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मातृभाषा दिवस: सहयोगी भाषाएं हिंदी की चुनौती नहीं, नया संकल्प लेने की जरूरत

उमेश चतुर्वेदी
Updated Tue, 21 Feb 2023 05:41 AM IST

सार

जिस तरह छोटी नदियां अपने प्रवाह वाले क्षेत्र में अपना अस्तित्व बनाए रखते हुए गंगा में समाहित हो जाती हैं, छोटी भाषाओं का हिंदी से वैसा ही रिश्ता है।
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सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : Istock


हिंदी के प्रभाव क्षेत्र वाली छोटी भाषाएं और उनके बहाने होने वाली हिंदी की अंदरूनी राजनीति उसकी बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों और अकादमिक भाषा में जिन्हें हम बोलियां कहते हैं, हिंदी क्षेत्र की इन छोटी भाषाओं को हिंदी की सबसे बड़ी दुश्मन के रूप में इन दिनों देखा-समझा जाने लगा है। इसकी वजह बनी है, संविधान की आठवीं अनुसूची में इन छोटी भाषाओं को शामिल करने की मांग। इनमें प्रमुख रूप से भोजपुरी और राजस्थानी के लिए उठ रही मांग है। हिंदी के कतिपय गहन समर्थकों को लगता है कि अगर राजस्थानी और भोजपुरी जैसी बोलियों या छोटी भाषाओं को सांविधानिक मान्यता मिल गई, तो वे हिंदी से छिटकर दूर निकल जाएंगी, जिससे हिंदी का दायरा संकुचित हो जाएगा।


अवधी, ब्रज, बघेली आदि हिंदी क्षेत्र की छोटी भाषाओं को भी अपने अलग सांविधानिक अस्तित्व के लिए संघर्ष की प्रेरणा मिलेगी। ऐसे में देर-सवेर हिंदी का दायरा और संकुचित हो जाएगा और हिंदी छिन्न-भिन्न हो जाएगी। हिंदी की इस समस्या पर चर्चा से पहले हमें यह समझ लेना चाहिए कि हिंदी उस तरह की सघन और सुगठित भाषा नहीं है, जैसी बांग्ला, तमिल या उनकी जैसी दूसरी भाषाएं हैं। भाषा विज्ञानी भी मानते हैं कि हिंदी एक तरह से छोटी भाषाओं की उभय भाषा है। जो सबसे कुछ न कुछ लेती है और अपने दायरे वाली छोटी भाषाओं के बीच गहन एवं सुगठित सेतु है। इन अर्थों में हम हिंदी को छोटी भाषाओं का समुच्चय कह सकते हैं।


हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा की इस परिकल्पना के मुताबिक हिंदी को अपने गहन प्रभाव क्षेत्र से इतर यानी बांग्ला, तमिल, तेलुगू, मलयालम, उड़िया, असमी, पंजाबी आदि के बीच संपर्क और समुच्चय की भूमिका निभानी थी। हिंदी के गहन अध्येता और समालोचक डॉक्टर राम बिलास शर्मा, इसे ही हिंदी जाति कहा करते हैं। हिंदी जाति, यानी बृहत्तर भारत की मानव नस्ल। गांधी जी के रचनात्मक शिष्य विनोबा भावे ने देश की सभी भाषाओं के लिए एक ही लिपि देवनागरी का सुझाव दिया था। देश का एक बड़ा हिस्सा इससे सहमत भी था। लेकिन कतिपय क्षेत्रीय राजनीति इस सोच की राह में आड़े आ गई।


जब उदारीकरण के जरिये बाजार एक-एक उपभोक्ता तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करने लगा, तब सबसे तेजी से जिस भाषा की जरूरत महसूस हुई, वह हिंदी ही थी। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं रहा कि इस भाषायी विकास में क्षेत्रीय या छोटी भाषाएं पिछड़ गईं।


पिछली सदी के साठ और सत्तर के दशक में गांधीवादी पत्रकार बनारसी दास चतुर्वेदी ने हिंदी के जनपद की परिकल्पना दी थी। उन्होंने जनपदीय आंदोलन चलाया था। यह जनपदीय आंदोलन क्या था? हिंदी के बरक्स उसकी सहयोगी या छोटी भाषाओं का समानांतर विकास करना और उनकी पहचान को बचाए रखना था। छोटी नदियां खुद को गंगा में विलीन करके जिस तरह गंगा की धार को तेज और गहन कर देती हैं, छोटी भाषाएं भी एक निश्चित बिंदु पर खुद को हिंदी में समाहित करके हिंदी को समृद्ध ही नहीं करतीं, अपने शब्दों, अपने भावों के जरिये हिंदी में भी अपना सूक्ष्म अस्तित्व बरकरार रखती हैं। इसका यह मतलब नहीं कि ये नदियां अपने प्रवाह वाले इलाकों में खत्म हो जाती हैं, बल्कि जिंदा रहती हैं। हिंदी और उसकी सहयोगी भाषाओं की समृद्धि का आपसी रिश्ता है। डिजिटलीकरण ने भी इसे स्थापित किया है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर हिंदी को अपनी इस चुनौती को इसी अंदाज में देखना और परखना चाहिए।

 
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