कथा यह है कि एक बार देवर्षि नारद, महर्षि वाल्मीकि से मिलने तमसा नदी पर स्थित उनके आश्रम में गए। तब वाल्मीकि ने नारद से प्रश्न किया कि संसार में इस समय ऐसा गुणवान्, धर्मज्ञ, सत्यवक्ता, सामर्थ्यशाली, प्रियदर्शन (सुंदर), कांतिमान् व्यक्ति कौन है, जिसके कोप से देवता भी डरते हैं? नारद ने वाल्मीकि को इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए दशरथ–पुत्र श्रीराम के विषय में बताया। इसके बाद देवर्षि लौट गए।
इधर, तमसा का स्वच्छ जल देखकर वाल्मीकि के मन में स्नान करने की इच्छा हुई। उनके शिष्य भरद्वाज भी उनके साथ थे। जिस समय ऋषि, नदी में स्नान करने की तैयारी कर रहे थे, विधाता की कलम, प्रथम ‘श्लोक‘ की उत्पत्ति की पटकथा लिख रही थी। तमसा के तट पर क्रौंच (सारस अथवा बगुला प्रजाति का पक्षी) का एक जोड़ा काम-क्रीड़ा में रत था। एक निषाद की दृष्टि उस पर पड़ी। उन्हें देखकर निषाद ने क्रौंच युगल पर निशाना साधकर बाण चला दिया। निषाद का बाण, नर क्रौंच की छाती के पार हो गया। उसे छटपटाता देखकर मादा क्रौंच विलाप करने लगी। कुछ ही क्षण बाद, नर क्रौंच के प्राण निकल गए।
क्रौंच-वध का यह प्रकरण वाल्मीकि की दृष्टि में अधर्म था। वाल्मीकि को इतना शोक हुआ कि उनके मुख से एक छंद निकल गया –
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी: काममोहितम् ।।
अर्थात - हे निषाद! तुझे कभी प्रतिष्ठा (सम्मान) न मिले क्योंकि तूने काम से मोहित इस क्रौंच के जोड़े में से एक की हत्या की है।
यह कहने के उपरांत महर्षि वाल्मीकि को एहसास हुआ कि उन्होंने वास्तव में शाप दिया है और अनजाने में उनसे एक नए छंद की रचना हो गई। उन्होंने अपने शिष्य भरद्वाज से कहा–‘मेरे मुख से जो छंद निकला है, वह शोक की अवस्था में उत्पन्न हुआ है, इसलिए इसे ‘श्लोक’ कहा जाएगा।'
बाद में छंद पर और विचार करने पर वाल्मीकि ने पाया कि वह छंद चार पाद में आबद्ध था और प्रत्येक पाद में आठ-आठ अक्षर थे। कुल मिलाकर, 32 अक्षर वाले इस छंद को लय में भी गाया जा सकता था। छंद की इस नवीन शैली को ‘अनुष्टुप‘ नाम मिला। इस तरह वाल्मीकि द्वारा ‘अनुष्टुप‘ शैली में संसार के प्रथम श्लोक की रचना हुई।
यहां प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वाल्मीकि द्वारा उच्चारित यह छंद यदि पहला श्लोक था, तो इससे पूर्व वैदिक-कालीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध छंद क्या कहलाते हैं? दरअसल वैदिक साहित्य के अधिकांश छंद ‘मंत्र’ या ‘ऋचा’ कहलाते हैं। मंत्रों के लिए यह भी कहा जाता है कि वे मानव-रचित नहीं होते, अपितु गहन ध्यान की अवस्था में मानस- पटल पर दैवीय प्रेरणा से स्वयं अवतरित होते हैं। यही बात संभवत: ऋचाओं पर भी लागू होती है। ऋचा शब्द ‘ऋक्’ से धातु से बना है जिसका अर्थ है स्तुति/प्रशंसा करना। वेदों की अधिकतर ऋचाओं में किसी न किसी देवी-देवता की स्तुति/प्रशंसा की गई है। वेदांग की छह में से एक शाखा छंद है। जानकारी के अनुसार, छंद-शास्त्र में 1,300 प्रकार के छंदों का उल्लेख मिलता है और इनकी रचना के नियम भी अलग हैं।
यह भी रोचक तथ्य है कि जहां सबसे पहले श्लोक का प्रयोग (अनजाने में) शाप देने के लिए हुआ, वहीं आज श्लोक (और मंत्रों आदि) का अधिकांश प्रयोग पूजा-अर्चना अन्य मांगलिक कार्यों की सिद्धि के लिए किया जाता है।
24,000 श्लोकों से युक्त रामायण ग्रंथ की रचना
महर्षि वाल्मीकि तमसा नदी में स्नान करके पुन: अपने आश्रम में लौट आए किंतु उनके मन से श्लोक का विचार नहीं गया। तभी सृष्टिकर्ता भगवान् ब्रह्मा ने उन्हें दर्शन दिए और बोले – ‘महर्षि, आपके मुख से यह छंद, मेरी ही प्रेरणा से निकला है। इसलिए अब आप इसी छंद का प्रयोग करके श्रीराम के संपूर्ण चरित्र का वर्णन कीजिए।’ इस तरह कालांतर में, वाल्मीकि द्वारा 24,000 श्लोकों से युक्त संपूर्ण ‘रामायण‘ ग्रंथ की रचना हुई।