आज पूरी दुनिया के सामने हिंसक खेती के उत्पादों का परिणाम जैव विविधता का ह्रास, भयानक बीमारियां, शरीर की घटती प्रतिरोधक क्षमता, खून की कमी, उपजाऊ मिट्टी का क्षरण, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन आदि के रूप में सामने आ चुका है। जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक समस्या के कारण खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए आज समय की मांग है कि दुनिया में सभी जगह के लोगों को अपने भोजन की उपलब्धता एवं पौष्टिकता पर ध्यान देना होगा। यह काम मिलेट्स के माध्यम से हो सकता है और इससे भारत सही मायने में जी-20 के स्लोगन 'वसुधैव कुटुंबकम' को सार्थक अर्थ दे सकेगा। भारत ही नहीं, दुनिया के आधे से अधिक देशों के किसानों, जिन्होंने मिलेट्स का उत्पादन छोड़ दिया है, को फिर से इसके उत्पादन के जरिये समृद्धि का नया रास्ता मिल सकेगा। कारण, हिंसक खेती के माध्यम से जिन अनाजों का उत्पादन किया जाता है, उसके लिए किसानों को बहुत अधिक लागत लगानी पड़ती है, जिससे किसान मदद के लिए सरकार की तरफ देखता है या फिर कर्ज लेकर खेती करता है और फिर कर्ज न उतार पाने के कारण मौत के फंदे तक का रास्ता चुनता है।
गौर किया जा सकता है कि 70 और 80 के दशक में किसान आत्महत्या नहीं करता था, क्योंकि उस समय हमारे खाने की थाली में 20 प्रतिशत मिलेट्स हुआ करते थे, गेहूं और चावल का हिस्सा बहुत कम होता था। तब किसान बाजार से दूर, लेकिन आर्थिक समृद्धि के नजदीक था। मिलेट्स के गुणों को लेकर किसी वैज्ञानिक अध्ययन या सबूत की जरूरत नहीं है, क्योंकि मिलेट्स 3,000 ईसा पूर्व यानी इंडस सभ्यता के पहले से उपयोग में लाए जाने वाले अनाज हैं। दूसरा, आज की मौसम की अनिश्चितता को देखते हुए मिलेट्स की फसलें कठिन परिस्थितियों में भी तैयार हो जाती हैं एवं इनकी फसलें कम समय में (70 से 100 दिनों में) और कम पानी में भी पक जाती हैं, जबकि गेहूं और चावल की फसलों को अधिक दिनों (120-150 दिनों तक) जल की आवश्यकता होती है। इसके अलावा मिलेट्स की कम उर्वरक वाली मिट्टी में भी अच्छी पैदावार प्राप्त हो जाती है। इससे दुनिया के उन क्षेत्रों के किसान भी लाभान्वित हो सकेंगे, जहां कम उपजाऊ मिट्टी है। अतः मिलेट्स के गुणों को देखते हुए भारत सरकार का मिलेट्स की फसलों को प्रोत्साहन दिए जाने वाले कदम से छोटे और मध्यम किसान समृद्धि के रास्ते पर चल सकेंगे।
ध्यान रहे, दुनिया का 20 प्रतिशत मिलेट्स भारत के किसानों द्वारा पैदा किया जाता है। इसका मतलब साफ है कि भारत दुनिया के लोगों को खाने के माध्यम से 20 प्रतिशत प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, आयरन, कैल्शियम, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स एवं ग्लूटेन फ्री भोजन यानी 'सुपरफूड' दे सकता है। देश के किसानों की समृद्धि और लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार को यह बात सुनिश्चित करनी होगी कि गेहूं और चावल की तरह मिलेट्स के अधिक उत्पादन का दबाव हिंसक न हो जाए, अर्थात मिलेट्स का उत्पादन इनकी प्रकृति के अनुकूल ही हो, तभी इनके गुणों को बरकरार रखा जा सकता है, क्योंकि प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों द्वारा प्रकृति के गुणों को कायम रखने की क्षमता बहुत कठिन है।