लंदन निर्वासन से पूर्व वह पाकिस्तान की जेल में भ्रष्टाचार व आय से अधिक संपत्ति के मामलों में, जो एवेंफील्ड व अल-अजीजिया जैसे निवेशों से संबंधित हैं, लंबी सजा काट रहे थे। वह तीसरी बार प्रधानमंत्री बने, लेकिन पनामा पेपरलीक्स मामले में 2017 में प्रधानमंत्री पद से हटाए गए। 10 साल तक कोई कोई भी सार्वजनिक पद धारण करने का उन पर प्रतिबंध लगा था।
बीमारी के इलाज के बहाने से वह लंदन गए, और फिर वहीं रह गए थे। अब जबकि वह स्वदेश लौट आए हैं, तो सबके जेहन में यही सवाल है कि उनके ऊपर चल रहे मुकदमों और उनकी सजाओं का क्या हुआ। एवेंफील्ड व अल-अजीजिया मामलों में उन्हें प्रोटेक्टिव जमानत मिल गई है। चलती हुई सजा में, जिसमें अपील की हर गुंजाइश खारिज हो चुकी हो, अचानक सभी मामलों में जमानत मिल जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। ऐसे चमत्कार पाकिस्तान में अक्सर होते रहते हैं। इमरान की तरह तोशाखाना के दुरुपयोग से संबंधित मामला नवाज शरीफ के ऊपर भी है, जिसमें जारी वारंट भी स्थगित हो गया है।
उनके पाकिस्तान वापस आने की राह हमवार करने की हैसियत पाकिस्तान आर्मी चीफ आसिफ मुनीर के अलावा किसी और के पास नहीं है। इसके अलावा पाकिस्तान के प्रधान न्यायाधीश उमर अदा बंदियाल, जो इमरान खाने के समर्थक थे और उन्हें गंभीर मामलों में भी जमानतें दे रहे थे, अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनकी जगह पर काजी फैज इशा प्रधान न्यायाधीश की कुर्सी पर विराजमान हैं, इसलिए नवाज शरीफ को गंभीर मामलों में भी राहतें मिल रही हैं। जाहिर है, न्यायपालिका व डीप स्टेट अर्थात पाक आर्मी चीफ ने हाथ मिला लिया है। पाकिस्तान की सेना के लिए वहां के चुनावों को अनंतकाल तक रोक पाना संभव नहीं है, लेकिन अतीत के अनुभव बताते हैं कि वह चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाती रही है। चुनावों के 'प्रबंधन' में सेना की निर्णायक भूमिका के कारण पाकिस्तान में लोकतंत्र मात्र एक औपचारिकता भर रह जाता है। कानून के शासन का हाल वहां ईशनिंदा कानून व हिंदू लड़कियों के नियमित अपहरण के रूप में दुनिया रोज देखती है। पाकिस्तानी सेना को स्टाफ कॉलेज के प्रशिक्षण में इस्लामी युद्धों के तौर-तरीके बताए जाते हैं। पाकिस्तान सेना बड़े पैमाने पर धर्मयुद्ध के लिए भी प्रशिक्षित हो रही है। न्यायिक विधि-व्यवस्थाओं को ध्वस्त करते हुए जिस तरह से नवाज शरीफ की पाकिस्तान वापसी संभव हुई है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि आसिफ मुनीर की भी उनसे अपेक्षाएं होंगी। नवाज शरीफ सत्ता में आए, तो यह उनकी चौथी पारी होगी।
इस नए गेमप्लान में पाकिस्तान की सेना नहीं चाहती कि कोई दल चुनाव में भारी बहुमत से जीते। पाकिस्तानी सेना ने आकलन किया होगा कि इमरान खान को नवाज शरीफ ही बराबर की टक्कर दे सकते हैं। इस तरह सेना नवाज शरीफ की ओर पलड़ा झुकाने में कामयाब हो सकती है। उन्हें यह एहसास भी हो जाएगा कि वह सेना की बदौलत सत्ता में लौटे हैं। समस्त मुकदमे और सजाएं तक स्थगित कर नवाज शरीफ की वापसी अकारण नहीं है। इस तरह सेना हमेशा की तरह किंगमेकर और कंट्रोलर की भूमिका भी निभाती रहेगी।
नवाज शरीफ मूलतः व्यवसायी मिजाज के नेता हैं। आर्थिक स्थितियों की उनकी समझ इमरान खान से कहीं बेहतर है। अब पाकिस्तान को समझ में आ रहा है कि एक बेहतर अर्थव्यवस्था के बगैर आगे काम चलने वाला नहीं है। नवाज के मुस्लिम देशों से अच्छे संबंध हैं। सेना को उम्मीद है कि नवाज शरीफ फिर से सत्ता में आ जाएंगे, तो फौजी अपेक्षाओं से कदम मिला कर चलेंगे। लेकिन सब कुछ इतना आसान हो, यह जरूरी नहीं है। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, बलूचिस्तान के लड़ाके और पाकिस्तान से दर-बदर हो रही 17 लाख की पख्तून आबादी पाकिस्तान को धराशायी करने के लिए पर्याप्त हैं।