केंद्र सरकार द्वारा बलूचिस्तान में मानवाधिकार उल्लंघन का मुद्दा उठाते ही भारत की शरणार्थी नीति के बारे में बातें होने लगीं। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने सूचित किया है कि बलूचिस्तान में धार्मिक अतिवाद बढ़ने के कारण पिछले एक दशक में दो लाख दस हजार से ज्यादा शिया, जिकरी और हिंदुओं को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है। हालांकि शरणार्थियों के अनुदान को भारत के शरणार्थियों के प्रति ट्रैक रिकॉर्ड से संतुलित किया जाना चाहिए।
16 अगस्त, 1947 को लॉर्ड लुईस माउंटबैटन ने सीमा आयोग के फैसले की घोषणा की थी। तब सघन वन से आच्छादित चटगांव पहाड़ी का इलाका जोकि पहाड़ियों एवं त्रिपुरा, मिजोरम तथा म्यांमार की सीमाओं से सटा था और जहां ज्यादातर बौद्ध आबादी रहती है, पाकिस्तान को दे दिया गया। तर्क यह दिया गया कि यह क्षेत्र भारत के लिए दुर्गम था और चटगांव को एक ग्रामीण पृष्ठभूमि प्रदान करेगा। 1962 में पाकिस्तानी सरकार ने कप्ताई बांध बनाकर चकमा जनजाति के लोगों को प्रताड़ित किया। नतीजतन करीब चालीस हजार चकमा जनजातियों ने, जिन्होंने बाढ़ के कारण अपने घर और खेत गंवाए तथा जिनकी जनसांख्यिकी में परिवर्तन का खतरा पैदा हो गया, भागकर भारत में शरण ली। वर्ष 1962 में भारत को पूर्वोत्तर सीमा पर एक युद्ध का सामना करना पड़ा, नतीजतन चकमा शरणार्थी परिवारों को फिर से अरुणाचल प्रदेश में बसाया गया। 1980 के दशक में पड़ोस के असम में स्थानीय लोगों की जनसांख्यिकी में परिवर्तन के भय के चलते प्रवासी विरोधी आंदोलन शुरू हो गया, जिसने शरणार्थियों के अपमान को बढ़ाया। शीघ्र ही उनके घर जलाए जाने लगे। वर्ष 1983 और 1995 में पपुमपारे जिले में 130 घर जलाए गए। 1991 से सरकार ने चकमा लोगों को खाद्य सब्सिडी देनी बंद कर दी। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के दबाव पर राज्य सरकार द्वारा चकमा लोगों के संरक्षण के बाद ही उनके उत्पीड़न में कमी आई। फिर भी उनका संघर्ष जारी रहा। सितंबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र एवं राज्य सरकार को निर्देश दिया कि चकमा शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करने की प्रक्रिया पूरी की जाए। उसके बाद ही बचे हुए सात हजार मूल चकमा एवं हजोंग शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिली। विभाजन के दौरान भारत को अपना देश चुनने के बावजूद चकमा शरणार्थियों की लगातार उपेक्षा होती रही है।
इसी तरह म्यांमार के अराकान प्रांत में रोहिंग्या नामक एक जातीय समूह है, जो विश्व में सर्वाधिक सताए समूहों में से एक है। भारत में तेरह हजार से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी यूनाइटेड नेशन्स हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (यूएनएचसीआर) द्वारा पंजीकृत हैं। उनमें से छह से सात सौ लोग दिल्ली के कालिंदी कुंज, जेजे कॉलोनी और शाहीन बाग में रहते हैं। बहुत से शरणार्थी हरियाणा के मेवात जिले के नगली कैंप में झुग्गियों में रहते हैं, जिन्हें बरसात के महीनों में व्यापक जल जमाव का सामना करना पड़ता है। स्वच्छ पानी और स्वच्छता तक उनकी पहुंच नहीं है, जबकि उनकी गलियों में कूड़ा बिखरा रहता है। निजी टैंकर प्रतिदिन 1,400 लीटर पीने के पानी की कीमत छह सौ रुपये वसूलते हैं। वहां पाइपलाइन वाला शौचालय नहीं है, इसलिए लोग खुले में शौच करते हैं। ज्यादातर पुरुष दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हैं, जबकि उचित कागजात के अभाव में उनके बच्चों का स्थानीय स्कूलों में दाखिला नहीं हो पाता। उनका टीकाकरण तदर्थ आधार पर ही हुआ है, इसलिए बच्चे कई बीमारियों से ग्रस्त हैं।
जिस देश ने बड़े पैमाने पर आबादी के स्थानांतरण के साथ आजादी हासिल की, उस भारत में शरणार्थियों के साथ रवैये में सुधार के लिए काफी कुछ करना होगा। भारत दो लाख से ज्यादा शरणार्थियों का घर है, जिनमें तिब्बत, बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और म्यांमार के नागरिक संघर्ष और युद्ध पीड़ित शामिल हैं। तिब्बत के कुछ शरणार्थी, जो 1959 से 1962 के बीच भारत आए, उन्हें 38 से अधिक बस्तियों में बसाया गया, उन्हें शैक्षिक सुविधाओं के उपयोग और पंजीकरण प्रमाणपत्र की सुविधा दी गई। मतदान के अधिकार को छोड़कर भारतीय नागरिकों को मिलने वाली हर सुविधा उन्हें मिली। सभी शरणार्थियों को दस्तावेज देना एक कठिन कार्य है। 1980 के दशक में अफगान गृह युद्ध के दौरान भागकर आए शरणार्थियों के, जो दिल्ली की झुग्गियों में रहते हैं, पास कोई भी कानूनी दस्तावेज नहीं हैं, इसलिए उन्हें भारत में काम करने या व्यवसाय करने की अनुमति नहीं है।
एक बार शरण देकर केंद्र सरकार शरणार्थियों को भूल जाती है। पूर्वी पाकिस्तान से 1947 में आए शरणार्थियों को मध्य भारत में दंडकारण्य में बसाया गया, जो जनजातीय बहुल जंगली इलाका है, और शरणार्थियों के लिए सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से बिल्कुल अलग है। मैदानी और अर्ध जलीय क्षेत्र में खेती करने वाले इन शरणार्थियों के लिए ऐसे बीहड़ इलाके में खेती करना मुश्किल था। जल्दी ही भूमि वितरण और शरणार्थियों को सहायता देने के मुद्दे पर जातीय संघर्ष छिड़ गया। दशकों तक गरीबी में जीवन बिताने के बाद शरणार्थी सुंदरबन के द्वीपीय इलाके में चले गए, जो उनके लिए ज्यादा परिचित इलाका था। राज्य सरकार ने उन्हें जबरन वहां से बेदखल कर दिया।
भारत ने अब तक 1951 की संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि और 1967 के उस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जो शरणार्थियों की रक्षा करने के लिए राष्ट्रों की कानूनी बाध्यता को परिभाषित करते हैं। असल में हमारे पास कोई राष्ट्रीय शरणार्थी नीति नहीं है। हमें डर है कि शरणार्थी कानून लागू करना पड़ोसी देशों के शरणार्थियों के लिए दरवाजा खोलने के समान होगा। भारत जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जीने वाले देशों का यह कर्तव्य है कि वह संकट में घिरे लोगों के लिए अपना दरवाजा खुला रखे। यह कर्तव्य हमारी परंपराओं से जुड़ा है। हमें एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जो हमें शरणार्थियों के प्रबंधन में ज्यादा पारदर्शी और जवाबदेह बनाए। बेशक हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा हित सर्वोपरि हैं, लेकिन अपने देश में शरणार्थियों की देखभाल हमारा नैतिक कर्तव्य है।