हालांकि गणित से मेरा लगाव कोई नया नहीं है। कई साल पहले जब मैं स्कूल में था, तभी मैंने गणित की गहराइयों में जाने का फैसला ले लिया था। आखिर मैं इस विषय को कैसे भूल सकता हूं? यही तो है, जिसकी मुहब्बत ने मुझे कलाओं से दूर करते हुए काफी क्रूर बना दिया था। मेरा मानना था कि अगर मैं गणित नहीं पढ़ूंगा तो इससे मेरी सोचने एवं समस्याओं के निदान ढूंढने और दुनिया को जटिल ढंग से देखने की क्षमता सीमित हो जाएगी। मैं यह भी सोचता था कि अगर मैं इस विषय को कुछ हद तक भी समझ लेता हूं तो मैं ज्यादा स्मार्ट हो सकूंगा। आश्चर्य है कि आज 70 साल की उम्र में भी गणित से अपना परिचय मुझे कम ही लगता है।
महसूस होता है कि मैं गणित की दुनिया में एक पर्यटक हूं। लेकिन मेरा अनुभव मुझे यह भरोसा दिलाता है कि भगवान खुद को गणित के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। हालांकि इस मामले में मेरा कोई निष्कर्ष नहीं है, लेकिन तमाम गणितज्ञ गणित और भगवान के बीच की कड़ी जरूर ढूंढते रहे हैं। यह कोई आज की बात नहीं है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व में पाइथागोरस के बाद से ही गणित में भगवान को ढूंढने के प्रयास जारी हैं। कई गणितज्ञ मानते हैं कि गणित की प्रमेयों में देवत्व की झलक होती है। मसलन, न्यूटन का मानना था कि गणित ईश्वर के दिमाग में आने वाले विचारों का एक प्रकार है।
कुछ साधारण से रहस्य हैं, जो यह समझाने में मदद करते हैं कि ऐसा क्यों हो सकता है? सबसे महत्वपूर्ण रहस्य इस सवाल में निहित है कि गणित का निर्माण किया गया या उसकी खोज की गई? कुछ गणितज्ञों का मानना है कि गणित मनुष्य द्वारा आविष्कार की गई एक प्रणाली है, जो विशिष्ट प्रकार की विचार-प्रक्रिया के प्रति मनुष्य के आकर्षण से आकार लेती है। लेकिन बहुमत का मानना है कि गणित मनुष्य की विचार प्रक्रिया से स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में है और गणितज्ञ जिन सवालों में पूरी जिंदगी लगाते हैं, वे एक स्वतंत्र और कालातीत दुनिया का गूगल मैप हैं। भौतिक दुनिया के समानांतर यह एक ऐसी दुनिया है, जहां कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है, सबकुछ बस ‘सच’ है। इस संबंध में कनाडाई गणितज्ञ रॉबर्ट लैंगलैंड्स का मानना है कि गणित पूर्ण नहीं है और इसकी प्रकृति को देखते हुए यह कभी हो भी नहीं पाएगी। गणित दरअसल अनंत को समझने की कोशिश करती है। यह भी संभव है कि गणित खुद ही अनंत हो।
प्राचीन काल से धर्मशास्त्री मानते रहे हैं कि अनंत होना भगवान का गुण है। यह भी माना जाता रहा है कि खुद सीमित होने की वजह से मनुष्य उस अनंत ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता। लेकिन उनके अनुसार मनुष्य को यह क्षमता दी गई है कि वह भगवान के स्वभाव को समझ सके। हालांकि धर्मशास्त्री हमेशा से ही भगवान पर एकाधिकार को लेकर थोड़े संवेदनशील रहे हैं। 1859 में लंदन में प्रकाशित ‘लीडर्स ऑफ द रिफॉर्मेशन’में जॉन टलच ने 1529 के एक सम्मेलन में एक विवाद पर थोड़ा चिढ़ते हुए मार्टिन लूथर के एक कथन को उद्धृत किया कि ‘मुझे आपके गणित से कोई लेना-देना नहीं।
भगवान गणित से ऊपर हैं।’19वीं शताब्दी के अंत में गणितज्ञ जॉर्ज कैंटर, जो सेट थ्योरी के जन्मदाता भी हैं, ने पाया कि अनंत का विचार भी स्थिर नहीं है। अनंत का विचार अंतरिक्ष की तरह है, जो निरंतर फैल रहा है। हर अनंत में हर पल कुछ जुड़ रहा है, जो उसे बड़ा अनंत बना रहा है। जाहिर है कि अनंतताएं भी असंख्य हैं और इन्हें एक-दूसरे से जोड़ा भी जा सकता है। लेकिन अनंत की इस यात्रा में कोई व्यक्ति उस बिंदु पर पहुंच सकता है, जिसमें सभी अनंतताएं समाहित हों। कैंटर ने उस बिंदु के बारे में एक मित्र को लिखा, ‘यह बिंदु पूर्ण है, जो मानवीय समझ से बाहर है। यह ‘एक्टस प्यूरीसिमस’ है। यही भगवान है।’
जब मैं छोटा बच्चा था, तब भगवान के बारे में इतना नहीं सोचता था, जितना महसूस करता था। खासकर जब मैं परिवार के साथ जंगल में होता था, तब मुझे हर वक्त एक साथ चलने वाली सत्ता की मौजूदगी महसूस होती थी। जो भी चीजें मैं देखता, उनके पीछे उनके सार को महसूस करता था। तब इस अहसास को मैं समझ नहीं पाता था, लेकिन अब समझता हूं। इस अनुभव का नाम ‘व्यापकता’ है, जिसके बारे में मैंने आज तक किसी के साथ बात नहीं की है। व्यापकता का यह विचार दरअसल सर्वेश्वरवाद का चचेरा भाई है, जो मानता है कि ईश्वर सबमें है।
हालांकि मेरे स्कूल में सिखाया गया था कि भगवान किसी एक विलक्षण मनुष्य में और एक पवित्र पुस्तक में वास करता है। मैं भगवान को जंगल के अपने अनुभव से जोड़ता हूं। मैं गणित का इस मायने में आभारी हूं कि इसने मेरा परिचय भगवान से कराया। गणित मेरे लिए वह अप्रत्याशित स्रोत रहा, जिससे मुझे यह महसूस करने का एक विनम्र कारण मिला कि जीवन में जितना मैं विश्वास कर सकता हूं, जिंदगी उससे कहीं ज्यादा है। मैंने कहीं पढ़ा भी है कि मनुष्य के इतिहास में गणित सबसे लंबे समय से चला आ रहा मानवीय विचार है। भगवान की तरह गणित की दुनिया भी विस्मयकारी है।
(अमर उजाला-न्यूयॉर्क टाइम्स से विशेष अनुबंध के तहत)