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जानना जरूरी है: क्यों निषिद्ध है मदिरा? देवासुर संग्राम और शुक्राचार्य से जुड़ी है कथा...

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 13 Oct 2024 06:53 AM IST

सार

शुक्राचार्य जीवित तो हो गए, किंतु उन्हें स्वयं पर बड़ा क्रोध आया कि मदिरा के सेवन से उनका विवेक नष्ट हो गया था और उसी स्थिति में वह ब्राह्मण-कुमार कच को पी गए।
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क्यों निषिद्ध है मदिरा? - फोटो : अमर उजाला


शुक्राचार्य ने कच को शिष्य बना लिया। इस बीच शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को कच से प्रेम हो गया। असुरों को पता चला कि कच संजीवनी विद्या सीखने आया है। एक दिन कच गायें चराने गया था, तो असुरों ने उसे मार डाला और उसके टुकड़े करके भेड़ियों को खिला दिया। गायें जब बिना कच के वापस लौट आईं, तो देवयानी परेशान हुई। उसने शुक्राचार्य से कहा, 'किसी ने अवश्य ही कच को मार डाला है।’ शुक्राचार्य बोले, 'तू घबराती क्यों है? मैं अभी कच को जिला देता हूं।' शुक्राचार्य ने संजीवनी विद्या का प्रयोग करके कच को पुकारा, 'आओ पुत्र!' इतना कहते ही कच का एक-एक अंग भेड़ियों के शरीर छेदकर बाहर निकल आया और कच फिर से जीवित हो गया। अगली बार असुरों ने कच को काटकर पहले जलाया और फिर उसके शरीर की राख को वारुणी में मिलाकर शुक्राचार्य को पिला दिया। इस बार कच फिर नहीं लौटा, तो देवयानी ने पिता से कहा, 'कच फूल लेने गया था, लेकिन लौटा नहीं है।'


शुक्राचार्य ने देवयानी के हठ करने पर फिर से संजीवनी विद्या का प्रयोग किया और कच को बुलाया। इस बार कच ने शुक्राचार्य के पेट के भीतर से अपनी स्थिति बताई। शुक्राचार्य बोले, ‘मैं तुम्हें संजीवनी विद्या सिखा देता हूं। तुम मेरा पेट फाड़कर निकल आना। तुम जीवित हो जाओगे और मेरी मृत्यु हो जाएगी। इसके बाद तुम इसी विद्या से मुझे जीवित कर देना।' कच ने यही किया। वह शुक्राचार्य का पेट फाड़कर जीवित निकल आया और फिर उसने संजीवनी विद्या की सहायता से शुक्राचार्य को जीवित कर दिया।


शुक्राचार्य जीवित तो हो गए, किंतुु उन्हें स्वयं पर बड़ा क्रोध आया कि मदिरा के सेवन से उनका विवेक नष्ट हो गया था और उसी स्थिति में वह ब्राह्मण कुमार कच को पी गए।


तब शुक्राचार्य ने घोषणा की कि 'आज से यदि कोई ब्राह्मण मदिरा का सेवन करेगा, तो उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा और उसे ब्रह्म हत्या का पाप लगेगा। मैंने ब्राह्मणों के लिए यह धर्म-मर्यादा सुनिश्चित कर दी है।'


संजीवनी विद्या प्राप्त करने के कुछ समय बाद कच ने शुक्राचार्य से स्वर्ग लौटने की अनुमति ली और जब जाने लगा, तो देवयानी ने कहा, 'प्रिय कच! तुम सदाचार, विद्या और तपस्या के आदर्श हो। मैं तुमसे प्रेम करती हूं। तुम विधिवत मुझसे विवाह कर लो।' यह सुनकर कच ने कहा, 'मैं शुक्राचार्य के पेट से उत्पन्न हुआ हूं। धर्म के अनुसार, तुम मेरी बहन हो। इसलिए मुझे लौटने की अनुमति दो।' देवयानी को बुरा लगा। वह बोली, 'मैंने तुमसे प्रेम की भिक्षा मांगी है। यदि तुम धर्म और काम की सिद्धि के लिए मुझे अस्वीकार करोगे, तो मैं तुम्हें शाप दे दूंगी।'


कच बोला, 'बहन! मैंने तुम्हें गुरु-पुत्री मानकर अस्वीकार किया है, कोई दोष देखकर नहीं। गुरुदेव ने भी मुझे इसके लिए कोई आज्ञा नहीं दी थी। फिर भी यदि तुम चाहो, तो मुझे शाप दे सकती हो।’
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देवयानी ने कहा, ‘तुमने मुझे दुख पहुंचाया है और तुमने यह विद्या स्वार्थ के लिए प्राप्त की है। इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूं कि यह संजीवनी विद्या कभी तुम्हारे काम नहीं आएगी।’ यह सुनकर कच को भी क्रोध आ गया। वह बोला, ‘मैंने तुमसे धर्म की बात कही थी। तुमने मुझे काम के वश होकर शाप दिया है, इसलिए मैं भी तुम्हें शाप देता हूं कि कोई ब्राह्मण कुमार तुमसे विवाह नहीं करेगा। जहां तक मेरी विद्या का प्रश्न है, तो वह सिद्ध नहीं होगी, किंतु मैं यह विद्या जिसे सिखाऊंगा, उसकी विद्या अवश्य सफल होगी।' ऐसा कहकर कच स्वर्ग लौट गया।

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