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सियासत: विपक्ष की मुश्किलों का अंत नहीं, गठबंधन को सहेजने में कांग्रेस नेतृत्व की भूमिका अहम

रशीद किदवई
Updated Wed, 03 Jan 2024 07:09 AM IST

सार

आजाद भारत के इतिहास में पहली बार कांग्रेस 272 से भी कम लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है। लेकिन इंडिया गठबंधन बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि वास्तविकता से बेखबर कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व सीटों के बंटवारे के कड़वे फॉर्मूले को स्वीकारे। अन्यथा, नाजुक गठबंधन का अराजक होना तय है।
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Mallikarjun Kharge - फोटो : Social Media

स्वतंत्र भारत में यह पहली बार होगा, जब 2024 में 18वीं लोकसभा के लिए ‘ग्रांड ओल्ड कांग्रेस’ पार्टी 272 से कम लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में, अगर सैद्धांतिक तौर पर एकबारगी यह मान भी लिया जाए कि अप्रैल-मई, 2024 में कांग्रेस जिन लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है, उन सभी पर अगर उसे जीत हासिल हो, तब भी वह अपने दम पर केंद्र में सरकार नहीं बना सकती।


पहले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 499 में से 489 सीटों पर चुनाव लड़ा और 364 सीटें जीतीं। वर्ष 1957 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने 494 सीटों पर चुनाव लड़ा और 371 सीटें जीतीं। इसी तरह, वर्ष 1962 में 494 में से 361 और 1967 में पहली बार अनुभवहीन इंदिरा गांधी के नेतृत्व में पार्टी 523 लोकसभा सीटों में से 283 पर जीत हासिल कर सत्ता बरकरार रखने में कामयाब रही। वर्ष 1971 में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ इंदिरा गांधी ने 518 सीटों में से 352 सीटें जीतकर जबर्दस्त वापसी की। वर्ष 1975 के आपातकाल के बाद मतदाताओं ने इंदिरा को सत्ता से बाहर का रास्ता जरूर दिखाया, पर कांग्रेस 154 सीटें जीतने में कामयाब रही।


वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी ने एक बार फिर विपक्ष को पटखनी देते हुए 353 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की। लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने दिसंबर, 1984 में 404 सीटें जीतकर कांग्रेस को बंपर जीत दिलाई। पंजाब में कांग्रेस की जीत से यह आंकड़ा 413 सीटों पर पहुंच गया, जहां चुनाव कुछ महीने बाद हुए थे। मगर 1989 में राजीव गांधी को शिकस्त झेलनी पड़ी, लेकिन 197 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकार के पतन के बाद कांग्रेस की फिर वापसी हुई। दरअसल, 1991 चुनाव के दौरान राजीव गांधी की दुखद हत्या के बाद कांग्रेस ने 244 सीटें जीतीं और छोटी पार्टियों के बाहरी समर्थन से पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनाई।


वर्ष 1996 में राव के नेतृत्व में कांग्रेस केवल 140 सीटें जीतकर सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस ने अल्पकालीन एचडी देवे गौड़ा और आईके गुजराल सरकारों को बाहर से समर्थन दिया। वर्ष 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने एनडीए की सरकार बनाई। तब भी कांग्रेस के पास 141 सीटें और भाजपा को 182 सीटें मिली थीं। वर्ष 1999 के मध्यावधि चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन की सत्ता में वापसी हुई, जबकि कांग्रेस 114 सीटों पर सिमट गई, जो ‘ग्रांड ओल्ड पार्टी’ का अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन था।


हालांकि 2004 में कांग्रेस ने अपनी स्थिति सुधारते हुए 145 सीटें जीतीं और एक ऐसा गठबंधन बनाया, जो न केवल 2004 में, बल्कि 2009 में भी सरकार बनाने में कामयाब रहा, जब कांग्रेस को 206 सीटों पर जीत मिली थी। लोकसभा चुनाव में यह शायद आखिरी बार था, जब कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के उदय ने कांग्रेस को बुरी तरह से ध्वस्त कर दिया, जिसे 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में दस फीसदी सीटें तक नहीं मिल सकीं। वर्ष 2014 में महज 44 सीटों पर सिमटना कांग्रेस के लिए शर्मनाक था। वहीं, 2019 में भी यह केवल 52 सीटें ही जीत पाई, जिसमें ज्यादातर सीटें केरल, पंजाब, तमिलनाडु और कर्नाटक से थीं।


मल्लिकार्जुन खरगे और तीनों गांधी (सोनिया, राहुल और प्रियंका) के संयुक्त नेतृत्व में, चुनावों में मिली लगातार हार और कमजोर आत्मविश्वास के चलते धूमिल संभावनाओं और अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट से जूझती कांग्रेस आप, तृणमूल कांग्रेस, जदयू, राकांपा (शरद पवार), द्रमुक, शिवसेना (उद्धव ठाकरे) और 22 अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर भाजपा को हराने की जुगत कर रही है। पार्टी की पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय टीम ने गठबंधन सहयोगियों से वार्ता के लिए पार्टी की रणनीति निर्धारित करने हेतु वासनिक के आवास पर बैठक की। पैनल के दो सदस्यों के अनुसार, उन्हें यह देखकर निराशा हुई कि कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि वह गठबंधन के सहयोगियों से तीन सौ सीटें मांग सके। पैनल ने 292 लोकसभा सीटों को शॉर्टलिस्ट किया है, पर बारीकी से जांच करने पर ये 240 से भी कम निकली हैं। विभिन्न राज्यों की कई सीटें ऐसी हैं, जहां पार्टी के लिए गठबंधन सहयोगी के तौर पर चुनाव लड़ने का कोई आधार नहीं है।
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यही नहीं, उनका विश्लेषण बताता है कि राहुल गांधी की आगामी भारत न्याय यात्रा में जिन राज्यों से गुजरेगी, उन राज्यों की 345 संसदीय सीटों में से केवल 15 सीटों पर ही कांग्रेसी सांसद हैं। व्यावहारिक तौर पर देखें, तो पता चलता है समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन करने पर भी कांग्रेस के लिए 50 लोकसभा सीटों का आंकड़ा पार करना कठिन होगा। कांग्रेस में ऐसे कई लोग हैं, जो राहुल की दूसरे चरण की यात्रा को निरर्थक, गलत और पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझती पार्टी के लिए नुकसानदायक मानते हैं। टीम खरगे समेत कोई भी इस स्थिति में नहीं है, जो राहुल को ईमानदार राय दे सके।


हालांकि अपनी ओर से खरगे ने सीट बंटवारे की संभावनाओं पर चर्चा के लिए राज्यों के नेताओं को बुलाया है। इसमें संदेह नहीं कि जरूरत और मजबूरी का सिद्धांत कांग्रेस को सीट बंटवारे की ओर ले जा रहा है, क्योंकि वह अपने बल पर चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं है। हालांकि खरगे को उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पंजाब, दिल्ली, बिहार और महाराष्ट्र में कम सीटों के कड़वे फॉर्मूले को स्वीकारने के लिए गांधी परिवार से काफी अनुनय और समर्थन की आवश्यकता होगी। सहयोगी दल खुद को कमतर नहीं मानते और कोई रियायत देने को तैयार नहीं हैं। वास्तविकता से बेखबर कांग्रेसी नेताओं की समस्या यह है कि वे अतीत और पुरानी यादों में जीते हैं कि हमारे बाप-दादा ने घी खाया था, हमारी हथेली सूंघ लो। ऐसे में कांग्रेसी नेताओं को झटका लगना तय है। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो नाजुक इंडिया गठबंधन का अराजक होना तय है।

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