बीते 27 जून को लाहौर किले में महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा स्थापित की गई, जहां से उन्होंने पश्चिमोत्तर भारत के एक बड़े हिस्से पर शासन किया, इससे हो सकता है कि भारत और पाकिस्तान, दोनों के पंजाब प्रांत में खुशी की थोड़ी लहर चले। लेकिन पाकिस्तान में इस अभूतपूर्व घटना ने एक वास्तविक बहस छेड़ दी है। इस पर उठाए जा रहे कई सवालों में से एक सवाल यह है कि एक इस्लामी गणराज्य को क्यों एक ऐसे शासक की प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए, जो 18वीं शताब्दी के पंजाब की तीन मुख्यधाराओं-मुस्लिम, हिंदू और सिख में से एक का प्रतिनिधित्व करता था।
स्थानीय स्तर पर तैयार इस प्रतिमा का खर्च ब्रिटेन स्थित एक सिख संगठन ने वहन किया है। महाराजा की 180वीं पुण्यतिथि पर इसका अनावरण पाकिस्तान में किया गया, जो भारत के साथ करतारपुर सिख गुरुद्वारे तक एक गलियारा बनाने का काम कर रहा है, लेकिन भारत को व्यापाक द्विपक्षीय वार्ता की मेज पर लाने में अक्षम रहा है।