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डॉ. आंबेडकर: मूकनायक और उसके संपादक की याद में

श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sun, 26 Feb 2023 05:53 AM IST

सार

मूकनायक के 103 साल पूरे होने के अवसर पर औरंगाबाद जाने के बाद मालूम हुआ कि सामाजिक और शैक्षिक संस्थाओं को महत्व देने वाले बाबा साहब के कर्मक्षेत्र में सामाजिक स्थितियां अब भी बहुत आश्वस्त नहीं करतीं। 
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Mooknayak-Dr BR Ambedkar - फोटो : सोशल मीडिया


31 जनवरी, 1920 को मराठी पाक्षिक मूकनायक का प्रवेशांक डॉ. आंबेडकर के सारगर्भित संपादकीय ‘मनोगत‘ शीर्षक के साथ पाठकों के बीच आया था। विगत 31 जनवरी को इस पत्र की 103 वीं वर्षगांठ थी। इस मौके पर बाबा साहब के पौत्र ने तात्कालिक परिस्थितियों और संपादक की निष्ठा और प्रतिबद्धता से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। मसलन, गहरा आर्थिक संकट था, फिर भी दत्तो पवार के जरिये छत्रपति शाहू महाराज की आर्थिक सहायता से बाबा साहब ने मूकनायक निकाला। तब शिक्षितों की संख्या कम थी, फिर भी उस पत्र को पाठकों तक पहुंचाया गया।


बाबा साहब ने घोषणा की थी कि पत्र की ‘तीस हजार प्रतियां प्रकाशित होंगी और कम से कम एक लाख पचास हजार तक पहुंचेगी। एक शिक्षित पढ़ेगा और पांच अशिक्षित सुनेंगे।‘ उसमें पत्रकारिता के मूल्यों, सामाजिक संरचना और संपादकों के सामाजिक दायित्व-बोध पर चर्चा की गईं थी। संपादक ने रूपक के माध्यम से लिखा था कि भारतीय समाज एक बहुमंजिली इमारत की भांति है, जिसमें एक तल का व्यक्ति दूसरे तल में प्रवेश नहीं करता।


यह ऐतिहासिक विडंबना है कि तिलक के केसरी में 1919 में मूकनायक का विज्ञापन नहीं छपा। जबकि उन्हीं तिलक के सुपुत्र पत्रकार श्रीधर बलवंत तिलक डॉ. आंबेडकर के बड़े सहयोगी थे। आंबेडकर द्वारा गठित ‘समता संघ‘ की पूना शाखा के वह उपाध्यक्ष थे।


स्वभाविक रूप से सबसे पहले ध्यान औरंगाबाद की शिक्षा संस्थाओं की ओर गया। मिलिंद कॉलेज, लॉ कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, महिला छात्रावास इत्यादि का निर्माण डॉ. आंबेडकर ने स्वयं उपस्थित रहकर कराया और उन्हें राजकीय स्वरूप दिलाया था। यह ज्ञान के केंद्रों के प्रति उनके लगाव का सूचक है।


औरंगाबाद वह स्थान है, जहां 1978 से मराठवाड़ा विश्वविद्यालय के नामांतरण के लिए आंदोलन चला था और 14 जनवरी, 1994 को नामांतरण मान्य हुआ। आज यह ‘बाबा साहब मराठवाड़ा विश्वविद्यालय‘ नाम से जग-जाहिर है। ‘बाबा साहब अतिथि गृह‘, ‘बाबा साहब प्रतिमा उद्यान‘ के अलावा कई निजी होटलों, स्कूलों ने भी बाबा साहब के नाम के बोर्ड लगा लिए हैं, जो उनकी बढ़ती स्वीकृति का प्रमाण है।


औरंगाबाद मराठवाड़ा की राजधानी है। विदर्भ की राजधानी नागपुर है, जिसे बाबा साहब के बौद्ध धम्म दीक्षा ग्रहण करने के रूप में याद किया जाता है। पर औरंगाबाद 1947 में आजाद नहीं हो पाया था, क्योंकि यहां ‘निजाम हैदराबाद‘ का शासन था। ध्यान देने की बात है कि यहां बाबा साहब का चुनाव क्षेत्र भंडारा भी है। जिस क्षेत्र में उन्होंने ऐतिहासिक महत्व की सेवाएं कीं, बदले में उस क्षेत्र ने उनके लिए क्या दिया, यह प्रश्न स्वभाविक रूप से जेहन में कौंधता है।
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आजादी के बाद पहला आम चुनाव 1952 में हुआ था। चुनावी हवा जवाहर लाल नेहरू के अनुकूल बह रही थी, जबकि राजनीति से ज्यादा समाज नीति, अर्थनीति और सुधार नीति के चैंपियन आंबेडकर के लिए चुनावी राह कठिन थी। बाबा साहब ने 1952 का चुनाव बांबे नॉर्थ सेंट्रल सीट से शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन से लड़ा था। कांग्रेस ने आंबेडकर की हार सुनिश्चित करने के लिए उनके पीए रह चुके नारायण काजरोलकर को उनके खिलाफ खड़ा किया था। खुद नेहरू जी ने बाबा साहब के खिलाफ चुनाव प्रचार किया था। नतीजतन बाबा साहब हार गए और राज्यसभा के जरिये संसद में पहुंचे। वर्ष 1954 में जब भंडारा से उपचुनाव हुआ, तो बाबा साहब फिर पराजित हुए। उनकी हार उन्हें कदम-कदम पर बता रही थी कि 'पूना पैक्ट‘ का अंजाम यही होना था। फिर उन्होंने स्वतंत्र श्रमिक पार्टी का गठन किया। जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने भारतीय रिपब्लिक पार्टी की रूपरेखा तैयार की, पर छह दिसंबर, 1956 में उनके परिनिर्वाण के दस माह बाद आरपीआई अस्तित्व में आई।


महात्मा फुले प्रतिष्ठान के इस आयोजन की अध्यक्षता बाबा साहब के पुत्र यशवंतराव के पुत्र भीमराव आंबेडकर ने की। यह पुरखों के प्रति उनकी श्रद्धा ही है कि बाबा साहब के पौत्र ने सीधे उन्हीं के नाम पर अपना नाम रखा है। पत्रकार शेखर मगर ने नई जानकारी दी कि बाबा साहब ने राजनीतिक संस्थाओं से अधिक शैक्षिक-सामाजिक संस्थाओं का निर्माण किया। इसी तरह की एक गैर-राजनीतिक संस्था ‘पीपल्स इंप्रुवमेंट ट्रस्ट‘ का उन्होंने गठन किया था। पता यह भी चला कि जिस भंडारा से बाबा साहब लोकसभा चुनाव लड़े और हारे, वहीं  खैरलांजी है, जहां दलित परिवारों को मारने वाले ओबीसी थे।


बाबा साहब का क्षेत्र होने के बावजूद यहां समाज सुधार की गति मंद ही रही। इस क्षेत्र की एक घटना का संदर्भ था। यहां एक स्कूल की दलित प्रधान अध्यापिका सेवानिवृत्त हुईं और ओबीसी समाज से मुख्य अध्यापिका आईं, तो उन्होंने पांच घड़े गौमूत्र से स्कूल की कुर्सियां धुलवाईं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने शिक्षा मंत्री से शिकायत की, तो उन्हें हटाया गया। यानी बाबा साहब के कर्मक्षेत्र में भी सामाजिक स्थिति बहुत आश्वस्त नहीं करती।
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