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कतराते राहुल और सामने आते मोदी

Thu, 11 Apr 2013 01:56 AM IST
अजय सेतिया
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लोकसभा चुनाव को अभी एक वर्ष बाकी पड़ा है। राजनीतिक गहमागहमी शुरू हो चुकी है। अस्वस्थ सोनिया गांधी ने पार्टी की जिम्मेदारी अपने बेटे राहुल गांधी को सौंप दी है।
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कांग्रेस का जयपुर चिंतन शिविर इसीलिए किया गया था। उस शिविर की चिंता यह कतई नहीं थी कि महंगाई पर कैसे काबू पाया जाए, न चिंतन का विषय था कि भ्रष्टाचार पर नकेल कैसे डाली जाए। तीन दिन चिंतन एक ही विषय पर था कि राहुल गांधी को पार्टी की कमान कैसे सौंपी जाए।

राहुल गांधी को सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते हुए पार्टी का उपाध्यक्ष उसी तरह बनाया गया, जैसे अटल बिहारी वाजपेयी जी के प्रधानमंत्री रहते लालकृष्ण आडवाणी को उपप्रधानमंत्री बनाया गया था। लक्ष्य आडवाणी को उत्तराधिकारी घोषित करने का था, क्योंकि वाजपेयी के करीबी जसवंत सिंह खुद को उत्तराधिकारी घोषित कर रहे थे।
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अब जब पी चिदंबरम खुद को मनमोहन सिंह का उत्तराधिकारी बता रहे हैं, तो उन्हें साफ कहा गया कि सत्ता के दो केंद्रों का वक्त अब समाप्त हो रहा है। जब राहुल गांधी को उपाध्यक्ष बनाने पर भी उत्तराधिकारी की सुगबुगाहट समाप्त नहीं हुई, तब दिग्विजय सिंह को बयान देना पड़ा।

कांग्रेस के भीतर की छटपटाहट को समझना बहुत जरूरी है कि क्यों दिग्विजय सिंह को बार-बार पी चिदंबरम के खिलाफ खड़ा होना पड़ता है, कि क्यों बार-बार जनार्दन द्विवेदी को दिग्विजय सिंह के खिलाफ उतारा जाता है, या यह रणनीति का हिस्सा होता है?

कांग्रेस के भीतर एक सत्ता संघर्ष चल रहा है। मनमोहन सिंह अचानक खुद को तीसरी बार का उम्मीदवार बताने लगते हैं। तो क्या यह भी चिदंबरम की महत्वाकांक्षा पर ब्रेक लगाना था। क्या चिदंबरम यूपीए सरकार के जसवंत सिंह बन गए हैं? जबकि ‘परिवार’ राहुल गांधी को उत्तराधिकारी बनाने की रणनीति बना चुका है?

कांग्रेस में ऐसी कोई संभावना नहीं है कि जैसे राजीव गांधी के खिलाफ प्रणब मुखर्जी खड़े हो गए थे, वैसे राहुल गांधी के खिलाफ चिदंबरम खड़े हो जाएंगे। मनमोहन सिंह के कहने का साफ मतलब है कि राहुल आए, तो स्वागत, चिदंबरम के लिए वह रास्ता नहीं खोलेंगे।

राजनाथ सिंह ने भाजपा की अंदरूनी लड़ाई पर सफलतापूर्वक नकेल डाली है, तो कांग्रेस में अंदरूनी उठा-पटक शुरू हो गई है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का चुनाव अभियान भी कई हिस्सों में बट गया था, जिसका नतीजा उसे चुनाव में भुगतना पड़ा।

लेकिन उन्हीं राजनाथ सिंह ने चार वर्ष बाद स्थिति बदल कर रख दी है। जिन नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड से निकाला गया था, उन्हें संसदीय बोर्ड में वापस लेकर नई शुरुआत की गई है। कांग्रेस ने राहुल गांधी को आगे लाकर भावी प्रधानमंत्री घोषित करने के संकेत दिए, तो राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को केंद्रीय राजनीति में लाकर साफ संकेत दिए हैं। दोनों पार्टियां संकेतों में आगे बढ़ रही हैं।

सारी बहस मुद्दों से हटकर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार पेश करने पर आ सिमटी है। मुद्दे और विचारधारा की लड़ाई तो पचमढ़ी में ही दफन हो गई। सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में खुद को प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने को तैयार हैं।

जयपुर में उनके हाथ में तीर-कमान थमाकर चिड़िया की आंख दिखा दी गई, लेकिन संसद के सेंट्रल हॉल में उन्होंने चिड़िया की आंख से नजर हटाने की बात कह दी। तब से कांग्रेस में उठा-पटक की बयानबाजी शुरू है। राहुल गांधी के नजदीकी लोग बताते हैं कि इस देश की जनता सत्ता उसे सौंपती है,जो इसका इच्छुक नहीं होता।

लाल बहादुर शास्त्री ने सपने में भी नहीं सोचा था। नरसिंह राव तो बोरिया-बिस्तर बांधकर हैदराबाद जाने की तैयारी कर रहे थे। देवगौड़ा और गुजराल ने भी प्रधानमंत्री बनने के बारे में नहीं सोचा था।

न वाजपेयी ने कभी खुद को पेश किया। उल्टे जो लोग प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हुए, वे मंजिल नहीं पा सके, जैसे नारायण दत्त तिवारी, लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, प्रणब मुखर्जी। राहुल गांधी इसलिए खुद को पेश करने से हिचक रहे हैं।

कांग्रेस चाहती है कि भाजपा नरेंद्र मोदी को पेश करे या मोदी खुद को पेश करें, जबकि कांग्रेस में चुनाव तक यथास्थिति बनी रहे। यानी कांग्रेस भाजपा को उकसा रही है और भाजपा कांग्रेस को।
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