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हिमस्खलन में जान गंवाते पर्वतारोही : हिमालय की संवेदनशीलता की अनदेखी अब नहीं की जा सकती

सुरेश भाई
Updated Wed, 12 Oct 2022 03:05 AM IST

सार

हिमस्खलन के लिए हिमालय के कई क्षेत्र संवेदनशील है, जिसमें लद्दाख क्षेत्र में कारगिल की पहाड़ियां, गुरेज घाटी, हिमाचल में चंबा घाटी, कुल्लू व किन्नौर घाटी के अलावा उत्तराखंड में चमोली और रुद्रप्रयाग के उच्च हिमालयी क्षेत्र  हैं।
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हिमालय - फोटो : Amar Ujala (File Photo)


असल में इस संस्थान के 58 प्रशिक्षक एवं प्रशिक्षणार्थी लगभग 5700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘द्रौपदी का डांडा-2’ पर्वत चोटी के बेस कैंप में 25 सितंबर को पहुंचे थे, जहां पर एडवांस और बेसिक कोर्स का प्रशिक्षण दिया जा रहा था। इसमें कई राज्यों के प्रशिक्षार्थी और प्रशिक्षक मौजूद थे। यह स्थान इतनी ऊंचाई पर है कि वहां हर क्षण मौसम करवट बदलता रहता है। तीव्र ढलान वाले पर्वतों से बर्फ गिरती रहती है। चारों ओर भयानक बर्फीला तूफान आता है, जिसके कारण उसके ऊपर से गुजरने वाले लोगों का जीवन कभी भी संकट में पड़ सकता है। 


बताया जाता है कि प्रशिक्षण के दौरान ऐसी बड़ी दुर्घटना पहले नहीं हुई थी। देश में उत्तरकाशी के अलावा गुलमर्ग, दार्जिलिंग, डोरांग, मनाली में भी ऐसे सरकारी पर्वतारोहण संस्थान है, जहां युवाओं को पर्वतारोहण से जुड़े आधुनिक तकनीक, उपकरण और इसके उपयोग के बारे में प्रशिक्षित किया जाता है। बदलती जलवायु के कारण हिमालय क्षेत्र के पर्यावरण पर लगातार बदलाव दिखाई दे रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगस्त-सितंबर में हुई भारी बारिश के कारण हिमस्खलन बढ़ा है। 


अनेक पर्वत चोटियों पर इस दौरान भारी हिमपात भी हुआ है। गौरतलब है कि हिमालय क्षेत्र भूकंप के कारण हर समय कांप रहा है, जिससे बर्फ के बीच में दरारें आ सकती हैं। सीधे और तीव्र ढलान वाले हिमाच्छादित पर्वतों की चोटियों को पार करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। देश में हिमस्खलन की पहले भी कई घटनाएं हुई हैं, जिनमें अनेक लोगों ने जान गंवाई है। 3 सितंबर, 1995 को हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियर टूटने से नदी में बाढ़ जैसी स्थिति आ गई थी, जिससे भारी नुकसान हुआ था। 


2 फरवरी, 2005 को फिर जम्मू-कश्मीर में ही 278 लोगों की मौत हुई थी। इसी तरह फरवरी, 2016 में सियाचिन क्षेत्र में हिमस्खलन से 10 सैनिकों की मौत की खबर आई थी। वर्ष 2019 में नंदा देवी आरोहण के दौरान भी सात पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी। वर्ष 2017 में नंदा देवी अभियान में आईटीबीपी के सात जवान लापता हुए थे। 2019 में भी मुनस्यारी से नंदा देवी ईस्ट आरोहण के लिए निकले विदेशी पर्वतारोहियों का एक दल हिमस्खलन की चपेट में आ गया था। 


17 फरवरी, 2021 को चमोली जिले के रैणी गांव के ऊपर ग्लेशियर टूटने से 206 लोग मारे गए थे। वर्ष 2013 में केदारनाथ आपदा को जानलेवा बनाने वाला चौराबाड़ी ग्लेशियर टूटा था, जहां से तीन बार हिमस्खलन हुआ है। चौराबाड़ी ग्लेशियर केदारनाथ मंदिर से सिर्फ छह-सात किलोमीटर दूर है। हिमालय में यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। अतः केदारनाथ क्षेत्र में इस दौरान तीन बार हिमस्खलन की घटना ने वैज्ञानिकों की चिंताएं बढ़ा दी है। देहरादून स्थित वाडिया भूगर्भ विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक इस पर अध्ययन कर रहे हैं।


हिमस्खलन के लिए हिमालय के कई क्षेत्र संवेदनशील है, जिसमें लद्दाख क्षेत्र में कारगिल की पहाड़ियां, गुरेज घाटी, हिमाचल में चंबा घाटी, कुल्लू व किन्नौर घाटी के अलावा उत्तराखंड में चमोली और रुद्रप्रयाग के उच्च हिमालयी क्षेत्र  हैं। हिमालय की संवेदनशीलता की अब अनदेखी नहीं की जा सकती। यहां आने वाले पर्वतारोहियों, पर्यटकों को जलवायु अनुकूल एक्शन प्लॉन बनाना होगा, जिसके आधार पर जोखिमपूर्ण स्थानों में जाने पर सावधानी बरतनी होगी। पर्वतारोहण संस्थान को भी प्रशिक्षण के लिए पर्वत श्रेणियों का चयन करते समय सावधानी बरतनी होगी, ताकि ऐसे हादसों का सामना न करना पड़े।

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