृत किया है। 2021 में, इस संस्थान ने भारत को 'चुनावी निरंकुशता' के रूप में वर्गीकृत किया। यह शर्म का बिल्ला है।
क्रमिक संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 (1) (ए) और (जी) व्यक्तिगत के साथ ही उस संस्था की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं, जिसे प्रेस कहा जाता है। छह अप्रैल, 2023 की तारीख दर्ज कर लीजिए। यह वह दिन था, जिस दिन प्रेस की स्वतंत्रता के क्षरण को एक संदिग्ध कानून की मंजूरी मिली थी। आपातकाल (1975-77) के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता रातोंरात छीन ली गई थी। (यह भयावह तरीके से गलत था और इंदिरा गांधी ने आपातकाल के लिए माफी मांगी)। छह अप्रैल को सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम (आईटी-रूल) 2021 में संशोधन किया और संशोधन के बाद यह इस तरह हो गया (संशोधन बोल्ड इटैलिक में):
' 3 (1) एक मध्यवर्ती (मध्यस्थ) द्वारा उचित उद्यम से: एक मध्यवर्ती, इसमें सोशल मीडिया मध्यवर्ती, एक महत्वपूर्ण सोशल मीडिया मध्यवर्ती और ऑनलाइन गेमिंग मध्यवर्ती शामिल हैं, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय निम्नलिखित उचित सावधानी बरतेंगे, अर्थात्:
(बी) मध्यवर्ती.....उचित प्रयास करेगा ताकि इसका उपयोगकर्ता अपने कंप्यूटर से ऐसी कोई सूचना प्रदर्शित, अपलोड, संशोधित, प्रकाशित, संग्रहित, अद्यतन या साझा नहीं करेगा जो कि —
संदेश की उत्पत्ति के बारे में प्राप्तकर्ता को धोखा देती है या गुमराह करती है या जान-बूझकर और इरादतन किसी गलत सूचना का संचार करती है या जानकारी जो स्पष्ट रूप से झूठी और असत्य या प्रकृति में भ्रामक है या, केंद्र सरकार के किसी भी काम के संबंध में, केंद्र सरकार की ऐसी फैक्ट चेक इकाई द्वारा नकली या गलत या भ्रामक के रूप में पहचानी जाती है, जिसे मंत्रालय ने, आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट किया है। '
शरारत जग जाहिर है। संशोधित नियम 'केंद्र सरकार के किसी भी काम' पर लागू होता है। केंद्र सरकार की एक 'फैक्ट चेक इकाई' होगी। यह आधिकारिक सेंसर का एक रूप है। सेंसर के पास यह शक्ति होगी कि वह पहचान कर सके कि कोई खबर 'झूठी या गलत' है।
यह निर्णय विशुद्ध रूप से व्यक्तिपरक होगा, जिसमें कोई न्यायिक निरीक्षण नहीं होगा। एक बार खबर के नकली या झूठे होने की पहचान हो जाने के बाद, समाचार पत्र, टीवी चैनल और सोशल मीडिया आउटलेट समाचार को हटाने के लिए 'अपने कंप्यूटर संसाधन के उपयोगकर्ता' को मजबूर करेंगे।
मैं इस आलेख को संशोधित नियम की गंभीर कानूनी दुर्बलताओं के बोझ से नहीं लादूंगा। कहने की जरूरत नहीं कि यह निर्धारित करने के लिए, कि क्या फर्जी/गलत है या नहीं, सरकार ही मुद्दई, पंच और जज है। संशोधित नियम का एक इतिहास है। 2021 में बने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों ने मध्यवर्तियों पर भारी बाध्यकारी बोझ डाला है। विभिन्न अदालतों में नियमों को चुनौती दी गई है। 28 अक्तूबर, 2022 को सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया नैतिक संहिता) नियम, 2022 को अधिसूचित किया और पहला महत्वपूर्ण संशोधन नियम 3 (1) (बी) (वी) में किया। अब छह अप्रैल, 2023 को नियम 3 (1)(बी)(वी) की अधिसूचना में और संशोधन किया गया। यही आजादी का धीरे-धीरे क्षरण है।
यह अदालत निर्धारित करेगी कि संशोधित नियम संविधान और कानूनों के अनुसार वैध हैं या नहीं।
आपको गैर-कानूनी और स्वतंत्रता-संबंधी पहलुओं पर गौर करना चाहिए :
- क्या स्वतंत्र लोकतांत्रिक देश में खबर सेंसर की जानी चाहिए?
- क्या आप खबरों के सेंसर को स्वीकार करेंगे?
- क्या सेंसर को सरकार द्वारा नियुक्त सेंसर होना चाहिए?
- क्या सेंसर को विषय का व्यक्तिपरक ढंग से फैसला करना चाहिए?
- क्या इस तरह की सरकारी कार्रवाई बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर 'चिंताजनक प्रभाव' पैदा नहीं करेगी?
- एक अनमोल अधिकार का हनन किया जा रहा है। यह सिलसिला जारी है, इसके खत्म होने से पहले जाग जाइए।