वर्ष 1960 से 1970 तक का समय उनके कारण ही एक अर्थ में फ्रेंच नवजागरण का सिनेमा बना, जिसकी अनदेखी कोई नहीं कर सका। उस दौर में बनी उनकी फिल्मों ने दुनिया भर के हर स्तर के सिनेमा को प्रभावित किया। सत्यजित रे और मृणाल सेन के प्रायः हर साक्षात्कार में उनका उल्लेख मिलता है। बर्गमैन उनके इस वक्तव्य को बिल्कुल पसंद नहीं करते थे कि फिल्म में आरंभ और अंत को एक दूसरे से बदला जा सकता है। गोदार का एक वक्तव्य यह भी था कि सिर्फ एक स्त्री और एक शस्त्र के बूते पूरी फिल्म बनाई जा सकती है।
गोदार ऑन गोदार उनकी प्रसिद्ध पुस्तक है, जैसे ब्रेथलेस (1960) उनकी सर्वाधिक चर्चित फिल्म। मानवीय अविश्वास, खासकर स्त्री और पुरुष के प्रेम में अविश्वास उनकी प्रायः हर फिल्म के केंद्र में है। इसे फ्रांस या विश्व के उस सांस्कृतिक क्षरण के रूप में भी देखा जा सकता है, जिसके आधार में प्रेम और विश्वास रहा है, जिसकी परिणति या दुर्गति अविश्वास के संकट या प्रेम में प्रकट स्तब्धकारी आघात के रूप में हुई हो।
उनकी प्रतिनिधि फिल्म ब्रेथलेस में एक लंबा दृश्य है, जब स्त्री और पुरुष कैमरे की ओर पैदल बढ़ते चले आ रहे हैं, रास्ता है और वे रास्ता पार भी कर रहे हैं सिर्फ इस एक विमर्श के साथ कि क्या प्रेम अंत तक विश्वसनीय बना रह सकता है। इस विषय और इस दृश्य की सराहना ने गोदार को फिल्म की वैश्विक पृथ्वी पर अंत तक खड़े या टिके रहने का विश्वास सौंपा। हिंदी सिनेमा ने इस सराहना का सिर्फ शैली पक्ष लिया और हमने देखा कि जब जब फूल खिले में शशि कपूर कैमरे की ओर दौड़ते हुए गाना गा रहे हैं।
वर्ष 1949 में लिखे अपने उपन्यास 1984 में जॉर्ज ऑरवेल ने अविश्वास के लिए ऐसे दृश्य की कल्पना की, जो इतना भयावह और विश्वसनीय था कि लोगों ने विश्वास कर लिया कि 1984 में दुनिया का अंत हो जाएगा। उस दृश्य में यह था कि एक बहुमंजिली इमारत की छत पर अपने पिता को देख किलकारी भरता उसका नन्हा बेटा दौड़कर जाता है, पिता की बांहें छत की उस मुंडेर के पास हैं, जिसकी दूसरी ओर भयावह खाई है।
बच्चा पिता के सीने से लगने दौड़कर आता है और पिता वहां से हट जाता है। ऐेसे अविश्वास की कल्पना बच्चा नहीं कर सकता था, पर ऑरवेल ने इसे विश्वसनीय ढंग से इस संदेश के साथ रखा कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ऐसी दुनिया शेष रह जाएगी, जब ‘मनुष्य पर विश्वास’ का अंत हो जाएगा। विश्वास का अंत यानी विश्वास पर टिकी मनुष्य की दुनिया का अंत।
गोदार ने इस शोकार्त सच्चाई को प्रेम के रूप में रूपायित किया। पश्चिम में स्त्री-पुरुष प्रेम और इसकी अनिवार्य त्रासदी पर काफी विचार हुआ है। भारतीय काव्यशास्त्र प्रेम में संयोग की परिणति वियोग में ही देखता है। आज हम इसे ‘इन ए रिलेशनशिप’ और फिर ‘ब्रेकअप’ की भाषा में देख रहे होते हैं।
कुछ समय के प्रिय जीवन के बाद बिछोह की अप्रियता की अविराम मर्मांतक आंच तीन हजार साल साल की मनुष्य सभ्यता का दुःसह सच है, जिसकी छाया हमें महाकाव्यों तक में दिखती है। गोदार के बहाने हम इस समस्या को नए ढंग और प्रश्न के साथ देख सकते हैं। प्रश्न यह किया जाना चाहिए कि संबंधों में जिए गए प्रिय दिनों के मान और मूल्य उस स्थिति में कहां रह जाते हैं, जब संबंध में अलगाव हो गया हो!
क्या उन प्रिय दिनों को वास्तव में जिया ही नहीं गया! महाकाव्य रामायण में राम और सीता का परस्पर संबंध वाटिका में पहली बार के दर्शन से लेकर उस समय तक प्रत्यक्ष है, जब जंगल में सीता का मायावी हरण होता है। लंका विजय के पश्चात जब दोनों अयोध्या लौटते हैं और सीता को धोबी की एक उक्ति पर फिर वियोग की पीड़ा सहनी पड़ती है, तो प्रश्न वही उठता है कि तो फिर जिए हुए समय में दोनों ने क्या जिया, क्या जाना, जिसका मान और मूल्य अब नहीं रहा!
इस समस्या का समाधान इसी में दिख सकता है कि यदि हम प्रिय दिनों के संबंध का मान रखें, तो न सिर्फ संबंध और प्रेम शाश्वत हो सकता है, बल्कि एक और मानवीय मूल्य की प्रतिष्ठा पहली बार हो सकती है। मानवीय अविश्वास की इस व्यावहारिक समस्या को भारतीय अध्यात्म स्वप्न और माया की शब्दावलियों में व्यक्त कर चुका है, इसके अनस्तित्व के बाद इसके आगे की उत्तरमुखी राह दिखा चुका है।
इस दर्शन के अनुसार, मनुष्य के लिए दूसरा मनुष्य एक विचार भर है। उसकी ऐंद्रिक सत्ता यह दुनिया है, जो उसके मन के कारण अस्तित्व में वास्तविक प्रतीत होती है। जबकि मन स्वयं एक अनस्तित्व की छाया भर है। मन और संसार ही जब नहीं है, तो प्रेम और संबंध और संयोग और वियोग के अर्थ को दूसरा आकाश मिल जाता है। इस आकाश में प्रेम ही आकाश का सर्वत्र है।
प्रेम से ही आकाश की रचना है, जो मनुष्य का अरूप हृदय है। लेकिन कला में मनुष्य प्रेम के उस भाव को देखता है, जो रूप केंद्रित और मन के समस्त कोरों तक स्पर्शीय है। यहीं अप्रिय दुख का कोहरा भी बढ़ता और घेरता है। प्रिय क्षणों का मान और मूल्य ही इस गहरे मानवीय प्रेम संबंध को बचा सकता है। अपनी अंतिम फिल्म द इमेज बुक में गोदार यही समाधान प्रस्तावित करते हैं।