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जड़ों से जुड़ाव की जरूरत

बद्री नारायण Published by: Raman Singh Updated Thu, 27 Jun 2019 06:19 PM IST
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बद्री नारायण - फोटो : a

रमेश पोखरियाल निशंक देश के नए  मानव संसाधन मंत्री बनते ही विवादों के घेरे में आ गए। उनका भारतीय ज्ञान की सर्वोच्चता पर जोर देना विवाद का विषय बना। ज्योतिष के ज्ञान पक्ष और भारतीय पारंपरिक ज्ञान की शक्ति पर उन्होंने जोर देना शुरू कर दिया। उनके इस आग्रह पर असहमतियां हो सकती हैं। किंतु उनके इस कदम से भारतीय ज्ञान, चिंतन एवं विमर्श को लेकर कुछ बड़े सरोकार उभरते हैं। भारतीय ज्ञान पर हमारा ज्ञान विमर्श वह चाहे समाज विज्ञान का ज्ञान हो या विज्ञान का बहुत कम शोध हुआ है।



अगर हम समाज विज्ञान की बात करें, तो भारतीय आजादी के लगभग 72 वर्षों बाद भी समाज विज्ञान में शोध की अवधारणाएं, परिप्रेक्ष्य, शब्दावलियां प्रायः पश्चिमी चिंतकों के ज्ञान विमर्श से ली जाती हैं। सामाजिक सच्चाई पर हम भारत का अध्ययन करना चाहते हैं और पश्चिमी समाज के अनुभवों से पैदा हुई दृष्टि, अवधारणा को लेकर हम अध्ययन के लिए उतरते हैं। परिणाम होता है कि हम अपनी सामाजिक सच्चाई को ठीक से पकड़ने में असफल हो जाते हैं।


हर समाज अपना ज्ञान पैदा करता है। हर समाज अपना बौद्धिक सृजित करता है। ज्ञान एवं बौद्धिक परंपरा का अपने सामाजिक अनुभवों से गहरा तादात्मय होता है। अपने समाज की अद्भुत ज्ञान परंपरा में ही उक्त समाज को समझने देखने एवं अध्ययन करने की पद्धति छिपी होती है। लेकिन हम आज भी अपनी ज्ञान परंपरा के बारे में अपने भीतर एक हीन भावना पाले रखते हैं। फलतः पश्चिमी ज्ञानियों का संदर्भ देना, उनका गौरव ज्ञान कर हम आत्मविश्वास महसूस करते हैं। पश्चिम हमारी अस्मिता में बहुत गहरे घुसा हुआ है। प्रसिद्ध समाज वैज्ञानिक आशीष नंदी हमारी अस्मिता में पश्चिम के गहन प्रवेश की समीक्षा करते हुए इसे 'इन्टीमेट एनिमी'; कहते हैं। एक आत्मीय से लगने वाले शत्रु के रूप में पश्चिमी ज्ञान हमारी अस्मिता में मौजूद है। इसी के कारण हम अपने समाज के बौद्धिकों को अपनी ज्ञान परंपरा को, अपने सामाजिक शोधों में संदर्भ देने, विमर्श में लाने से बचते हैं। हमें जब पश्चिम सराहता है, तभी हम अपने समाज के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। जब महत्वपूर्ण उत्तर आधुनिक विचारक देरिदा ने बौद्ध विमर्श को अपने चिंतन में महत्व दिया, तो बौद्ध विद्वान नागार्जुन के महत्व का भान हमें हुआ।


सामाजिक ज्ञान रचने के क्रम में शंकराचार्य के दर्शन को पश्चिम में ज्यादा जगह एवं संदर्भ दिया जाता है। भारत में कम। भारत में हम उन्हें ज्ञानी, दार्शनिक के रूप में नहीं देखते वरन् उन्हें धार्मिक विमर्शकार एवं धर्म प्रचारक के रूप में देखते हैं। अनेक पौराणिक विमर्श आज की आधुनिकता से संकटग्रस्त समाज को समझने एवं उससे बचाने में हमारी मदद कर सकते हैं।

हम इस पर सोचना भी नहीं चाहते, बल्कि ऐसा सोचने को गलत भी मानते हैं।


हम विज्ञान एवं आधुनिकता पर गौरवान्वित तो होते हैं, परंतु भूल जाते हैं कि देशज आधुनिकताएं भी होती हैं एवं देशज ज्ञान-विज्ञान भी। मानव संसाधन मंत्री निशंक द्वारा ज्योतिष ज्ञान का महत्व देने पर चिंतित मीडिया आज बाजार द्वारा उत्कृष्ट ढंग से पैक किए जा रहे आयुर्वेद के ज्ञान का महत्व अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति की तुलना में स्वीकार करने लगा है। ‘योग’ का ज्ञान भारतीय ज्ञान परंपरा से उपजा है। आज पूरी दुनिया योग करती दिख रही है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय राज्य नेे अपनी आलोचनाओं का परवाह न करते हुए इसे विश्व स्तर पर प्रचारित किया। भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक आलोचक भी आज ‘योग’ की महत्ता को मानने लगे हैं।


सामाजिक विज्ञान में हिंदी क्षेत्र ने अनेक चिंतक पैदा किए, किंतु उन्हें हम अपने सामाजिक शोधों में संदर्भित भी नहीं करते और देरिदा, फूको और हेबरमॉस में फंसे रहते हैं। अगर हिंदी क्षेत्र की बात करें, तो बनारस में रहने वाले संस्कृत के महान ज्ञानी गोपीनाथ कविराज का चिंतन एवं दृष्टि हमारे पूरे विमर्श से गायब है। राहुल सांकृत्यायन की भाषा, बोली, बौद्धज्ञान संबंधी दृष्टि एवं ज्ञान से भी हमारे ज्यादातर हिंदी क्षेत्र के समाज वैज्ञानिक या तो अनभिज्ञ हैं, या बचते हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी को हम मात्र हिंदी का साहित्यकार बनाकर छोड़ देते हैं, परंतु उनका गोगा पीर के मेले का अदभुत नृतत्व शास्त्रीय अध्ययन हमारे सामाज विज्ञान एवं नृतत्व शास्त्र के विमर्श में कहीं जगह नहीं पाता। उत्तर प्रदेश के समाज के अध्ययन में प्रेमचंद के निबंधों से निःसृत अंतर्दृष्टि का हम कोई उपयोग नहीं कर पाते। वासुदेव शरण अग्रवाल हिंदी क्षेत्र के चिंतक हैं। गंवई समाज के अध्ययन की जो अंतर्दृष्टि उनके पास है, वैसी न तो किसी भारतीय समाजशास्त्री में हमने पाई है और न ही पश्चिमी समाज शास्त्रियों में। परंतु भारतीय गांव पर हुए अध्ययनों में समाज वैज्ञानिकों ने अभी तक वासुदेव शरण अग्रवाल को कोई जगह नहीं दी है।


भारतीय ज्ञान परंपरा की ओवररीडिंग अगर गलत है, तो उपनिवेशवाद द्वारा सृजित हीनभावना के कारण उसका ‘आलोचनात्मक मूल्यांकन’ न करना, उसका पूर्ण अस्वीकार शायद उससे भी ज्यादा गलत है। आधुनिकता भारतीय समाज में गहरे सर्वग्रासी संकट पैदा कर रही है, जिससे मुक्ति के लिए हमारा पारंपरिक ज्ञान हमारी मदद कर सकता है। पश्चिम प्रभावित आधुनिकता के बरक्स देशज आधुनिकता शायद भारतीय समाज के लिए ज्यादा मुफीद होगी। जरूरत है अपनी ज्ञान परंपरा में जो भी प्रासांगिक शक्ति तत्व है, उनका अवगाहन कर उन्हें हमारे सामाजिक विमर्शो का हिस्सा बनाना। ज्ञान के देशज एवं स्थानीय स्रोतों की तलाश भी हमारी एक बड़ी जरूरत है। अकादमिक संस्थानों, शोध केंद्रों एवं विश्वविद्यालयों में आज जरूरी है कि हम उपनिवेशवाद उत्पादित हीनता बोध से मुक्त हो अपने देशज बौद्धिक संस्रोत, अपने ज्ञान एवं स्थानीय ज्ञान परंपराओं को आज के विमर्श में महत्व दें।
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 - निदेशक, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

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