आसायाग उन लोगों से अलग राय रखते हैं, जिनका मानना है कि ब्रिटिश राज से पहले हिंदू-मुस्लिमों में सौहार्दपूर्ण संबंध थे। पर वह कहते हैं कि हमारे ज्ञात इतिहास की बड़ी अवधि में ये दोनों समुदाय साथ-साथ रहते थे। उनके दैनंदिन जीवन में विवाद से ज्यादा सह-अस्तित्व दिखता था और उनका आर्थिक जीवन एक दूसरे पर निर्भर था। हालांकि उनकी बसाहट अलग-अलग थी, अंतरधार्मिक विवाह की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी और धर्मों के दायरे से बाहर इनमें गहरी दोस्ती भी दुर्लभ थी, पर पिछली कई सदियों में उन्होंने गलियों, बाजारों और धार्मिक आस्था के स्थलों में भी एक दूसरे के साथ चलना सीखा था।
किताब के एक भाग में उन तीर्थस्थलों का जिक्र है, जहां हिंदू-मुस्लिम, दोनों जाते रहे हैं। इनमें सड़क किनारे की एक मुस्लिम संत की दरगाह भी थी, जहां 'सभी ग्रामीण पीर को श्रद्धा सुमन चढ़ाने पहुंचते थे, और अपने मुस्लिम भाइयों को देखकर अनेक हिंदू कोई नया काम शुरू करने से पहले पीर का आशीर्वाद लेना नहीं भूलते थे।' आसायाग ने 12वीं सदी के सुधारक बसवन्ना के बारे में लिखा है, जो कृषि संस्कृति से अभिन्न रूप से जुड़े पशु भैंस के साथ मिथकीय रूप से जुड़े थे। 'हिंदुओं की तरह मुसलमान भी अपनी भैंसों को बसवन्ना का अवतार मानते और उनकी पूजा करते थे।'
आसायाग ने धार्मिक मेल-मिलाप का जो सबसे दिलचस्प उदाहरण पेश किया है, वह एक लोक नायक राजाबाग सावर का है, जिन्हें हिंदू एक गुरु मानते थे और मुसलमान संत। धार्मिक आस्था के इन स्थलों का अध्ययन करते हुए आसायाग ने पाया कि यहां विष्णु के अवतार और अल्लाह के दूत ऐसे विशिष्ट व्यक्तित्व में समाहित थे, जिन्होंने लौकिक दुनिया का त्याग कर दिया था, जो सहिष्णुता के स्तर पर जादूगर थे और जिनकी वैष्णववाद और इस्लाम में समान प्रतिष्ठा थी।
कर्नाटक में आसन्न विधानसभा चुनाव की पृष्ठभूमि में मैं यह किताब पढ़ रहा था। सत्तारूढ़ भाजपा ने जान-बूझकर अपने चुनाव अभियान को हिंदू बनाम मुसलमान कर दिया है। इसी कारण संघ परिवार की 'मुख्यधारा' और उसके 'बाहरी तत्वों' ने हिजाब, हलाल गोश्त और लव जिहाद जैसे मुद्दों को उभारा और प्रासंगिक बनाए रखा है। भाजपा ने चुनाव का केंद्रीय मुद्दा ही यह बनाया है कि कर्नाटक के हिंदू मुस्लिमों से भयभीत और आशंकित हैं।
कांग्रेस-जद (एस) की गठबंधन सरकार के कुछ विधायकों का दलबदल कराकर भाजपा जुलाई, 2019 में कर्नाटक में सत्ता में आई थी। बाद के करीब साढ़े तीन साल का उसका कार्यकाल निराशाजनक ही रहा है। सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप तो हैं ही, प्रशासनिक अक्षमता भी लगातार दिखाई देती है, जैसे विगत अगस्त में मानव निर्मित बाढ़ ने राज्य की राजधानी के साथ आईटी उद्योग के केंद्र को भारी नुकसान पहुंचाया था।
कुछ लोगों का तर्क है कि भाजपा ने अपने अप्रभावी कामकाज को छिपाने के लिए यहां हिंदू बनाम मुस्लिम का विमर्श चुना है। पर यह विचारधारा का मामला भी है। कर्नाटक की राजनीति पर लंबे समय से नजर रखने वाले प्रोफेसर जेम्स मेनोर ने द वायर के अपने एक लेख में लिखा, 'भाजपा ने यहां हिंदुत्व की राजनीति को बलपूर्वक और व्यवस्थागत तरीके से जिस तरह जिलाए रखा है, और यह ध्रवीकरण जिस स्तर का है, वैसा दूसरे राज्यों में शायद ही दिखे।' उन्होंने लिखा, 'कठोर हिंदुत्व की इस राजनीति को राष्ट्रीय स्तर के नेताओं ने जिलाए रखा, जिनका इरादा शुरुआती नियुक्तियों से ही साफ था। जब नई दिल्ली में कर्नाटक के सांसद को मंत्री बनाया जाना था, तब लिंगायत या वोक्कालिगा समुदाय से किसी को चुनने के बजाय एक कट्टर ब्राह्मण अनंत कुमार हेगड़े को चुना गया। फिर उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय युवा मोर्चे के प्रमुख के लिए बंगलूरू के एक और विस्फोटक ब्राह्मण सांसद तेजस्वी सूर्या को चुना।' इन विस्फोटक नेताओं की सूची में भाजपा महासचिव बीएल संतोष, जो सोशल मीडिया पर हिंदुत्व के सुपर ट्रोल हैं और कर्नाटक भाजपा प्रमुख नलिन कुमार कटील जैसे लोग भी हैं।
ये सारी नियुक्तियां गृहमंत्री अमित शाह ने की, जिनकी इस राज्य की राजनीति में बेहद सक्रिय भूमिका है। वह अमित शाह ही थे, जिन्होंने 2022 के अंत में कर्नाटक में भाजपा के चुनाव अभियान की औपचारिक शुरुआत करते हुए मांड्या की एक सभा में कहा था कि 'जो लोग टीपू को महान बनाते हैं', और 'जो देशभक्त हैं', मतदाताओं को उनमें से एक को चुनना होगा। उसके कुछ दिनों बाद कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष ने उन्हीं की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मतदाता सीवेज या खराब बुनियादी ढांचे जैसे छोटे मुद्दों के बजाय लव जिहाद पर ध्यान केंद्रित करें। पिछले सप्ताह श्री कटील ने मतदाताओं को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि 'यहां टीपू के अनुयायी नहीं, बल्कि वे रहें, जो राम के भजन गाते हैं।'
एक योद्धा और शासक के तौर पर टीपू सुल्तान विवादास्पद हैं। पर हिंदुत्ववादी इतिहासकार 18वीं सदी के इस शासक को जिन वजहों से गुनाहगार मानते हैं, उनकी सजा 21वीं सदी में कानून का पालन करने वाले मुस्लिमों को क्यों मिलनी चाहिए?
प्रोफेसर आसायाग ने 1980 और 1990 के दशक की शुरुआत में इस किताब के लिए फील्ड वर्क किया था। तब उत्तरी व पश्चिमी भारत में दंगे फैले थे, जिसका असर कर्नाटक में भी दिखा था। भाजपा तब राम जन्मभूमि अभियान के जरिये तेजी से उभर रही थी। 1990 के दशक के अंत में राज्य में सांप्रदायिक विवाद किसी तरह कम हो गया था। पर आज यहां भारी सांप्रदायिक तनाव है। हालांकि इस्लामी कट्टरता भी यहां उतनी ही दिखाई देती है, पर संख्या बल, आर्थिक शक्ति और केंद्र में सरकार होने से भाजपा को जो राजनीतिक वर्चस्व हासिल है, उस कारण बहुसंख्यकों की सांप्रदायिकता ज्यादा खतरनाक है।
प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख कभी-कभी मुस्लिम समुदाय के बीच पहुंच बनाने की बात करते हैं। अलबत्ता केंद्रीय गृहमंत्री, कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष और पार्टी के दूसरे प्रमुख नेताओं ने कर्नाटक में अपनी रणनीति साफ तौर पर बता दी है कि हिंदू हिंदुओं के रूप में और मुस्लिमों के खिलाफ मतदान करें।
असम और उत्तर प्रदेश की तरह कर्नाटक में भी भाजपा को धार्मिक ध्रुवीकरण के जरिये चुनाव जीत लेने की उम्मीद है। उसका आकलन यह है कि तीन तरफा चुनावी मुकाबले में, जो इस राज्य की खासियत है, अगर आधे या उससे अधिक हिंदुओं ने ध्रुवीकरण के आधार पर वोटिंग की, तो पार्टी की जीत सुनिश्चित है। अगर यह रणनीति सफल होती है, तो आगे भी कर्नाटक में शांति और समृद्धि की संभावना क्षीण रहेगी।