इस साल कोरोना महामारी के कारण टैक्स रिटर्न भरने की अवधि दिसंबर तक बढ़ा दी गई, वर्ना तो टैक्स रिटर्न जुलाई तक भर देना पड़ता था। टैक्स भरने वाला मध्यवर्ग इस देश के लिए सोने की ऐसी मुर्गी है, जिसे नए-नए तरीकों से जिबह करने की तैयारी की जाती है। सारे डर उसी को दिखाए जाते हैं। हर कानून के पालन की जिम्मेदारी उसी के मत्थे मढ़ दी जाती है। सरकार की अधिकांश आर्थिक नीतियों का चाबुक सबसे पहले उसी की पीठ पर पड़ता है। देखने की बात है कि यह मध्यवर्ग खुद अपने संसाधनों से पढ़ता-लिखता है। माता-पिता को अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षण संस्थानों की ऊंची फीस भरने में न जाने कितनी हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। फिर ये बच्चे अपनी प्रतिभा के जरिये नौकरी पा जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार की शायद ही कोई मदद इन मध्यवर्गीय परिवारों को मिलती है। लेकिन जैसे ही ये नौकरी पाते हैं, सरकार किसी थानेदार की तरह टैक्स वसूलने आ जाती है। वक्त के साथ जैसे-जैसे आय बढ़ती है, टैक्स बढ़ता जाता है। लेकिन यदि इसी टैक्स देने वाले की नौकरी चली जाए, तो सरकार न तो इस करदाता के लिए किसी नौकरी का बंदोबस्त करती है, न ही इसे बेरोजगारी भत्ता या परिवार चलाने के लिए कोई अन्य सुविधा देती है।
जिस मध्यवर्ग के दिए कर से सरकार मतदाताओं को मुफ्त की रेवड़ियां बांटकर वोट बटोरती है, उसकी किसी तरह की मदद नहीं करती। यह मध्यवर्ग ही है, जिसके कारण रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल, कपड़ा, खान-पान, टूर ऐंड ट्रेवल, चिकित्सा, बैंक, मॉल्स, कहने का मतलब कि हर तरह की व्यावसायिक और आर्थिक गतिविधियां चलती हैं। मध्यवर्ग खर्च न करे, तो लगभग सभी उद्योग-धंधे चौपट हो जाएं। यह एक तरह से समाज की रीढ़ होता है। लेकिन किसी भी दल की सरकार हो, इस रीढ़ पर चोट करने से बाज नहीं आती। सरकारें ही नहीं, साहित्य में भी इस मध्यवर्ग को कायर कहकर अपमानित किया जाता रहा है। जबकि यही मध्यवर्ग समाज की दिशा बदलता है। यही है, जो विभिन्न दलों, सरकारों से लेकर तमाम उत्पादों की ब्रांडिंग करता है। इसी की स्वीकृति पाने के लिए सभी लालायित भी रहते हैं।
इसी मध्यवर्ग की बचत के कारण तमाम बैंक चलते हैं। इसी की बचत के पैसे से बैंक ऋण देते हैं और मुनाफा कमाते हैं, मगर हर दिन, हर महीने इसकी बचत पर ब्याज कम होता जाता है। आज तो फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज दर किसी जमाने के बचत खाते से भी कम हो गई है। जो मध्यवर्ग अधिकांशतः निजी क्षेत्र में काम करता है, जिसके पास सरकारी कर्मचारियों और गरीबों की तरह न कोई चिकित्सा सुविधा होती है, न किसी तरह की पेंशन ही, उसका एकमात्र सहारा उसकी बचत ही होती है। ऐसे में लगातार उसकी बचत पर ब्याज कम होता जाएगा, तो वह क्या
करेगा? संकट काल में कौन उसकी मदद करेगा? दिलचस्प यह है कि आपकी बचत पर आपको कर देना पड़ता है, लेकिन खर्च पर छूट मिलती है। यानी कि बचत के बजाय खर्च पर ज्यादा जोर है। खर्च हो, तभी आर्थिकी चलती है, उद्योग-धंधे का विकास होता है। लेकिन आदमी अपनी सारी बचत अगर खर्च कर दे, तो उसका जीवन कैसे चले!
लेकिन इस मध्यवर्ग की भलाई के लिए भी कोई नीति बनाई जाए, यह कोई नहीं सोचता। नीतियां या तो बहुत अमीरों के लिए बनती हैं, या गरीबों के लिए। यह मान लिया गया है कि मध्यवर्ग की न कोई परेशानी होती है, न जरूरतें, और न आवाज ही, इसलिए उसे भूले रहना ही बेहतर है। करदाता की इतनी उपेक्षा दुनिया के किसी देश में नहीं होती। अनेक देशों में करदाता को तरह-तरह की सुविधाएं दी जाती हैं। उन्हें देश की चालक शक्ति माना जाता है, ऐसे में अपने देश में ईमानदारी से कर देने का परिणाम आखिर सरकारों की उपेक्षा क्यों है? कुछ दिन पहले टैक्स से संबंधित काम करने वाले एक परिजन ने कहा कि इस देश के चार करोड़ करदाता बाकी के एक सौ छब्बीस करोड़ लोगों को ढो रहे हैं। उनकी गाड़ी खींच रहे हैं। टैक्स देने वाले को हर कोई लूट रहा है। मुश्किल यह है कि वह अपनी नौकरी और परिवार की गाड़ी खींचने में इतना व्यस्त है कि उसके पास किसी तरह के विरोध का समय भी नहीं है।