सम्मेलन में मौजूद हिंदू धर्माचार्यों और हिंदुत्ववादियों ने इन बयानों पर सख्त एतराज जताया। जैन धर्मगुरु लोकेश मुनि मंच से उतर आए। विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता ने कहा, 'यह सद्भावना सम्मेलन था या जमीयत की जहरीली जमात का जमावड़ा। यह इस देश में नहीं चलेगा।' हिंदू सेना और यूनाइटेड हिंदू नामक संगठन विरोध प्रदर्शनों पर उतर आए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने सर संघचालक मोहन भागवत को उद्धृत किया, 'इस देश के सभी लोगों का डीएनए एक है। हमारा राष्ट्र, पूर्वज और परंपराएं एक हैं। राष्ट्र सर्वोपरि है।'
अल्लाह और ओम को एक बताने पर हिंदुत्ववादियों ने आपत्ति की, तो बरेलवी मसलक ने भी इससे मिलती-जुलती बात कह डाली। भारत और पाकिस्तान के ज्यादातर मुसलमान जिस बरेलवी मसलक के अनुयायी बताए जाते हैं, उसी के दरगाह आला हजरत के मीडिया प्रभारी नासिर कुरेशी ने मुफ्ती मोहम्मद सलीम बरेलवी का वक्तव्य जारी किया, 'अल्लाह को सिर्फ उन्हीं नामों से पुकार सकते हैं, जिनका विवरण कुरान और हदीस में हो या इमामों ने उल्लेख किया हो। दारुल उलूम देवबंद के फतवा विभाग को कार्रवाई करनी चाहिए।'
बरेलवी मसलक के हस्तक्षेप की पृष्ठभूमि है। बरेलवियों और देवबंदियों में पुरानी लाग-डांट है। दोनों एक-दूसरे के खिलाफ कठोर भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं, यहां तक कि लंबे अरसे तक उन्होंने एक-दूसरे को सच्चा मुसलमान भी नहीं माना। बरेलवी मसलक पर सूफी मत का प्रभाव रहा है। वे दरगाहों में जाने को गलत नहीं मानते। देवबंदी इससे इत्तफाक नहीं रखते। हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर भी अतीत में दोनों संगठनों में बुनियादी मतभेद रहे हैं। अहमद रजा खान बरेलवी ने असहयोग आंदोलन में मुसलमानों की शिरकत के खिलाफ फतवा जारी किया था, लेकिन इधर कुछ अरसे से कड़वाहट दूर करने की कोशिशें होती रही हैं।
विवाद अरशद और महमूद, दोनों मौलानाओं की बातों पर इसलिए हुआ कि वे अपने सबसे मशहूर पुरखे मौलाना हुसेन अहमद मदनी (1879-1957) के हवाले से कथन ठीक से नहीं पेश कर पाए। सात साल तक अंग्रेजों की जेल में रहे मौलना ने ‘अल्लाह और ओम एक हैं, इस्लाम सबसे पुराना मजहब है’ जैसे पचड़ों में पड़ने के बजाय अपनी पुस्तिका मुत्तहिदा कौमियत और इस्लाम में राष्ट्र के भावी शासन की रूपरेखा प्रस्तुत की।
इतिहासकार बरबारा डी मेटकाफ (हुसेन अहमद मदनी : द जिहाद फार इस्लाम ऐंड इंडिया’ज फ्रीडम) लिखती हैं, 'विविधतापूर्ण धार्मिक पृष्ठभूमियों वाले समाज में उन्होंने सेक्युलर सरकार का इस्लामी औचित्य स्थापित किया।...उन्होंने इकबाल के इस मत का प्रतिवाद किया कि कौम और मिल्लत एक ही हैं। उन्होंने स्थापित किया, कि पैगंबर ने जिस कौम की बात कही, समान उद्देश्यों के लिए उसमें अल्लाह में यकीन रखने वालों और न रखने वालों, दोनों के लिए स्थान है और भारत में कौम के लिए वही एक मॉडल है।'
आदम के भारत में अवतरित होने के बारे में हुसेन अहमद मदनी ने भी लिखा था, मगर उस पर सरफुटौव्वल नहीं हुई। मेटकाफ के अनुसार, हुसेन अहमद मदनी ने तर्क दिया कि मुसलमानों के लिए मक्का के बाद पवित्रतम स्थान भारत है, क्योंकि श्रीलंका में ‘आदम की चोटी’ के नाम से मशहूर जगह पर ही आदम बहिश्त से निकाले जाने के बाद उतरे थे। उल्लेखनीय है कि मुसलमान इस्लामी परंपरा का नाता आदम से जोड़ते हैं और उनके व पैगंबर मोहम्मद के बीच हुए सभी पैगंबरों की भी अकीदे से इज्जत करते हैं।
महात्मा गांधी की नित्य प्रार्थना का अभिन्न भजन था, ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको संमति दे भगवान। इसके पीछे संकीर्ण धार्मिकता से दूर समस्त मानव जाति के कल्याण की पवित्र भावना थी। आज ईश्वर और अल्लाह को एक बताने पर झगड़ा पैदा हो जाता है, क्योंकि दिल साफ नहीं हैं। विभाजक दीवारें खड़ी करने के लिए अनेक मुद्दे हैं। हदीसों का कोई एक सर्वमान्य संकलन नहीं है। कुछ लोग दावा करते हैं कि हजरत मोहम्मद की कथनी और करनी से अलग कई हदीसें बाद में जोड़ी गईं। इमाम बुखारी के मान्य हदीस संकलन में ही आए कई जिक्रों पर सार्वजनिक चर्चा से बात बिगड़ सकती है। हजरत मोहम्मद के बाद विरासत के विषय पर हुए मतभेद कभी दूर नहीं होने वाले। इस्लामी दुनिया में सर्वग्राही और विखंडनकारी, दोनों तरह की व्याख्याएं मौजूद हैं।
हिंदू समाज में भी अनगिनत दरारें हैं। वर्णाश्रम व्यवस्था उचित है या अनुचित, जाति कब पैदा हुई? पवित्र-अपवित्र की अवधारणा के चलते संपूर्ण भारत के हिंदू कितना भाई-भाई हैं? हाल में जाति के मूल पर हुई बहस में एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई। मृतक और कथित हत्यारे का संबंध एक ही वैचारिक परिवार से बताया जाता है।
गांधीजी और बाबा साहब आंबेडकर के महती प्रयासों के बावजूद आज भी मंदिर में प्रवेश पर अनुसूचित जाति वाले हिंसा का शिकार हो जाते हैं। आस्थाओं का कोई गणितीय फार्मूला नहीं हुआ करता। धार्मिक विश्वासों के कृत्रिम सम्मेलन पर वक्त नहीं बर्बाद किया जाना चाहिए। मानव जाति का इतिहास साक्षी है कि यह नामुमकिन बना रहेगा। अल्लाह और ओम की अवधारणाएं नितांत भिन्न हैं। सहमति इस कथन पर भी नहीं हो सकती कि हिंदू-मुसलमान के पूर्वज एक हैं या उनका डीएनए एक है। कानून और संविधान से परे हो जाने पर ही ये आख्यान उत्पन्न होते हैं। राष्ट्र, राष्ट्रीय चिंतन और नागरिक समस्याओं के समाधान का पथ तो संविधान प्रशस्त करता है।