ये चारों किताबें विषयवस्तु, वर्णन के तरीके और साहित्यिक गुणवत्ता के मामलों में बहुत मिलती-जुलती हैं। लेकिन तीन चीजें ऐसी हैं, जो इन चारों पुस्तकों में समान हैं। पहली यह कि सभी जीवनीकार जीवनियों के पात्रों से कम उम्र के रहे हैं (हैरोड कीन्स से अट्ठारह साल छोटे थे, ग्रिमेट से मैलेट चौवालिस साल छोटे थे, इवान्स हॉब्सबॉम से तीस साल छोटे थे, जबकि थेरॉक्स दिवंगत नॉयपॉल से नौ साल छोटे हैं। दूसरी बात यह कि इनमें जीवनीकारों की जीवनियों के पात्रों से व्यक्तिगत जान-पहचान रही है। दो मामलों में (कीन्स से हैरोड का और नॉयपॉल से थेरॉक्स का) व्यक्तिगत संबंध बहुत नजदीकी और गहरा रहा है; शेष दो मामलों में ( मैलेट का ग्रिमेट से और इवान्स का हॉब्सबॉम से) ये संबंध क्षणिक ज्यादा रहे हैं।
तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ये सभी जीवनीकार अपने-अपने क्षेत्रों में सुप्रतिष्ठित होने के बावजूद जीवनियों के पात्रों की तुलना में कम प्रसिद्ध रहे हैं। हैरोड चर्चित ब्रिटिश अर्थशास्त्री थे और ज्यादातर ऑक्सफोर्ड में ही रहे, जबकि कैंब्रिज के अर्थशास्त्री कीन्स 20 वीं सदी के सबसे प्रभावशाली अर्थशास्त्री थे। ऐसे ही, मैलेट ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के सफल ऑफ स्पिनर थे, जबकि ग्रिमेट क्रिकेट इतिहास के पहले महान लेग स्पिनर थे, बिल ओ' रैली, रिची बेनो और सर्वोपरि शेन वॉर्न उन्हीं की परंपरा के लेग स्पिनर थे। इवान्स एक बहुप्रकाशित इतिहासकार हैं, जिन्होंने 20वीं शताब्दी की जर्मनी पर कई किताबें लिखी हैं। लेकिन एक इतिहासकार के रूप में हॉब्सबॉम की छवि विश्व स्तरीय है। थेरॉक्स एक उपन्यासकार और यात्रा वृत्तांतों के लेखक हैं, जिन्होंने अपने लेखन से पर्याप्त पेशेवर सफलता हासिल की है। जबकि नॉयपॉल का क्षेत्र भी साहित्य ही था, लेकिन उन्हें इस क्षेत्र की सर्वोच्च उपलब्धि नोबेल पुरस्कार मिला था।
मैं यहां प्रसन्नता के साथ बताना चाहता हूं कि ऐसे विश्व स्तरीय जीवनीकारों में अब एक भारतीय का नाम भी जुड़ गया है : आरके लक्ष्मण पर ईपी उन्नी के मोनोग्राफ को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। लक्ष्मण से 33 साल छोटे और वर्ष 1954 में पैदा हुए उन्नी खुद एक शानदार और सफल कार्टूनिस्ट हैं। मैं नहीं जानता कि उन्नी की कभी लक्ष्मण से मुलाकात हुई या नहीं, लेकिन इस पुस्तक में एक कनिष्ठ कार्टूनिस्ट ने अपने से वरिष्ठ और इस पेशे के शीर्ष व्यक्तित्व को जिस शैली में श्रद्धांजलि दी है, वह बेहद प्रभावशाली है।
आरके लक्ष्मण मैसूरू में पैदा हुए और पले-बढ़े थे। उनके जिस पहले स्केच के बारे में जानकारी है, वह उन्होंने फर्श पर अपने शिक्षक पिता का बनाया था। बचपन में लक्ष्मण बंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ना चाहते थे, लेकिन वह वहां प्रवेश पाने में विफल रहे। लिहाजा उन्होंने मैसूरू से ही बीए की डिग्री ली और खाली समय में स्केच बनाते और पेंटिंग करते थे। उनके घर में जो अखबार और पत्रिकाएं आती थीं, उनके रेखांकनों को वह गौर से देखते थे। उसी दौरान न्यूजीलैंड के कार्टूनिस्ट डेविड लो के कार्टूनों के वह मुरीद हो गए, लंदन इवनिंग स्टैंडर्ड में छपे जिनके कार्टून मद्रास के द हिंदू में दोबारा छपते थे।
दशकों बाद जेजे स्कूल में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किए जाने पर उन्होंने कहा था कि अगर उन्हें वहां प्रवेश मिलता, तो वहां से निकले दूसरे स्नातकों की तरह वह भी किसी विज्ञापन एजेंसी में मोटे वेतन में आर्ट डायरेक्टर होते। जाहिर है, जेजे स्कूल द्वारा उन्हें प्रवेश न दिए जाने से ही लक्ष्मण की विलक्षण प्रतिभा सामने आ पाई। इस लिहाज से उन परीक्षकों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिन्होंने लक्ष्मण को जेजे आर्ट स्कूल के लायक नहीं समझा।
लक्ष्मण को अपनी पहली नौकरी आजादी से ठीक पहले 1947 में फ्री प्रेस जर्नल में मिली। उसके बाद वह टाइम्स ऑफ इंडिया में चले गए और वहीं के हो गए। इस शानदार मोनोग्राफ में व्यक्ति लक्ष्मण के अलावा दूसरी जो चीज सर्वाधिक प्रभावशाली है, वह धोती और धारीदार जैकेट पहने 'कॉमन मैन' के बारे में है। लक्ष्मण का लंबा पेशेवर कार्यकाल देश के दर्जन भर प्रधानमंत्रियों की अवधि को समेटे था, और उन्होंने किसी भी प्रधानमंत्री को नहीं बख्शा। लेकिन उन्नी के मुताबिक, इंदिरा गांधी पर कलम या स्केच के जरिये की की गई उनकी धारदार टिप्पणियां सबसे प्रभावशाली थीं।
लक्ष्मण ने बंबई के साथ लक्ष्मण के रिश्ते के बारे में भी लिखा है। 'कार्टूनों का इतिहास है कि वे शहरों के साथ बढ़ते हैं, और मुंबई अपने कार्टूनिस्ट का इंतजार ही कर रही थी', उन्नी कहते हैं। लक्ष्मण ने अपने कार्टूनों में अखबारों के पाठकों के दैनिक मुद्दों को चुना, जिनसे वे जूझते हैं। उनके कार्टूनों ने आम लोगों को बताया कि उनके मुद्दे एक हैं।
इस मोनोग्राफ में उन्नी ने आरके लक्ष्मण के साथ उनसे पहले की पीढ़ी के कार्टूनिस्ट के शंकर पिल्लई की तुलना की है। दोनों सवर्ण हिंदू थे, तथा अंग्रेजी शिक्षा और बेहतर पुस्तकालयों तक दोनों की पहुंच थी। उन्नी कहते हैं कि इन दोनों दिग्गजों ने कार्टून की दो अलग-अलग धाराएं विकसित कीं। लक्ष्मण की धारा नर्म, लेकिन बेहद प्रभावित करने वाले हास्य की है, तो शंकर अपने कार्टूनों में आक्रामक अंदाज में सीधा हमला बोलते थे।
उन्नी का मानना है कि तुलनात्मक रूप से लक्ष्मण अपने कार्टूनों में राजनीतिक रूप से ज्यादा परिपक्व हैं। शंकर ब्रिटिशों की औपनिवेशिक नीति के विरोधी थे और उनका मानना था कि आजादी के बाद कांग्रेस देशवासियों की उम्मीदों पर खरा उतरेगी। जबकि लक्ष्मण राजनीतिक रूप से निरपेक्ष थे। दोनों में एक और फर्क यह है कि कार्टूनिस्टों में जहां शंकर के अनुयायी हैं, वहीं लक्ष्मण ने अनुयायी या घराना नहीं बनाया। जैसे गैरी सोबर्स एक ही हुए, वैसे ही आरके लक्ष्मण भी अपनी तरह के इकलौते थे।
यह पुस्तक पढ़ते हुए मैं अपने यहां के कार्टूनिस्टों के समुद्रतटों से संबंध तलाशने का अनुमान लगाने पर विवश हो गया। हमारे यहां इस कला रूप के ज्यादातर दिग्गजों का केरल से संबंध रहा है, जिनमें शंकर, अबु अब्राहम, ओवी विजयन, मंजुला पद्मनाभन और खुद उन्नी हैं। लक्ष्मण का शहर मैसूरू दूरस्थ इलाके में है, लेकिन सौभाग्य से खुद वह बंबई चले गए थे और वही उनकी कर्मभूमि थी। इस लिहाज से देखें, तो उनका जीवन अपने बचपन के नायक डेविड लो से मिलता है, जो खुद भी न्यूजीलैंड से दुनिया के सबसे दिलचस्प शहर लंदन में बस गए थे। और महानगरों ने इन दोनों को ही उनकी अनुदार पृष्ठभूमि से छुटकारा दिलाकर उन्हें सामाजिक-आर्थिक विविधता तथा बौद्धिक व सांस्कृतिक रचनात्मकता से लैस किया।