क्रिकेट मैदान के दो छोरों के नामकरण के तीन उद्देश्य हैं- पहला यह कि इससे मैच देखने आने वाले लोग अलग-अलग छोरों में बने स्टैंड्स में आसानी से अपनी जगह ढूंढ लेते हैं। दूसरा, इससे उन लोगों के लिए कमेंटरी बहुत आकर्षक हो जाती है, जो मैदान पर खेल देखने नहीं आते। खासकर टेलीविजन के आने से पहले रेडियो कमेंटरी में दो अलग-अलग छोरों से होती गेंदबाजी का वर्णन श्रोताओं का आनंद बढ़ा देता था। और तीसरा, इससे खिलाड़ियों, खासकर कप्तानों को बहुत मदद मिलती है, जिन्हें स्थानीय परिस्थिति के बारे में ज्यादा जानकारी होती है। वे इस तथ्य का भी लाभ उठाते हैं कि किस छोर से चल रही हवा मैच के किस चरण में किस गेंदबाज के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। ऐसा भी नहीं है कि क्रिकेट स्टेडियम के दो छोरों के नाम पत्थर की लकीर की तरह अमिट ही हों। ये नाम बदले भी जा सकते हैं।
चेन्नई से 2,000 मील दूर बड़े होते हुए मैंने रेडियो कमेंटरी और अखबारों से जाना था कि चेपक स्टेडियम के एक छोर का नाम वालाजा रोड एंड है। यह नाम आकर्षण भी पैदा करता था और रहस्य भी। लेकिन कुछ साल पहले तमिलनाडु क्रिकेट एसोसिएशन ने वालाजा रोड एंड का नाम बदलकर एक पूर्व क्रिकेट प्रशासक वी पट्टाभिरमन के नाम पर करने का फैसला लिया। लेकिन चूंकि वालाजा रोड एंड नाम लोगों की स्मृति में बसा हुआ है, इसलिए इसका इस्तेमाल होता है। जब नरेंद्र मोदी स्टेडियम दर्शकों के लिए 2021 में खुला और उसी साल फरवरी में वहां पहला टेस्ट मैच हुआ, तो हमने पाया कि इसके दो छोरों का नामकरण अदाणी और अंबानी के नाम पर किया गया है। इस सच्चाई ने मुझमें हंसी, क्षोभ और असमर्थता के मिले-जुले भाव पैदा किए।
यह सच है कि अतीत में उद्यमियों ने स्टेडियमों के लिए धन दिए हैं, और छोरों के नाम उनके नाम पर किए गए हैं, जैसे कि वानखेड़े स्टेडियम में टाटा एंड और गरवारे एंड। लेकिन गुजरात में पहले सरदार वल्लभभाई पटेल स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी के नाम पर करना, फिर दोनों छोरों के नाम अदाणी और अंबानी के नाम पर करना आत्म जागरूकता के अभाव का ही नमूना है। हाल के वर्षों में इन दो भारतीय उद्यमियों ने जो विराट आर्थिक समृद्धि हासिल की है, उस पर सवाल भी उठे हैं। केंद्र सरकार के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियम ने तो इसे 'कलंकित पूंजीवाद का 2ए मॉडल' तक कह दिया।
न्यू अहमदाबाद स्टेडियम में हुआ पहला टेस्ट मैच टेलीविजन पर देखते हुए मैंने पाया कि दो छोरों पर स्कोरबोर्ड के ठीक ऊपर कंकरीट में इसके दो वित्तपोषकों के नाम बिल्कुल स्पष्ट हैं। उससे कुछ ही ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है-'नरेंद्र मोदी स्टेडियम।' इस तरह प्रधानमंत्री के साथ इन दो उद्यमियों के नाम सीधे-सीधे जुड़े हैं। यह इनकी सांकेतिक नजदीकी का सार्वजनिक प्रदर्शन भी है।
मैं टेस्ट क्रिकेट का प्रेमी हूं और आईपीएल नहीं देखता। इसलिए मैं यह नहीं कह सकता कि आईपीएल, 2022 के दौरान इन दो छोरों को किस नाम से पुकारा गया।लेकिन इसी साल मार्च में अहमदाबाद में जब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जब टेस्ट मैच खेला गया, तब मैंने पाया कि अदाणी एंड तो अपनी जगह बरकरार था, लेकिन दूसरे छोर का नाम बदलकर जियो एंड कर दिया गया था। यह एक तरफ एक व्यावसायिक वस्तु की आकर्षक रीब्रांडिंग थी, तो दूसरी तरफ उस परिवार से दूरी बरतने का संकेत भी था, जिसने इससे भारी कमाई की थी।
मैं आईपीएल नहीं देखता, लेकिन एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच देखता हूं। विश्व कप में भारत का शुरुआती मैच मैं नहीं देख पाया, लेकिन भारत-पाकिस्तान का मैच मैंने कुछ समय तक देखा। मैंने पाया कि अहमदाबाद स्टेडियम में अब किसी भी छोर का नाम नहीं है। उन्हें सफेदी से मिटा दिया गया है। हालांकि 'नरेंद्र मोदी स्टेडियम' नाम उसी तरह चमक रहा है। दोनों छोरों से नाम हटा देने पर मेरे जैसे क्रिकेट प्रेमी के मन में कुछ सवाल उठे हैं। अपना नाम शामिल कराने के लिए अदाणी और अंबानी ने कितने पैसे दिए थे? उनका नाम मिटाते हुए क्या इसकी क्षतिपूर्ति उन्हें दी गई? क्या इस बारे में उनसे संपर्क किया गया था? क्रिकेट, व्यापार और राजनीति के रिश्तों को अहमदाबाद के जिस स्टेडियम में पहले इतने साहसपूर्वक प्रदर्शित किया गया था, उसे अचानक मिटा देने का कारण क्या है?
नरेंद्र मोदी इस देश के सबसे गोपनीय प्रधानमंत्री हैं। उनके अतीत और वर्तमान तथा उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन के बारे में कोई विश्वसनीय सूचना नहीं है। जब विश्वसनीय सूचना नहीं होती, तब बौद्धिक अनुमान काम करता है। अनुमान यह है कि उद्यमियों से नजदीकी की चुनाव में महंगी राजनीतिक कीमत चुकाने की आशंका को देखते हुए अहमदाबाद के स्टेडियम से वे नाम हटाए गए हैं। मेरे एक क्रिकेट प्रेमी दोस्त का कहना है कि अहमदाबाद स्टेडियम के दो छोरों का नाम वीनू मांकड़ और रणजीतसिंह जी के नाम पर कर देना चाहिए, जो गुजराती मूल के बेहतरीन क्रिकेटर थे। दूसरे दोस्त का कहना था कि दो छोरों का नाम शायद आंबेडकर और सावरकर के नाम पर हो। पहला सुझाव तो सही है, लेकिन दूसरा सुझाव कुछ जंचा नहीं। हालांकि ये दोनों सुझाव भारतीय लोकतंत्र की एक विडंबना की अनदेखी करते हैं-वह है अपने नाम पर नामकरण करना।