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व्यवहार में गांधी को ऐसे देखिए, तरुण विजय बता रहे हैं महात्मा को देखने का नया नजरिया

तरुण विजय Published by: तरुण विजय Updated Fri, 02 Oct 2020 02:02 AM IST
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महात्मा गांधी - फोटो : Pixabay

विडंबना यह रही कि गांधी को भारत विभाजन की त्रासदी और उसके परिणाम स्वरूप उद्वास्तु (शरणार्थी) हुए लाखों हिंदुओं की मर्मांतक पीड़ा से जोड़कर देखने के कारण अनेक भारतीयों के मन में गांधी बहुत नीचे चले गए और उनको लगा कि गांधी को अंग्रेजों तथा कांग्रेस के प्रचार तंत्र ने आवश्यकता से अधिक तूल दे दिया। आधारभूत सत्य यह है कि महापुरुषों, महान कार्य करने वाले व्यक्तियों की आपस में तुलना नहीं करनी चाहिए। हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य और विचार के अधीन कार्य करता है। एक से ध्येय के लिए अनेक व्यक्ति अनेक मार्गों से कार्य करते हुए उस ध्येय की प्राप्ति का मार्ग सुगम बना देते हैं। उन सबको अपनी दृष्टि और विचार की तुला पर तौलना उस व्यक्ति, ध्येय और समाज के प्रति अन्याय होता है।



इसलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सभी पहलुओं पर विचार करते हुए सुविचारित तौर पर गांधी को प्रातःस्मरणीय माना और अपने प्रातः स्मरण में गांधी को सम्मानजनक स्थान दिया। भारत में भारतीय विकास का ही प्रयोग सफल होगा और भारतीयता को जीवित रखेगा, यह मान्यता प्रचारित करते हुए ग्राम स्वराज्य की अवधारणा पर बल, और उसके व्यापक प्रयोग ने विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, बाबा आम्टे, ठक्कर बापा, नटवर ठक्कर, और तमिलनाडु, आंध्र, केरल, कर्नाटक जैसे अनेक प्रांतों में बड़ी संख्या में ऐसे सामाजिक-राजनीतिक नेताओं का अभ्युदय संभव किया, जो आज भी 'गांधीवादी' के अलंकरण से जाने जाते हैं।


सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता से भाग लिया, कांग्रेस के नेता के रूप में भी कार्य किया, गांधी के विचारों और कार्यों की अनुपालना की, गौसेवा और गौरक्षा के आंदोलन किए, और प्रखर राष्ट्रभक्ति के अधिष्ठान पर हिंदू जीवन मूल्यों के प्रति अविचल निष्ठा के साथ उनके संरक्षण और संवर्धन के लिए अहिंसक, लोकतांत्रिक, अनुशासित जनसंगठन तैयार किया, जिसने देश को दो प्रधानमंत्री दिए।


गांधी ने भारत को नवीन पहचान और सम्मानजनक स्वीकार्यता दी। आज जहां भी विश्व में हम जाते हैं, तो गांधी के देश से आए हुए कहकर हमारा परिचय होता है-यह वैसा ही है, जैसे कोई अमेरिका के बारे में अब्राहम लिंकन और थॉमस जेफरसन से परिचय करवाए या अफ्रीकी नागरिकों की पहचान को नेल्सन मंडेला से अभिव्यक्त करे। गांधी और उनके अनुयायी अपनी सहजता से पहचान में आ जाते थे। संघ के स्वयंसेवकों की भी एक विशिष्ट वेशभूषा, गणवेश और व्यवहार शैली है, जिससे वे सबसे अलग अपनी विशिष्टताओं से पहचान में आ जाते हैं। गौ, स्वदेशी, संयमित आरोग्य वर्धक जीवन शैली, राष्ट्रीय विषयों पर हिमालय समान दृढ़ता, शब्द संयम, भारत भक्ति के मूल अधिस्थान पर मैत्री और सहयोग का भाव, स्वदेशी मूल्यों पर आधारित शिक्षा का विश्व में सबसे बड़ा विद्या भारती उपक्रम, अस्पृश्यता के दंश से आक्रांत अनुसूचित जातियों के मध्य समरसता का अभियान, जनजातियों के मध्य राष्ट्रव्यापी अभिक्रम, जिसमें वनवासी सेवा में जुटे कार्यकर्ता ठक्कर बापा के ही प्रतिरूप हैं।


गांधी स्वराज और स्वदेशी के पक्षधर थे। स्वयंसेवक भी स्वदेशी और ग्रामीण भारत के सतरंगी भारतीय जीवन पक्ष के समर्थक और उन्नायक हैं। गांधी को गांधीवादियों के पाखंड से दूर रखकर देखने की जरूरत है। गांधी का सर्वाधिक मजाक उन लोगों ने उड़ाया, जो खुद को गांधीवादी कहते रहे, खादी के नीचे पॉलिस्टर का भ्रष्ट विचार पालते रहे। गांधी को आज के समय में समझना हो, तो संघ के स्वयंसेवक के साथ सेवा बस्तियों में जाइए। संघ प्रेरित गौशालाओं में गौ सेवा करिये, विद्या भारती के विद्यालयों में राष्ट्रभक्ति के उपक्रम देखिए। वनवासी कल्याण आश्रम के कार्यकर्ताओं के साथ नगालैंड, अरुणाचल, छत्तीसगढ़, राजस्थान के जनजाति क्षेत्रों में जनजातियों के उत्साह और विक्रम को सराहिए, तब गांधी समझ में आ जाएंगे। गांधी को एक व्यक्ति, एक राजनीतिक कार्यकर्ता या नेता अथवा कांग्रेस के चश्मे से देखना भूल होगी।

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