लगता है जी कि जलकुकड़ों को कोई राहत नहीं है। अब देखिए न, कसाब को बिरयानी खिलाए जाने से जो लोग नाराज रहते थे, उन्हें उसकी फांसी के बाद भी कोई राहत नहीं।
वे अब इस बात पर नाराज हो सकते हैं कि निर्भया के आरोपियों में से एक ने अपने लिए पौष्टिक आहार की मांग की है, क्योंकि उसे एयर फोर्स में भर्ती होने के लिए प्रतियोगिता परीक्षा देनी है।
लोगों के कुढ़ने की एक वजह तो पहले से ही मौजूद थी कि जिसने निर्भया के साथ सबसे ज्यादा नृशंसता की, वह सजा से बच जाएगा। अब बलात्कारी पौष्टिक आहार की मांग कर रहे हैं। महिलाएं और बच्चे तो चाहे इस मुल्क में कुपोषण के शिकार रहें, पर अपराधियों को पौष्टिक आहार जरूर चाहिए।
बेचारे गरीब यह मांग नहीं कर सकते कि उन्हें पढ़ना है, इसलिए उन्हें पौष्टिक आहार चाहिए। वे तो रूखी-सूखी खाकर भी पढ़ सकते हैं। यह अपराधी बाहर होता, तो यह मांग न करता। किससे करता? पर अब वह यह कर रहा है। अपराधी है न।
इससे पहले उसने परीक्षा की तैयारियों के लिए एक ट्यूटर की मांग की थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया। बताइए, प्रतियोगिता परीक्षाओं में बैठनेवाले में कितनों को ट्यूटर मिलता है।
बाहर होता, तो शायद उसे भी नहीं मिलता। पर अब मिल रहा है। अपराधी है न। उसने तो अपने लिए अखबारों और किताबों की भी मांग कर दी है। उसने इग्नू के परीक्षा शिड्यूल की भी मांग कर दी। वहां भी उसे परीक्षा देनी है।
निर्भया के साथ बलात्कार के वक्त जो माहौल था, वह अब नहीं है। अब इंडिया गेट या रायसीना पर कोई भीड़ इकट्ठा नहीं हो रही। अब कोई फांसी देने की मांग नहीं कर रहा। अब वे डरे हुए नहीं हैं।
अब उनके वकील उनके मुकदमे लड़ रहे हैं। वे भी अपने मुवक्किलों के पक्ष में दलीलें देते हैं, उनका बचाव करते हैं, उनकी हत्या होने का डर दिखाते हैं। उनके लिए तारीखें मांगते हैं। सुविधाएं मांगते हैं।
अब वे डरते नहीं, मांग करते हैं। मुकदमा कहीं और चलाने की मांग करते हैं। जेल में कहीं और रखने की मांग करते हैं। ट्यूटर की मांग करते हैं। पौष्टिक आहार की मांग करते हैं। हम सब के जोश का वक्त बीत गया।
अब शायद उनके हंसने का वक्त आया हो। और अगर आप जलकुकड़े नहीं हैं, तो यह संतोष कर सकते हैं कि कसाब ने चाहे कितनी भी बिरयानी खाई हो, अंत तो उसका आया ही। हो सकता है, पौष्टिक आहार मांगनेवाले का भी आए।