बिलावल की मां के प्रधानमंत्री बनने का मतलब पीढ़ीगत बदलाव तो था, लेकिन भारत के प्रति नजरिये में बदलाव संभव नहीं था। सत्ता में रहते हुए बेनजीर भारत के खिलाफ, खासकर कश्मीर पर तीखा हमला करती थीं, जबकि सत्ता से बाहर होने पर भारतीयों से मिलने के दौरान केवल पछतावा करती थीं। खुद बिलावल ने दिसंबर, 2022 में संयुक्त राष्ट्र में प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपममानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। मोदी के खिलाफ निंदा ने व्यक्तिगत रूप से उनकी अपरिपक्वता तो दर्शाई ही थी, उससे दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्ता फिर से शुरू करने की संभावना भी धूमिल हो गई थी। ऐसे में हैरानी नहीं कि उन्होंने गोवा दौरे का इस्तेमाल भारत के घरेलू मामले पर कुछ और टिप्पणियां करने के लिए किया।
एससीओ की बैठक में भारत या पाकिस्तान, कोई भी द्विपक्षीय वार्ता के लिए तैयार नहीं था। भारत ने प्रोटोकॉल में बदलाव कर सभी आगंतुकों के साथ हाथ मिलाने तक से परहेज कर इसे जता दिया। भारतीय मेजबान एस जयशंकर ने बिलावल को औपचारिक रूप से बस मुस्कराते हुए नमस्ते किया। जयशंकर ने अपने भाषण में भारत की 'पड़ोस पहले' की नीति का जिक्र करते हुए सीमापार आतंकवाद पर चिंता जताते हुए कहा, 'निश्चित रूप से इसका अपवाद पाकिस्तान है, जो सीमापार आतंकवाद का समर्थन करता है।' यह निश्चित मानकर, कि भारत परोक्ष रूप से लेकिन स्पष्टतः आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को घेरेगा, पहले से ही तैयार बिलावल ने कहा कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद से पीड़ित है, यह आतंकवाद का समर्थन नहीं करता, इसलिए स्टेट और नॉन-स्टेट ऐक्टर्स के बीच फर्क किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने आतंकवाद और मनी लॉन्ड्रिंग से इन्कार करने की एफएटीएफ की आवश्यकताओं का अनुपालन किया है। भारत पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि आतंकवाद को 'कूटनीति में हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।'
सच्चाई यह है कि सिर्फ भारत ने नहीं, बल्कि पूरी दुनिया ने भारत (अफगानिस्तान और ईरान में भी) में काम कर रहे नॉन-स्टेट ऐक्टर्स के तर्क को खारिज कर दिया है। पर पाकिस्तान इस पर डटा हुआ है। बिलावल ने भारतीय मीडिया से कहा कि उनकी मां आतंकवाद की पीड़ित थीं। वह सही थे कि उनकी मां की हत्या आतंकवाद के कारण हुई, पर उसी सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि भारत पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का शिकार है। बिलावल ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के मुद्दे से निपटने के लिए सामूहिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को भारत और पाकिस्तान को बांटने के बजाय एकजुट होना चाहिए और भू-राजनीति से वैश्विक आतंकवाद को अलग रखने की सख्त जरूरत है।
ऐसे में किसी मेल-मिलाप की संभावना क्षीण है। गोवा सम्मेलन के अगले दिन बिलावल और चीनी विदेश मंत्री ने इस्लामाबाद में मुलाकात की और कश्मीर मुद्दे पर भारत पर हमला बोला। भारत विरोध के चलते पाकिस्तान ने चीन को हिंद महासागर तक पहुंचने की अनुमति दी। आर्थिक मामलों में यह तेजी से चीन की जागीर बनने वाला है। वह इस क्षेत्र में चीन का पिछलग्गू बन रहा है और सिर्फ इसलिए कि चीन भारत का विरोधी है। अपनी विरासत बरकरार रखने के अलावा बिलावल के पास कोई चारा नहीं है। उनका परिवार और उनके प्रतिद्वंद्वी (जो अब सहयोगी है) नवाज शरीफ का सेना के साथ चुपचाप मिलकर काम करने का इतिहास रहा है। हालांकि सेना के पाला बदलने पर उनके हारने में भी देर नहीं लगती। कुछ महीने पहले इमरान से मोहभंग होने के बाद माना जा रहा था कि सेना बिलावल को प्रधानमंत्री बनाएगी।
अब बिलावल और शरीफ सत्ता में हैं, पर इमरान ने उनकी रातों की नींद खराब कर दी है। खान के अलावा पाकिस्तान सरकार सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति आरिफ अल्वी से लड़ रही है, ताकि जुलाई-अगस्त में होने वाले चुनाव को स्थगित किया जाए। लेकिन चुनाव को अनिश्चित काल के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता। विभिन्न संस्थानों के बीच चल रही मौजूदा लड़ाई खत्म करनी होगी और चुनाव करवाना होगा।
भारत में भी अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। यह भविष्यवाणी करने के लिए विशेषज्ञ होने की जरूरत नहीं है कि दोनों ही पक्ष बयानबाजी से परे इन चुनावों के खत्म होने तक संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश नहीं करेंगे, भले ही चुनावों से कुछ न बदले। ऐसा इसलिए कि दोनों ही देशों में एक दूसरे का मुद्दा चुनावों को प्रभावित करता है, लेकिन द्विपक्षीय रिश्तों को प्रभावित नहीं करता। गोवा सम्मेलन इसका ताजा उदाहरण है। पाकिस्तान कश्मीर में समस्या पैदा करना छोड़ देगा, यह भरोसा नहीं किया जा सकता। गोवा में जिस तरह की घटना हुई, भारत और पाकिस्तान आगे भी लड़ने के लिए तैयार दिख रहे हैं। चूंकि भारत आंशिक रूप से कश्मीर में जी-20 की मेजबानी करने वाला है, इसलिए कूटनीतिक लड़ाई होगी। बिलावल ने पहले ही घोषणा कर दी है कि ऐसा जवाब दिया जाएगा, जो याद रखा जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि शिखर सम्मेलन में सभी देश उपस्थित नहीं रहेंगे। अब यह देखना होगा कि किस तरह चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत से मुकाबला करते हैं और भारत पर दबाव बनाने के लिए दूसरे देशों को अपने साथ शामिल करते हैं।