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रूढ़िवादी सोच में दबे पहाड़ के गांव : लड़कियों का पढ़ाई करना मुश्किल, खोखला साबित होता 'डिजिटल इंडिया' का नारा

आदर्श पाल
Updated Sat, 20 Aug 2022 09:08 AM IST

सार

पहाड़ी जिले बागेश्वर के गांवों में ज्यादातर लड़कियों का कहना था कि कोई भी काम लिंग के आधार पर बंटा नहीं होना चाहिए। आजादी के 75 साल बाद भी हमने अपने समाज के अंदर न जाने कितने ही खोखले विचारों एवं रूढ़िवादी परंपराओं को जगह दे रखी है, जिनकी वजह से असंख्य लड़कियों की सपने देखने की आजादी तक छिन गई है।
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पहाड़ की जिंदगी - फोटो : Twitter@ A. Bharat Bhushan Babu


ज्यादातर लड़कियों का कहना था कि कोई भी काम लिंग के आधार पर बंटा नहीं होना चाहिए। आजादी के 75 साल बाद भी हमने अपने समाज के अंदर न जाने कितने ही खोखले विचारों एवं रूढ़िवादी परंपराओं को जगह दे रखी है, जिनकी वजह से असंख्य लड़कियों की सपने देखने की आजादी तक छिन गई है। बघर भी कपकोट विकास खंड का एक गांव है, पर कनेक्टिविटी की समस्या से जूझता यह गांव अलग-थलग होकर रह गया है। गांव में न आंगनबाड़ी है,  न ही किसी तरह का नेटवर्क आता है। पहाड़ी पर बसे इस गांव तक पहुंचने के रास्ते इतने संकरे और जोखिम भरे हैं कि मुश्किल से सुविधाएं पहुंच पाती हैं। यहां की लड़कियां बताती हैं कि पास में सिर्फ एक ही स्कूल है और अगर उसमें पढाई नहीं करनी, तो पैदल दो घंटे से ज्यादा चलकर जाना पड़ता है। सातवीं में पढ़ने वाली कृष्णा रोज टैक्सी से कपकोट पढ़ने जाती है, जहां पहुंचने में दो घंटे से ज्यादा लगता है। खराब आर्थिक स्थिति और संकुचित सोच के कारण गांव की अधिकतर लड़कियां इतनी दूर पढ़ने नहीं जा सकतीं, अतः पास के स्कूल में पढाई करती हैं। इस गांव की सरिता के मुताबिक,  यहां की लड़कियों को बहुत सारे अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है। जैसे-माहवारी के दौरान पूरे एक हफ्ते लड़की को घर के बाहर रहना पड़ता है और उस दौरान उसे छुआछूत का भी सामना करना पड़ता है। यहां की लड़कियों से बात करते हुए पता चला कि उनकी समस्याएं दोहरी हैं।


एक तो उन्होंने ऐसी जगह जन्म लिया, जो सुविधाओं से बहुत दूर है, और दूसरी यह कि उन्होंने लड़की के रूप में जन्म लिया है। कोरोना के दौरान जब स्कूल और कॉलेज ऑनलाइन पढ़ाई का रुख करने लगे थे, तब इन गांवों के बच्चे अपनी पढाई से सिर्फ इसलिए दूर हो गए थे, क्योंकि इन सीमावर्ती गांवों में नेटवर्क नहीं आता। 'डिजिटल इंडिया' का नारा यहां खोखला हो जाता है। संविधान द्वारा दिए गए सारे नियम, अधिकार और कानून भी यहां खोखले हो जाते हैं, क्योंकि यहां की लड़कियों को दोयम दर्जे का नागरिक बनकर रहना पड़ रहा है। कनेक्टिविटी और अन्य मूलभूत समस्याओं से जूझ रहे इन गांवों में उन कारकों को ढूंढना, जो विकास में बाधा हैं, आपको अन्य सामाजिक समस्याओं की तरफ भी ले जाएंगी। किशोरी बालिकाओं का यह कहना, कि उनकी समस्याएं दोहरी हैं, इस बात की ओर इशारा हैं कि विकास की योजनाओं का क्रियान्वयन भी दोहरा है, जिस कारण समग्र विकास का नारा सिर्फ नारा बनकर रह गया है। इन गांवों की लड़कियों को उम्मीद है कि एक दिन उन्हें भी वे सारे अवसर मिलेंगे,  जिनसे उन्हें सदियों से वंचित रखा गया है। लेकिन कैसे? इसका जवाब हर उस समाज को ढूंढना होगा, जो स्वयं को सभ्य कहता है।

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