कर्नाटक विधानसभा में होने वाले फ्लोर टेस्ट में एच डी कुमारस्वामी की सरकार बच भी सकती है और नहीं भी बच सकती है। स्पीकर ने मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने का मौका दिया है। वह आगामी 18 जुलाई को सदन में बहुमत साबित करेंगे। सोमवार को सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं ने स्पीकर के साथ मुलाकात की थी, जिसके बाद स्पीकर ने यह फैसला लिया। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कांग्रेस-जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस), कांग्रेस के आलाकमान और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए कई सबक हैं।
गठबंधन धर्म के नियमों को सीखने में कभी देर नहीं होती, इन्हें कभी भी सीखा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस और जेडीएस नेतृत्व ने हरसंभव तरीके से 2018 के विधानसभा चुनाव का मजाक बना दिया। कर्नाटक में कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टी केरल से कुछ सीख क्यों नहीं ले सकी, जहां देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पिछले पांच दशकों से गठबंधन सरकार का हिस्सा रही है?
23 मई, 2019 को आए लोकसभा चुनाव के नतीजे में कांग्रेस के बदतर प्रदर्शन के बाद भी कुमारस्वामी, सिद्धारमैया और कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व दीवार पर लिखी इबारत पढ़ पाने और सुधारात्मक कदम उठाने में विफल रहे। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राहुल गांधी अपने इस्तीफे पर अडिग रहे और कांग्रेस के प्रबंधकों ने पार्टी में बिखराव को रोकने के लिए बंगलूरू या पणजी के राजनीतिक हालात पर बहुत कम दिया या बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।
कांग्रेस के लिए एकमात्र अच्छी बात यह रही कि डी के शिवकुमार और रमेश कुमार जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय नेताओं का उदय हुआ, जिन्होंने राजनीतिक कुशाग्रता के साथ तेजी से काम किया तथा कुमारस्वामी सरकार को बचाने की कोशिश की। स्पीकर रमेश कुमार ने इसमें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, चाहे राज्य के राज्यपाल हों या सुप्रीम कोर्ट के साथ संपर्क हो, वह चट्टान की तरह अडिग खड़े रहे।
बेशक रमेश कुमार मणिपुर के बोरोबाबू सिंह की सीमा तक नहीं गए, जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश न मानते हुए अपने लिए अदालती अवमानना की कार्यवाही आमंत्रित कर ली थी, लेकिन उन्होंने कांग्रेस और जेडीएस के उन विद्रोही विधायकों के सामने मुश्किलें जरूर खड़ी कर दी, जो कहां तो इस्तीफा देना चाह रहे थे, और कहां उन पर अयोग्य ठहराए जाने का खतरा मंडरा रहा था।